गुरुवार, फ़रवरी 07, 2019

अनारकली ऑफ़ आरा

अनारकली ऑफ़ आरा देखी। बहुतों के रिव्यू पढ़े। पर मेरे ज़हन में जो अटक गया उसका कही ज़िक्र नही सुना। संजय मिश्रा का क्लाइमेक्स में बुत हो जाना और खून के आँसू!

क्या होता है इन आँसुओं का पीछे? अगर दर्द, है, तो किस तरह का? पश्चात्ताप हो सकता है क्या? क्या एक वाक्या इंसान को बदलने के लिए काफी है? क्या पब्लिक ह्यूमिलेशन ही एक तरीक़ा है इंसान को लाइन पर लाने का! क्या बदला ले कर हमें सच में सुकून मिलता है। 

दो साल पहले पर संजय ने मुझे पीटा था तो उसके बॉस के रोकने के बाद वो एक कोने में जा कर बैठ गया था। मुझे लगा उसे अपने किये का पश्चात्ताप हो रहा था। पर जो आगे हुआ उससे तो बिलकुल नही लगा।

मेरा मानना है की बदलाव अंदर से होता है। कोई भी बाहरी व्यक्ति, वाक्या या दवाब हमें बदल नही सकता। इंसान सिर्फ जो भी हुआ उसे टालने की जरूर कोशिश करता है। या नकार कर या उसके असर को कम कर के! या तो विक्टिम बन कर या क्रिमिनल बन कर। अपने हर किये को स्वीकारना ही बदलाव की शुरुआत है! बीच का रास्ता सबसे कठिन है जिसके लिए समाज के पास फ़ुर्सत होती है और ही ऑफेंडर या विक्टिम के पास। किसी भी तरह की सजा तो समाजिक बदलाव लाती है और ही ऑफेंडर के व्यक्तित्व में कोई बदलाव लाती है। वो एक की जगह दो विक्टिम बना देती है! सही न्याय एक निष्पक्ष मध्यस्थ ही करवा सकता है

एक अहम बात जो हम नज़रअंदाज़ कर देते है वो ये की वीसी के लिए लडकियों को फँसाना आम था। जितना जिसके पास पावर उतने उसके पास शोषण करने के मौक़े! संस्कृत की टीचर का दुबारा दिखाना सबूत है। तो क्या उसका ये व्यवहार उसके दोस्तों को, परिवार को स्वीकार था? शायद हाँ। परिवार और दोस्त जब आश्रित होते है उनके पास उनकी हर ज़्यादती को झेलने के अलावा कोई चारा भी नही रह पाता। यही सहना उनके हौसले को हवा देता रहता है। जैसे सिमौन बवॉयर कहती है जब तक औरत आश्रित है उसका शोषण होता रहेगा। आश्रित इंसान बोर करने लगता है। हम उसे रेसपेक्ट कर ही नही सकते। बीवी की बोरियत दूसरी जगह पूरी होगी। अनारकली पैदा होती रहेगी। हमें अनारकली को मज़बूत नही बनाना है बल्कि अनारकली के वजूद का ही अंत करना है। ये बिना लडकियों और औरतों को हर तरह से स्वायत्त बनाए बगैर नही हो सकता!

पितृसत्ता में औरत ही नही मर्द भी बराबर पिसता है। जितनी ख़ुशी से दो स्वायत्त इंसान रह सकते है, एक शोषक-शोषित कभी नही रह सकते! जब तक शोषक बिना नकारे अपने किए का ख़ुद पर असर नही देख पाएगा उसकी स्वयम् की ज़ाग्रति संभव नही है

बाकि फ़िल्म जरूर देखे। अगर फ़िल्म का कोई भी हिस्सा लोगो को झंझकोर पाता है तो समझिए वो सार्थक हो गई है! एंटरटेनमेंट तो फिर आपको जहा चाहे फ्री में मिल जाएगा!

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