शुक्रवार, अगस्त 30, 2013

जिद्दी...

पता नहीं कहा से शुरू करू. आज में उसका नाम भी अपनी जुबान पर नहीं लाना चाहता.
पर एक समय था जब मैं उसे बेहिसाब प्यार करता था.
बहुत जिद्दी थी वो. इस समाज से अलग. मैंने बहुत बार समझाने की कोशिश की थी.पर शायद उसकी जिद्द से ही मुझे प्यार हो गया था.
"तुम बहुत कोमल हो. पर बहुत द्रण हो उन तरीको में जो तुम्हे सशक्त बनाते हैं. यही तुम्हे बहुत आगे ले जायेगा. नहीं तो तुम एक बहुत जिद्दी और संकल्पी महिला हो जो साथ में बेवकूफ भी हैं!!" 
नहीं समझ पाई थी वो मेरे प्यार को. उसे सामाजिक स्वीकृति चाहिए थी जो मैं नहीं दे सकता था.
"मैं तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा. पर ये समाजिक रिश्तों को भी हम निभा लेंगे"
दो साल पहले ध्रुव ३ साल का रहा होगा. दशहरा चल रहा था. मैं उत्तम को रामलीला दिखाने ले गया था. पता था उसे बिलकुल अच्छा नहीं लगा होगा. पर रोज की तरह जब शाम को बात शुरू हुयी तो रोक नहीं पाया. मेरा बोध ही जैसे मुझे बुलवा रहा था.
"मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ. आज बहुत याद आ रही  हैं तुम्हारी"
"आज ध्रुव को मैं कंधे पर बिठा के रामलीला दिखता.."
"हाँ हाँ, दिखाते, दिखाई तो नहीं न!!"
"दिखाऊंगा. अभी वो बहुत छोटा हैं."
उसका गुस्सा वाजिब था. दशहरा के दिन आचानक शाम को कॉल आया.
"हम अभी भारी भगदड़ से निकले हैं. एक पल के लिए ऐसा लगा सांस घूँट जायेगी."
"कहाँ हो?"
"रामलीला ग्राउंड में. ध्रुव को रावण दहन दिखने आई थी."
"क्यों???"
उस दिन मुझे बहुत गुस्सा आया उसपे. क्या जिद्द हैं! अजीब सरफिरी थी वो. बस इतनी सी बात पर अपनी और ध्रुव दोनों की ज़िन्दगी दाव पे लगा दी.
"तुम मेरी कही बात क्यों एकदम नकार देती हो? पता हैं कितना दुःख होता हैं मुझे. अब तुम मेरा बिलकुल आदर नहीं करती"
"बहुर आदर करती हूँ. पर आपकी बातें. कुछ मेरे लिए नहीं हैं. आपका परिवार हैं. मैं कौन हूँ?"
"ये क्या तरीका हैं? तुम्हे पता हैं मैंने क्या कुछ नहीं किया तुम्हारे लिए."
"हाँ उसी वजह से में तुम्हारे साथ हूँ. मजबूर हूँ."
"तुम्हे मुझ से ज्यादा उस साले सप्रा की बातें ज्यादा सही लगती हैं. मेरा तुम्हारी ज़िन्दगी में जगह ही क्या हैं?"
"हाँ. आपकी हर बात हि मानती आई हूँ. इसलिए इतने दर्द में जी रही हूँ."
"ये दर्द तुम्हारी अपनी सोच हैं. मैं तो तुम्हे हमेशा खुश देखना चाहता हूँ. अब जवाब दो, क्या हैं जो तुम आधा सच बता कर दुसरो से साहनभूति लेती हो. अपने दोस्त मीता के बात करोगी तो पुरे कमांड में. पर उन कुत्तों के सामने रोती हो. तुम्हे सहानभूति क्यों चाहिए. क्यों दिखाती हो उनको अपनी कमजोरी."
"हाँ! मेरी तरह झूठी ज़िंदगी जी के देखो"
"क्या कमी हैं तुम्हारी ज़िन्दगी में. मैं हूँ. इतने प्यारे बच्चे. बस तुम्हारी जिद हैं"
"सब झूठ!!"
मैं उसका गुनाहगार था. पर अब उसकी खरी-खोटी सुनने की हद ही हो गयी थी.
आज में उसको अपना बुरा अतीत मान के आगे बढ़ गया हूँ. उसकी जिद्द हैं की वो मुझे ढो कर चिता तक जाएगी. शायद मैं ही उसे नहीं समझ पाया.

