मुहब्बत के दम से है दुनिया की रौनक़, मुहब्बत न होती तो कुछ भी न होता। किताबों में छपते है चाहत के क़िस्से, हक़ीक़त के दुनिया में चाहत नही है! आदमी और औरत दोनों की दुनिया कितनी अलग है। आदमी याद को क़िस्से कहानी की तरह जीता है जबकि औरत यादों को ज़िंदगी बना कर जीती है।
हर सफ़र बहुत कुछ साथ में लाता है। ये रूट और इसके पड़ाव तो जैसे मेरे ज़िंदगी के पड़ाव को रेप्लिकेट कर रहे हो।
मुंबई से निकले तो भुसावल और खांडवा पर रुकी - बचपन के ढेरों हैदराबाद से परिवार के साथ के सफ़र रीविजट हो गए। कैसे स्टेशनों पर जब ट्रेन रुकती तो पापा पानी भरने के लिए उतरते और हर जगह की ख़ासियत के हिसाब से वहा कुछ ख़रीदा जाता।
फिर भोपाल आया। हमने शहर लगता है ज़्यादा अपने प्रेमियों की कहानियों के साथ जिए है। प्रेम हमारा पहला प्रेम MACT भोपाल से पढ़ा था। उसके कॉलेज के क़िस्से और बदमाशियों के लिए हम भोपाल को याद करते रहेंगे। वैसे ऐरटेल में नौकरी के समय की भी बहुत खुबसूरत यादें है!
फिर उरई, जहा शादी करके हम पहली बार गए थे। मेरी जिठानी रहती है पर विक्रम भी शादी से पहले के छ: साल वही बिताए थे। विक्रम ज़्यादा बोलते नही थे पर हम खोद खोद कर बातें निकलवा लेते थे।
फिर कानपुर और हमारी परनानी का घर, कभी कानपुर का सबसे समृद्ध परिवार पर हमने तो उनके ग़रीबी के दिन देखे है। परनाना की सारी कमाई उनके बेटों ने उड़ा दी। बहुत बचपन में हम जान गए थे की पुश्तैनी जायदाद बहुत जल्दी ख़त्म हो जाती है अगर अगली पीढ़ी बर्बाद हो जाए तो। कानपुर अभी पहुँचने वाले है!
फिर सबसे लंबा पड़ाव लखनऊ आएगा जहाँ मेरा और संजय का कॉलेज था। जहा साथ होते हुए भी हम एक दूसरे को सीधे जानते नही थे पर जब दोबारा मिले तो बहुत कुछ साझा मिला। पर ढेरों यादें शहर जिसने मुझे पूर्ण तरह से स्वतंत्र बनाया।
फिर फ़िरोज़ाबाद जहा संजय अभी है पर जानते हुए भी एक कॉल भी नही कर सकते है। कर पाते तो स्टेशन पर मिलते शायद।
फिर बभनान अविनाश पांडे के साथ छोटे से रिश्ते की तरह छोटा सा पड़ाव। कोई ख़ास ख़ूबसूरत यादें नही रही। फिर भी कैसे रस्ते नही लेने है इसकी सीख बहुत मिली।
आख़री पड़ाव गोरखपुर जहा संजय का बचपन बीता। एक ऐसा शहर जो संजय के कहानीकार की नज़र से बिना गए हुए चप्पा चप्पा छाना हुआ है। एफसीआई कॉलोनी, कार्मेल स्कूल - ऐसा लगता है जैसे हर बस स्टॉप हर प्लेग्राउंड देखा हुआ हो!
बिना प्यार के ज़िंदगी कुछ नही! जहा प्यार है ज़िंदगी है वही! और बहुत से छोटे छोटे स्टेशन जिनका पड़ाव तो छोटा था पर हर जगह से जोड़ना चाहूँ तो कोई न कोई क़िस्सा ज़रूर है। बस ज़्यादा लम्बा जो पड़ाव हो वही सबसे ज़्यादा यादें भी दे जाता है!
सुबह पाँच बचे उठे तैयार हो कर साढे पाँच पहुँचे फिर देखा मेन गेट खुला है पर गार्ड गायब था। इंतज़ार का मतलब नही था तो पैदल बैग उठा कर चल दिए। निकलते ही एक परिवार चार लड़कियाँ एक माँ मोर्निंग वॉक पर निकले थे। क्लब और पार्क के आने यूनिवर्सिटी मिली राइट मुड़े तो तिराहे तक थक गए थे बहुत से रिक्शे देखा एक ले लिया। दो क़दम आगे पैडलेगंज पर गाड़ी दिख गई।
बैनर लगवाये। फिर नेता जी से मुलाक़ात। फिर एक और लोकल बंदे ड्राइवर के साथ चाय लौंगलता। फिर पार्वती और उसकी बिटिया ललिता के गपशप। बारहवी की है मैथ से पर अनपढ़ मम्मी आगे पढ़ाने में सकुचा रही है! बहुत छोटे किसान उनकी पैदावार काम सब्ज़ियाँ उगाने से ले कर चटनी बनाने तक बहुत बातें। फिर कुशीनगर में बहुतों से मुलाक़ात। बच्चों से औरतों से बातें। मेरी औरों के साथ छोटी सी स्पीच। तखती पढ़ कर सुनाना। फिर यात्रा। माथाकुंवर को मृत्युकुंआ कहना! बुद्ध हिंदू थे! फिर गाड़ी में वापस पार्वती से बातें। चलते हुए बच्चों से कुशीनगर का इतिहास पूछना।स्वागत करते हुए बच्चों से बातचीत। फिर जेपी मोटर पर नाश्ता। शांति संगीता का ज़िंदगी को जानना। ननंद भाभी। संजय से जान पहचान। उनके साथ आगे के प्रोग्राम तय करना। फिर गुरद्वारा में स्वागत। वापस लौटना। फिर पैदल पूरे पाँच किमी सैर। सुबह का गोरखनाथ का प्रोग्राम! अगले दिन गाड़ी से चले तो अंदाज़ा नही था प्रोग्राम का। कॉलेज में रुकना था पर आगे जा कर पीछे आना।
सभी यात्राएँ बाहर से ज़्यादा भीतर उतरने में सहायक होती है। फिर बुद्ध से कबीर तक की यात्रा तो अपने में इसी को चरित्रार्थ करने का ही अनुभव रहा। मेरे लिए तो यात्रा मुंबई से ही शुरु हो चुकी थी। समाजिक कार्य में २५ साल बात स्नानोत्तर करने में लिए वापिस बेटी की उम्र की लड़कियों के क्लास में बैठना अपने में ख़ुद को परिवार को समाज को गहराई से जानना और एक बेहतर समाज की परिकल्पना करने का अंश था। दो साल में फिल्ड वर्क, गाँव की