रविवार, जून 20, 2021

मेरे मछुआरे

तुम चले जाओगे नही पता था मेरे मछुआरे
मेरे क्यों तुम तो किसी के भी नही 
न नदी के तेज़ धार के
न उसमें फेंके जाल के
न उन ढ़ाई क़िलों की मछलियों के 
जिन्हे पकड़ तुम इतराते थे...
जाओ मेरे बेढंग गँवारू मछुआरे 
फिर कहा 'मेरे'
न वो क्षणभंगुरता मेरी जो निकल आती है
उन शब्दों में जो किसी के नही होते
न तुम्हारी कविताओं के
न उस देहाती कहानियों के 
न वो गोल गोल घूमती हमारी बातों के
जिन्हे जकड़ हम खो जाते थे...
जाओ न, रोका कहा है मैने 
पर वो तुम्हारी ख़ास महक, जो मुझे मदहोश कर देती थी...
उसे नही ले जा पाओगे तुम!

तुम कवि नही होते तो कुछ और होते
कुछ और होते तो वो नही होते
वो जो बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह देता है
क्या कहना इतना जरूरी है
क्या रिश्ते बेशब्द बेनाम नही हो सकते
होने को क्यों नही हो सकते पर
वो जो बस बेहद निजी हो गुप्त हो गुमनाम हो
इतना की उसकी चाप में भीनी ख़ुशबू हो
और सासों में मंद मंद सुर हो
और कानों में कोई अनकहे बोल
और होंठों में पंखुड़ी सी छुअन
और रोम रोम में कोई तिरछी नज़र के बाण
और आँखों में गहरा और शांत समंदर
कहो देखा है तुमसे कभी ख़ुशबू को
या सुँघा है तुमने कभी संगीत को
या सुना है तुमने कभी स्पर्श को
या छुआ है तुमने कभी स्वाद को
या चखा है तुमने कभी नज़ारे को
बस क्या कहते हो!

मिलन की चाह

हम छोड़ आए जिन गलियों को

तुम वहा की अकसर सैर करती हो।

हम तोड़ आए जिन रिश्तों को

तुम उनकी अकसर बात करती हो।

हम अतीत के तहखानों से डरते है

तुम उन्ही में ताज़ा हवा का इंतज़ाम करती हो।

हमारे आँखें चुराने से क्या वो मंज़र छूट जाते है

तुम उन्ही का सामना कर दो चार करती हो।

क्या सोचती हो प्रिय? क्या हम तुम कही मिल सकते है!


हम भागना चाहते है वहा से जहा ज़मीन ख़ुद खिसकती है

तुम उस सुर्ख़ ज़मीन को जोत कर फिर नई पौध करती हो।

उस क्षितिज में जहा मैं डूब रहा हूँगा और तुम उग रही होगी।

हम चलते चलते थक कर रुकने को

और तुम सुस्ता कर फिर से चलने को।

कहो प्रिय? क्या हम तुम कभी मिल सकते है!


हम देख कर अपने टुकड़ों को हताश है

तुम उन्ही टुकड़ों को जोड़ हसीन मोजैक बना रही हो।

हम अपने रिस कहे घावों को छिपा रहे है

तुम हवा लगे सुखे खरोंच रह गए घावों की नुमाइश कर इठला रही हो।

हम बंद दरवाज़े गिन रहे है

तुम एक रौशनदान की रोशनी पा कर चहक उठती हो।

बताओ प्रिय? हम कैसे मिल सकते है!