सोमवार, अगस्त 26, 2013

मजबूती..

आज "खबसूरत बहु" देख कर अम्मा बहुत याद आई.. ब्रजभूमि के पित्रसत्तात्मक मौहौल पर बेहतरीन नाटक. पर अजीब विडंबना दिखाई हैं! हर औरत मजबूत, अपना हक और अपनी अस्मिता का पूरा अहसास था उसको. आदमी सब एक से बढ़ कर एक नमूने.
मैंने १२ पास की थी. गाँव में रहना पसंद था. पर घर के काम काज में थोडा जी नहीं लगता था. लड़की हो कर काम-चोर, कैसे चलता आगे! शायाद यही वजह थी की माँ-पापा ने मुझे ३ महीने गाँव में रहने को कहा.
पौ फटने से पहले उठना होता था घर की बहु-बेटियों को... न उठे तो अम्मा लेटे-लेटे दो चार गलियां सुना देती...
बहुऔ को बहुऔं सी, बेटियों को बेटियों सी.
"करमजली रात भर में तेरे चुतर न दुखे... एक सेर चक्की पीसवे में दुःख जात हैं".
"कुतिया लेटी रह, कुत्ते उठ गए तो चाटवे लग जायेगे"
ये तो सुबह का प्रसाद था. अभी तो दिन भर सैकड़ो बार रांड, रंडी, कढ़ी खाऊ तेरी, दीयो जराऊ, तेरो पेट फाड़ दू ... सुनना बाकि था.
काम उतना था नहीं, जितना वो निकाल निकाल के देती थी, हम बहनों को.
सुबह शुरू होती गाय-भैंस के दरबे की सफाई से. कचरा-गोबर ले कर छबरा ऊपर तब भरवा देती.. इतना भारी की मेरी पतली गर्दन टेक नहीं पाती...
"रंडी, देखो तो मुडिया कैसे मटका रही हैं, चुतर में दो पड़ेंगे तो अभी सीधी हो जावेगी..."
५-१० किलो आटा मढ़ता था पुरे २०-२५ के परिवार के लिए. मेरी ड्यूटी लगती तो जान ही निकल जाती. इतनी पतली कलाई थी की आटा माढ़ते-माढ़ते कलाई सूज जाती... पर अम्मा कहा पिघलने वाली थी..
"अरे भरे पुरे ससुराल में चली गयी तो क्या सबको भूखे मारेगी"?
अगर बाल में कोई सुन्दर रबर-बैंड लगा होता, तो उसे खीच के तोड़ डालती.
"नचकनी, रंडी बनेगी क्या..."
एक पल के लिए लड़की ओझल होती तो दुसरे तो भेज के उसको बुला लेती. एक-एक का हिसाब रखती.. कौन कहाँ गया हैं और कब से. खेत जाना हमारे लिए जेल से निकलना था. वहा के काम चाहे दाले बिननी हो या टमाटर तोड़ने हो, पर थी पूरी आज़ादी.. हाँ बीच बीच में वहां भी हाजरी लग जाती थी.
पर रात तो सबको खाना खिला के जब हम खाने बैठते तो तुरंत आ जाती और चूल्हे पे बैठ जाती. गरम-गरम फुल्के उतारती और उसपे इतना घी उड़ेलती की, रोटी चुने लगती थी. हाथ से मरोड़ कर हमारी थाली में रखती जाती... जितनी कठोर दिन में होती, उतना प्यार रात में निकलता.. फिर कुछ अच्छा सा गीत या कविता का बोनस फ्री...
"नर हो न निराश करो मन को..., कुछ काम करो कुछ काम करो..."
एक दिन अम्मा को अजीब भूत सवार हो गया. गेहूं के भरे बोरे इधर से उधर रखवाती जा रही थी.इतने भारी की खिसकने में जान निकल जाए, वो तो कंधे पे रख कर ले जाने को कहती. मैं बहुत मजबूत थी नहीं. ३०-३५ की होंगी. शरीर में बिलकुल ताकत नहीं थी. पर अम्मा कहाँ कुछ समझने वाली थी. पूरी दोपहरी यही चलता रहा. एक कमरा खाली जो करना था! जिद्द थी बस उनकी, करवाना हैं तो सिर्फ मुझ से.
उस कमरे के नीचे गेहूं की एक बड़ा भण्डारण था. ख़तम सा हो गया था. अन्दर जाने वाला रास्ता खुला पड़ा था. इतनी बुरी तरह से थक गयी थी की ठीक से चल भी नहीं पा रही थी. एक बोरी को आगे-पीछे करते एक पैर उस भण्डारण ने चला गया. एक पैर ऊपर रह गया. सब इतने झटके से हुआ की चक्कर आ गए. किसी तरह निकली तो उलटे डांट पड़ी..
"आँख न ये याकि.. बटन हे. गड्ढों न दीख रओ याकु!"
कुछ देर बाद ऊपर छत पर मुतने गयी तो टट्टी की जगह अजीब की सुरसुराहट हो रही थी. हाथ से महसूस किया तो कुछ केचुया सा लगा.. उसे पकड़ कर खीचे लगी तो मुआ खिचता ही चला जाए.. पूरा दो फीट का रहा होगा. जब पूरा निकला तो चैन आया, और कुछ खून भी..
आज अम्मा की दी हुयी मजबूती के सामने दुनिया की हर मुसीबत छोटी हैं.. आज भी शायद वो जो मुझे कमज़ोर बना रहा हैं उसको मुझे उस चाटुकार की तरह निकाल फेकना हैं... नहीं तो वो परजीवी मुझे अन्दर ही अन्दर खोखला कर देगा... हर गड्ढा जो राह में मिलता हैं, शायद उसी के आगे, आगे जाने की सीढ़ी भी हैं!

