पता नहीं कहा से शुरू करू. आज में उसका नाम भी अपनी जुबान पर नहीं लाना चाहता.
पर एक समय था जब मैं उसे बेहिसाब प्यार करता था.
बहुत जिद्दी थी वो. इस समाज से अलग. मैंने बहुत बार समझाने की कोशिश की थी.पर शायद उसकी जिद्द से ही मुझे प्यार हो गया था.
"तुम बहुत कोमल हो. पर बहुत द्रण हो उन तरीको में जो तुम्हे सशक्त बनाते हैं. यही तुम्हे बहुत आगे ले जायेगा. नहीं तो तुम एक बहुत जिद्दी और संकल्पी महिला हो जो साथ में बेवकूफ भी हैं!!"
नहीं समझ पाई थी वो मेरे प्यार को. उसे सामाजिक स्वीकृति चाहिए थी जो मैं नहीं दे सकता था.
"मैं तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा. पर ये समाजिक रिश्तों को भी हम निभा लेंगे"
दो साल पहले ध्रुव ३ साल का रहा होगा. दशहरा चल रहा था. मैं उत्तम को रामलीला दिखाने ले गया था. पता था उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगा होगा. पर रोज की तरह जब शाम को बात शुरू हुयी तो रोक नहीं पाया. मेरा बोध ही जैसे मुझे बुलवा रहा था.
"मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ. आज बहुत याद आ रही हैं तुम्हारी"
"आज ध्रुव को मैं कंधे पर बिठा के रामलीला दिखता.."
"हाँ हाँ, दिखाते, दिखाई तो नहीं न!!"
"दिखाऊंगा. अभी वो बहुत छोटा हैं."
उसका गुस्सा वाजिब था. दशहरा के दिन आचानक शाम को कॉल आया.
"हम अभी भारी भगदड़ से निकले हैं. एक पल के लिए ऐसा लगा सांस घूँट जायेगी."
"कहाँ हो?"
"रामलीला ग्राउंड में. ध्रुव को रावण दहन दिखने आई थी."
"क्यों???"
उस दिन मुझे बहुत गुस्सा आया उसपे. क्या जिद्द हैं! अजीब सरफिरी थी वो. बस इतनी सी बात पर अपनी और ध्रुव दोनों की ज़िन्दगी दाव पे लगा दी.
"तुम मेरी कही बात क्यों एकदम नकार देती हो? पता हैं कितना दुःख होता हैं मुझे. अब तुम मेरा बिलकुल आदर नहीं करती"
"बहुर आदर करती हूँ. पर आपकी बातें. कुछ मेरे लिए नहीं हैं. आपका परिवार हैं. मैं कौन हूँ?"
"ये क्या तरीका हैं? तुम्हे पता हैं मैंने क्या कुछ नहीं किया तुम्हारे लिए."
"हाँ उसी वजह से में तुम्हारे साथ हूँ. मजबूर हूँ."
"तुम्हे मुझ से ज्यादा उस साले सप्रा की बातें ज्यादा सही लगती हैं. मेरा तुम्हारी ज़िन्दगी में जगह ही क्या हैं?"
"हाँ. आपकी हर बात हि मानती आई हूँ. इसलिए इतने दर्द में जी रही हूँ."
"ये दर्द तुम्हारी अपनी सोच हैं. मैं तो तुम्हे हमेशा खुश देखना चाहता हूँ. अब जवाब दो, क्या हैं जो तुम आधा सच बता कर दुसरो से साहनभूति लेती हो. अपने दोस्त मीता के बात करोगी तो पुरे कमांड में. पर उन कुत्तों के सामने रोती हो. तुम्हे सहानभूति क्यों चाहिए. क्यों दिखाती हो उनको अपनी कमजोरी."
"हाँ! मेरी तरह झूठी ज़िंदगी जी के देखो"
"क्या कमी हैं तुम्हारी ज़िन्दगी में. मैं हूँ. इतने प्यारे बच्चे. बस तुम्हारी जिद हैं"
"सब झूठ!!"
मैं उसका गुनाहगार था. पर अब उसकी खरी-खोटी सुनने की हद ही हो गयी थी.
आज में उसको अपना बुरा अतीत मान के आगे बढ़ गया हूँ. उसकी जिद्द हैं की वो मुझे ढो कर चिता तक जाएगी. शायद मैं ही उसे नहीं समझ पाया.
