रविवार, दिसंबर 29, 2013

जियो और जीने दो!

आज बहुत कुछ कहने का मन हैं. चुप्पी किसी भी रिश्ते को नहीं ख़त्म कर सकती.

"साइलेंस इस गोल्डन" हर जगह अप्लाई नहीं होता. उलटे चुप्पी दिल में एक ऐसे ज्वालामुखी को चिंगारी देती हैं जो न जाने कब फट जाये औए न जाने कितने घर बर्बाद हो जाये.

हमारा बड़ा लम्बा साथ था. हर परेशानी में, ख़ुशी में एक दुसरे के साथ थे. जब छठी सालगिरह बनायीं थी तो लगा जैसे हर साल ऐसे ही प्यार बढ़ता रहेगा...
पर क्या पता था, उस सालगिरह कि तस्वीरे, सितम डा जाएंगी. जो वो नहीं चाहते थे वही हुआ. बात सामने आ गयी.

बोले, "अब हम बात नहीं कर पाएंगे!"

टूट गयी थी मैं. जिससे सुबह शाम बिना बात किये दिन नहीं कटता था, उसके बिना जीना कैसा होगा. जो बेटा बिना पप्पी झप्पी के सोता नहीं था उसको सुलाना कितना पहाड़ जैसा होगा.. अपना दर्द देखती या उस नन्ही सी जान का. लगभग ४ महीने चुप रही. हर कॉल, हर मेसेज, दरवाज़े कि हर घंटी में इंतज़ार रहता.. कभी खुद को ख़त्म करने कि चाह होती तो अपनी नन्ही जान को देख कर जीने का मन बना लेती. न खाना खाया जाता और न सोया. एक साल में २० किलो घट गए.

आज भी उस चुप्पी की टीसे रातों को जगाती हैं. वो करवाती हैं वो मेरी आत्मा भी करने से डरे. क्योंकि आज भी वो चुप हैं. अब शायद हालत भी ऐसे हैं कि चुप्पी ही ठीक हैं. पर कुछ सालों बाद जो ज्वालामुखी फूटेगा उसका अंदाजा न उनको हैं, न शायद मुझको.

रिश्ते जरुरी नहीं कि चुप्पी से ख़त्म किया जाए. हर रिश्ते कि आयु होती हैं. जब लगे कि उसकी आयु ख़त्म हो रही हैं तो मिलजुल कर, आपसी सहमति से रिश्ता ख़त्म करे. किसी का दिल तोड़ कर न आप जी पाएंगे और न दूसरे!