मंगलवार, अगस्त 20, 2013

आग...

शादी के ११ साल हो गए थे. आधी उम्र बीत गयी थी.
जन्म एक लड़की का हुआ था पर औरत कभी नहीं बन पाई थी. उनके मुंबई के बैंडस्टैंड में मिलने ने शायद मेरे अन्दर की आग को चिंगारी दी थी.
क्या होती हैं ये आग! जब २२ की उम्र में पहली बार किसी मेरे हाथ देखने के बहाने मेरा हाथ छुआ था तो एक अजीब सी सिहरन हुयी थी. वो आग थी. जब दिल्ली से जयपुर की रात की वॉल्वो बस में उसने अपना हाथ मेरी छाती पे रखा था. वो आग थी.
पर वो आग मुझे कभी नहीं भूलती जो उस आधी उम्र के लड़के ने मुझमे जगाई. मुझे मेरे औरत होने का पहली बार पूरा अहसास दिलाया.हम एक सोशल ग्रुप में मिले थे. मेरी ईमेल से काफी प्रभावित था वो. एक दिन अचानक उसने बताया की वो नॉएडा आ रहा हैं अपनी मासी के पास.
"सन्डे हैं! कॉफ़ी पियोगी आप?"
सेक्टर-१८ में नया नया बारिस्ता का प्यारा सा कैफ़े था. पहचाने में कोई परेशानी नहीं हुयी. उसकी फोटो देखी हुयी थी. हमने कॉफ़ी आर्डर की. जनाब पुरे के पुरे आग थे. तीखा नैन नक्श. शरीर कसरत से भरा-पूरा.
मैं बड़ी थी. पहल भी मुझे ही करनी थी. बड़ा स्टाइलिश मोबाइल था उसके पास. उसके हाथ से छीन कर उससे खेलने लगी. भारतीय क्रिकेट टीम की फोटो देख कर मुझसे रहा नहीं गया.
"ये क्या हैं?"
"मेरा कजिन हैं"
"कौन?"
"हाँ उसके की घर पे आया हूँ. उसका छोटा भाई नीचे इंतज़ार कर रहा हैं!"
उसकी नशीली आंखें और डोले-शोले मेरे तन-बदन को ख़ाक कर चुके थे. उसका हमारे बीच में रखा हुआ हाथ मैंने अपनी तरफ खीच लिया. एक छोटी की चोट को सहलाती हुए बोली. "कैसे लगी?"
शायद मौका मिलता तो हम उस दिन ही अपनी आग बुझा पाते...
कुछ दिनों बाद उसने गुडगाँव में जहाँ नए नए माल बने थे एक मूवी देखने के लिए बुलाया.
सुपरमैन की कोई मूवी थी. मूवी तो क्या देखी हाँ पॉपकॉर्न खाते खाते एक दुसरे का पूरा आनंद लिया.. एक हरे रंग की टीशर्ट पहली थी.कसी हुयी बाहें, रोल की हुयी शर्ट. बस इंतज़ार था की वो मुझे अपनी बाहों में कस ले.
आज उस बालक को सलाम करने को मन करता हैं. वो जिसने मुझे औरत होने का पूर्ण अहसास दिलाया. बिना किसी जज़्बाती रिश्ते के. बिना किसी बंधन के. उस दिन पता चला की वो आग जिसके लिए सिर्फ मर्द जाने जाते हैं वो मुझ में भी हैं. मैं भी जिंदा हूँ.