पर एक समय था जब मैं उसे बेहिसाब प्यार करता था.
बहुत जिद्दी थी वो. इस समाज से अलग. मैंने बहुत बार समझाने की कोशिश की थी.पर शायद उसकी जिद्द से ही मुझे प्यार हो गया था.
"तुम बहुत कोमल हो. पर बहुत द्रण हो उन तरीको में जो तुम्हे सशक्त बनाते हैं. यही तुम्हे बहुत आगे ले जायेगा. नहीं तो तुम एक बहुत जिद्दी और संकल्पी महिला हो जो साथ में बेवकूफ भी हैं!!"
नहीं समझ पाई थी वो मेरे प्यार को. उसे सामाजिक स्वीकृति चाहिए थी जो मैं नहीं दे सकता था.
"मैं तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा. पर ये समाजिक रिश्तों को भी हम निभा लेंगे"
दो साल पहले ध्रुव ३ साल का रहा होगा. दशहरा चल रहा था. मैं उत्तम को रामलीला दिखाने ले गया था. पता था उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगा होगा. पर रोज की तरह जब शाम को बात शुरू हुयी तो रोक नहीं पाया. मेरा बोध ही जैसे मुझे बुलवा रहा था.
"मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ. आज बहुत याद आ रही हैं तुम्हारी""आज ध्रुव को मैं कंधे पर बिठा के रामलीला दिखता.."
"हाँ हाँ, दिखाते, दिखाई तो नहीं न!!"
"दिखाऊंगा. अभी वो बहुत छोटा हैं."
उसका गुस्सा वाजिब था. दशहरा के दिन आचानक शाम को कॉल आया.
"हम अभी भारी भगदड़ से निकले हैं. एक पल के लिए ऐसा लगा सांस घूँट जायेगी."
"कहाँ हो?"
"रामलीला ग्राउंड में. ध्रुव को रावण दहन दिखने आई थी."
"क्यों???"
उस दिन मुझे बहुत गुस्सा आया उसपे. क्या जिद्द हैं! अजीब सरफिरी थी वो. बस इतनी सी बात पर अपनी और ध्रुव दोनों की ज़िन्दगी दाव पे लगा दी.
"तुम मेरी कही बात क्यों एकदम नकार देती हो? पता हैं कितना दुःख होता हैं मुझे. अब तुम मेरा बिलकुल आदर नहीं करती"
"बहुर आदर करती हूँ. पर आपकी बातें. कुछ मेरे लिए नहीं हैं. आपका परिवार हैं. मैं कौन हूँ?"
"ये क्या तरीका हैं? तुम्हे पता हैं मैंने क्या कुछ नहीं किया तुम्हारे लिए."
"हाँ उसी वजह से में तुम्हारे साथ हूँ. मजबूर हूँ."
"तुम्हे मुझ से ज्यादा उस साले सप्रा की बातें ज्यादा सही लगती हैं. मेरा तुम्हारी ज़िन्दगी में जगह ही क्या हैं?"
"हाँ. आपकी हर बात हि मानती आई हूँ. इसलिए इतने दर्द में जी रही हूँ."
"ये दर्द तुम्हारी अपनी सोच हैं. मैं तो तुम्हे हमेशा खुश देखना चाहता हूँ. अब जवाब दो, क्या हैं जो तुम आधा सच बता कर दुसरो से साहनभूति लेती हो. अपने दोस्त मीता के बात करोगी तो पुरे कमांड में. पर उन कुत्तों के सामने रोती हो. तुम्हे सहानभूति क्यों चाहिए. क्यों दिखाती हो उनको अपनी कमजोरी."
"हाँ! मेरी तरह झूठी ज़िंदगी जी के देखो"
"क्या कमी हैं तुम्हारी ज़िन्दगी में. मैं हूँ. इतने प्यारे बच्चे. बस तुम्हारी जिद हैं"
"सब झूठ!!"
मैं उसका गुनाहगार था. पर अब उसकी खरी-खोटी सुनने की हद ही हो गयी थी.
आज में उसको अपना बुरा अतीत मान के आगे बढ़ गया हूँ. उसकी जिद्द हैं की वो मुझे ढो कर चिता तक जाएगी. शायद मैं ही उसे नहीं समझ पाया.




