बुधवार, फ़रवरी 06, 2019

हुक अप कल्चर

कल एक लम्बी बहस हुई हुकअप कल्चर पर। कल्चर ही कहा जाएगा क्यूँकि ये खुलेआम बढ़ रहा है और ये इंसानी संवेदनशीलता को ख़त्म करता जा रहा है।
ब्रेकअप हुआ हो तो ये दवाई के रूप में रिकमेंड किया जाता है। अजीब है न आप दिल की चोट को दिमाग़ सुन्न करके ठीक करना चाहते हो! ये बहुत ही क्षणिक राहत देगा। बाकि तो आप दिल की चोट को नासूर बनाने का काम कर रहे हो!
हाँ सच में शरीर की ज़रूरत है तो कीजिए जो करना है पर ध्यान रहे ये दवाई नही है। दवाई आपके अंदर है जिसे लेने से आप बचना चाह रहे हो!
आदमी औरत दोनों के लिए रिश्ते वही सुकून देते है जिसमें दिल मिल जाते है! सिर्फ मज़े के लिए रिश्ते को मैं गलत नही कहूँगी ना ही मोरली जज करूँगी, पर वो ज़िंदगी जीने का तरीक़ा नही बन सकते!
हमारी शरीर की आग हमें इतना बेबस नही कर सकती की हम अकेले में, ग्रुप में किसी के साथ भी शुरु हो जाए! ज़िंदगी इतनी ड्राई मत बनाइए! ये वहशीपन है!
ज़िन्दगी प्यार का नाम है। और प्यार सिर्फ शरीर की चाहत नही होती! ये दो रूह का मिलन है! इसमें मिलन है तो विरह भी है! सुकून है तो दर्द भी है! इसमें बेचैनी है तो सब्र भी है! आशा है तो हताशा भी है! इसमें संवेदनशीलता है। ये हमें इंसान बनाए रखता है!

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