सोमवार, अगस्त 12, 2013

शीशा-ए-दिल

हॉस्टल में आखरी दिन था. मेरी पोस्टिंग दिल्ली हुयी थी, इसलिए सोचा अगले दिन आराम से चली जाउंगी. भैया के घर ही तो जाना था. जिनको बाहर जाना था, वो रात में ही चले गए थे. बचे सिर्फ वो जिनकी ट्रेनिंग पूरी नहीं हुयी थी या हम जैसे फुरसतिया.

सुबह हुई तो पेट में बहुत तेज दर्द था. इतना की बिस्तर से उठाना ही मुस्किल हो रहा था. मन किया, नीचे जा कर किसी को बता दूं, फिर ये सोच के रुक गयी की ऐसा-वैसा ही दर्द होगा, कुछ देर मैं ठीक हो जायेगा. कभी डर सा भी लगा, कल रात राजेश के घर खाने पे गए थे तो वापिस आते वक्त सीड़ी पे चक्कर आ गए थे, कुछ तो जरुर परेशानी हैं. वैसे जब मैंने सीमा की मदद की और १०-१२ लोगों के लिए रोटी बनायीं थी, तब तो सब ठीक ठाक था.

प्रेम को मैं पिछले एक साल से ही जानती थी. पर हमारे बीच एक अजीब सा रिश्ता था. शायद प्यार था. मैं अक्सर कमरे में उनके लिए खाना बनाती. मेस में मुझसे डब्बा छीन लेते और मुम्बैया टपोरी की तरह कहते,
"उइच मेरा हैं, और किसी को देखने का भी नहीं..."
अक्सर हम पुलाव बनाते तो मेस में नहीं खाते. सदर जा कर ताज़ी सब्जियां लाती. पर जाती उनके सह-पाठी के साथ, वो तो नवाब साहब थे. शायर थे. थोड़े अख्हड़ थे. छोटी छोटी बात में लोग को सुना देते थे.

अचानक रूम की घंटी बजी. लगा एसे में तो सिर्फ भगवान् आ सकते हैं. लड़कियां सब जा चुकी हैं. लड़के भी ज्यादातर जा चुके हैं, या सुबह वाली बस में जाने की तय्यारी कर रहे होंगे. हिम्मत कर के दरवाज़ा खोला. श्री था.
"क्या हुआ तुमको. मैं विक्स लेने आया था. कहाँ रक्खी हैं?"
"कुछ नहीं पेट मैं दर्द हैं. बहुत तेज!"
मैंने अलमारी के तरफ इशारा किया. कुछ दिन पहले जब मुझे बहुत तेज जुखाम हुआ था तो श्री से विक्स मांगने गयी थी, तो सबको बताता फिर रहा था, "मेढ़की को जुखाम हुआ हैं..."
अभी एक पल ही बीता होगा और प्रेम मेरे कमरे में आ चुके थे. नाराज़ थे.
"क्यों नहीं बताया."
दर्द में करहाते हुए सोचा, कैसे बताती...


तुरंत गोद में उठा कर चल दिए.. इतना कम वजन भी नहीं था..मुस्कुराते हुए सीडियों से उतारने लगे..

"भारी हो.. पर उठा सकता हूँ"

नीचे सोफे पे बैठा कर तुरंत केयर-टेकर के पीछे पड़ गए..

"फ़ौरन जीप मंगवाओ!"
जब तब जीप आ नहीं गयी पूरा इंस्टिट्यूट सर पर उठा लिया...


हॉस्पिटल में डॉक्टर ने देखते ही शक किया की ये अपेंडिक्स का दर्द हैं. दर्द की दवाई दी और कहा की इसका जल्द की ऑपरेशन करवाना होगा.
शाम तक हॉस्टल वापिस आ गयी थी. बाकि दोस्तों ने प्रेम को मेरे साथ नीचे के एक कमरे में सोने को कहा. दर्द था पर उनका साथ दर्द को कम कर रहा था.. हम हाथ पकड़ कर एक साथ कब सो गए पता हि नहीं चला.
अगले दिन फिर दर्द था. हॉस्पिटल में भरती होना ज्यादा ठीक लगा. तुर्रंत हॉस्पिटल पहुँच गए. मम्मी-पापा कानपूर गए हुए थे. आने में १-२ दिन लगने की उम्मीद थी. उन दिनों मोबाइल भी नहीं थे. बड़े मुस्किल से तो बात होती थी.
प्रेम ने हॉस्पिटल में मेरा पूरा ख़याल रखा. खाना मेरे मुह बोले भाई दिनेश के घर से आ जाता था.
अगले दिन प्रेम कुछ लेने बाहर गए थे. अचानक रूम का फ़ोन बजा, रिसेप्शन से था.
"आपसे कोई मिलने आया हैं."
मैंने आने को कहा. दो लोग आ कर बैठ गए. एक लड़का सा था और एक थोड़े बड़े.
"आप?"
"प्रेम जी यहीं हैं न?"
"जी"
कुछ देर में प्रेम आये, तो उनको देख कर थोडा घबरा गए. मैं बिस्तर पे पड़ी हुयी चुपचाप सब देख रही थी.
उनमे से जो बड़े थे अचानक बोलने लगे.
"आपके पिताजी ने कहा की जा के मिल ले. हॉस्टल गए तो पता चला आप यहाँ हैं. तारिख पक्की करनी हैं."
मुझे लगा जैसे मेरे दिल को किसी ने जोर से मसल दिया हो... चुप रही. प्रेम भी चुप थे. फिर बोले.
"आप जाओ घर, मैं पिताजी से बात कर लूँगा"
उनके जाते ही जैसे मुझे सांप सूंघ गया था. समझ नहीं आ रहा था की क्या करूँ. दर्द जैसे बहुत बढ़ गया था. आज मम्मी को आना हैं सिर्फ इतना याद था. प्रेम चले गए.. सदा के लिए!
“Have a heart that never hardens, and a temper that never tires, and a touch that never hurts." Charles Dickens

दिल कितना कमज़ोर होता हैं वो शायद उस दिन पता चला. ११ साल उस दर्द को पालती रही.. उस शीशे के टूटे हुए टुकड़े सजोंके रखे रही. वो टूटे हुए टुकड़े जो मुझे रोज़ लहुलुहान करते रहे...

रविवार, अगस्त 11, 2013

रस्म..

रस्म पूरी होते ही मैं कमरे से बाहर ऐसे निकली जैसे किसी बंद पंछी को एक दरवाज़ा मिल गया हो. तुरंत ऊपर वाले कमरे में भागी. कमरे में कोई बिस्तर नहीं था, पर नींद कहाँ आनी थी.
वो चाहते थे की हर किताब जो मैं पढ़ रही हूँ, उसपे अपनी समीक्षा लिखूं. "The SandGlass" लगभग ख़त्म होने वाली हैं. एक पतली सी किताब को रवि ने मुझे ये कह कर दी थी की हैदराबाद से पुणे के सफ़र में ख़त्म हो जाएगी... कहानी ऐसी की सोचा, किताब ख़त्म होते ही उन्हें तहे दिल से धन्यवाद् कहूँगी.
हैदराबाद के तीन दिन बड़ी जल्दी फुर्र हो गए.. प्रिया के साथ ने मेरी आत्मा और मन को तृप्त कर दिया था. प्रिया मेरी सहेली. सबसे प्यारी, सबसे न्यारी..
लगा सदियों बाद आज़ाद हुयी हूँ.. बहुतों ने मुझे मेरी बंदिशों से आज़ादी के सपने दिखाए, पर शायद अपने शिकंजे में कस के.. मुझे ऐसी आज़ादी और कहाँ मिलती. ज़िन्दगी का पूर्ण अहसास अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ.
अगले दिन सुबह रवि मेरे लिए कुछ अच्छी किताबो को ढूँढने में लग गए. "The Legends of Kasaks" ढूँढ रहे थे. बड़ा अनूठा तरीका था उनका अपने जीवन के अनछुए भाग को परोसने का, पूरी शाम हम सिर्फ एक शब्द "आज़ादी", "स्वतंत्रता", "Freedom"  को पलट-पलट के सेक रहे थे... मैं शायद अपने ही ख्यालों में थी की उन्होंने मेरी तरफ एक पत्ता फेक दिया, "क्या तुम सच में आज़ाद हो?" मैं मुस्कुरा दी...
वो आगे बात करते रहे, जैसे मेरी मुस्कराहट में उनको जवाब मिल गया हो..
"आज़ादी - विशवास में और त्याग में हैं.."
विश्वास क्या हैं हम घंटों डिबेट करते रहे..
"विश्वास गरीब के लिए रोटी और पापी के लिए धर्म हैं! पैरों को कदम पर और शरीर को दीमाग पर विश्वास होता हैं. विश्वास पितृत्व की तरह हैं जिसको सिर्फ जिसने जीया हैं वो जान सकता हैं, जैसे की माँ!"
मैं उनका दर्द समझ रही थी, वो उस आस्तीन के नीचे के घाव की तरह, जैसे मेरी नज़र पड़ती तुरंत छिपा देते.
प्रिया मेरी प्रिय, मेरी चिकर-चिकर करने वाली दोस्त, जिसके प्यार करने का तरीका ही अनोखा हैं. मुझे हद का परेशान कर देती थी. कहती थी लगता हैं हमें एक दुसरे का स्पर्श अच्छा लगता हैं. शायद हमारे पार्टनर में जो कमी हैं वो पूरी होती हैं. मुझे इधर उधर चुटी काटती रहती, जबतक मैं उससे इतने जोर के काटती की वो कुछ देर तक अलग रहती. सिर्फ कुछ ही देर के लिए :)
जब हम हॉस्टल से बिछड़े तो वो कई दिनों तक सो नहीं पायी थी...
हॉस्टल के दिन भी कितने प्यारे थे. जब सबको क्रिकेट देखना होता तो हमे "Godfather" देखना होता. और वो  अपनी बदमाशियों से सबको टीवी रूम से बाहर निकलने में सफल होती. रह जाते सिर्फ हम दोनों.
वो मुझे एअरपोर्ट से रात के एक बजे अपने पति के साथ आई थी. हमारा मिलना, गले मिलना और चुम्बन देख कर उनको कुछ आराम तो मिला होगा. वो एक हाथ से शिवी को पकडे थे और दुसरे से हमारा भारी बैग.  प्रिया बहुत कमज़ोर और पिली लग रही थी. मैं उसका दर्द समझ रही थी... कुछ दिन पहले रवि ने ही मुझे उसके लिए खोज निकाला था.
उसके ज़िन्दगी में मैं १५ साल बाद आई थी. फिर भी इतना समझ आ गया था की वो क्यों पथ-भ्रस्त हैं. वो धरातल में रहती थी और वो अपने सपनो की दुनिया में. वो अपने मूल्यों में रहते थे और वो अपने संसारिकता में रहती थी. प्रिया उतनी ही स्वार्थी थी जितना की उनका  निस्वार्थ भाव !
वो काफी भूखे थे जब वो हमे शाम की फ्लाइट के लिए छोड़ने आये. प्रिया फटाफट उनके लिए दोसे बना रही थी. सुबह का बासी खाना के एवज में कुछ अच्छा तो बनता हैं. रात इतने देर से सोये थे, की सुबह समय से उठे ही नहीं. रवि को रात का खाना दे कर ही भेज दिया.  मैं उनके सामने बैठी शिवी के बाल कर रही थी. और वो अपने हमेशा की तरह दरियादिल व्यव्हार में हम चारों को अपने हाथ से डोसा खिला रहे थे. मुझे नन्ही मिन्नी वो मेरे बगल में बैठी थी, से भी कौर मिल रहे थे. मेरी तो चांदी ही चांदी थी...
वो चाहते थे की मैं रोमेश गुनासेकारा की "The Sandglass" की समीक्षा लिखूं. पर में तो एक अपनी ही कहानी लिख गयी...
अकेले होते ही मैंने उनको कॉल किया. झूठ बोला था की मैंने कोशिश की. मेरी दो मिनट की रसम पूरी हो गयी थी. और वो नीचे चले गए थे. वैसे भी उस छोटे पलंग में नहीं सो सकती थी, इस रस्म के अलवा और कुछ हमारे बीच था भी तो नहीं. मुझे मेरा हिस्से का मिल गया था.
सोचती हूँ क्या मजबूरी होती हैं की हम उन रस्मों को जीते चले जाते हैं जिसमे हमारी आत्मा मरती चली जाती हैं... क्यों नहीं आज़ाद हो पाते हम इन रस्मों के चंगुल से? प्रिया आज इन रस्मों से आज़ाद हैं, मुझे कब आजादी मिलेगी?

शुक्रवार, अगस्त 09, 2013

मन बांवरा..



आज ऑफिस जाते वक्त, गगन से बात करते-करते मेरे चार मन की बात निकल पड़ी. उसने पिछले दो हफ्ते का मेरा पागलपन की कोठारी से आसमान के फेलाव तक का सफर, काफी नजदीक से देखा हैं.
ये मन भी बड़ा अजीब हैं, न जाने कितनी आँखों से देखता हैं. आज ही देखो न जाने कितने मन साथ-साथ काम कर रहे थे. एक मन हैं जो पुराने पल में गोते खा रहा हैं, एक मन जो नए खालीपन में नए रंग भर रहा हैं. एक जो सोच रहा हैं की पुराना पल अच्छा था जब मैं उनके लिए पागल हो गयी थी, या अब जब मैं उनकी तिलांजलि दे कर आज़ाद हूँ. और एक मन जो ७० की रफ़्तार में सड़क पर ध्यान देते हुए गाडी आगे बढ़ा रहा हैं...
मैंने इस मन से अपने आप को रोते देखा हैं, हँसते देखा हैं, दर्द में देखा हैं और पागल होते भी देखा हैं. कभी मन के घोड़े रोके नहीं रुकते तो कभी एसे थम जाते हैं जैसे समय ही रुक गया हो.
अच्छा- बुरा सब देखा हैं इस मन ने. सच्चे जीवन-साथी की तरह. कभी भागना चाहा खुद से, तो मेरी चोरी पकड़ी.. हाथ पकड़ के रोक के बोला भी वो, “कहाँ जाओगी? जहाँ जाओगी हमें पाओगी!”... “कुछ देर और पागल हो लो, बाद में मैं संभाल लूँगा.”
इस मन का क्या हैं. कभी सिर्फ एक हो जाता हैं, तो कभी बिखर-बिखर कर सब जगह रायता फेला देता हैं... और जब एक हो जाता हैं तो परम-आनंद हो जाता हैं. और जब बिखर जाता हैं, तब बटोरना मुस्किल हो जाता हैं...
और प्रेम!! इस में तो सिर्फ एक मन रह जाता हैं... दो बदन एक मन! 
मन ही इस चित्त का सही दर्पण हैं. पर कितने पढ़ पाते हैं किसी और का मन? मैंने पढ़ा क्या उनका मन?

सोमवार, अगस्त 05, 2013

विश्वास

अजीब दुनिया हैं, कभी अपने विश्वास करना छोड़ देते हैं तो कभी राह पर चलने वाला अकथ विश्वास कर लेता हैं...

आज कुछ ऐसा ही हुआ, सचिन दा के गाने सुनते सुनते पता ही नहीं चला की कब ९:३० बज गए. Epicenter से बाहर निकली तो गार्ड बोला, अब ऑटो मिलना मुश्किल हैं, गोल्ड सूक जा कर कोशिश करूँ. चल दी, मन में अजीब ख़याल, यह वही गुडगाँव हैं जहां कुछ दिन पहले किसी महिला का सड़क से उठा कर बलात्कार हुआ था; फिर मन को समझाया तो मन में कुछ सकारात्मक विचार भी आने लगे. कोई भला इंसान तो होगा जो गाडी रोक कर पूछेगा...
दो फल वाले, और उनके पास रुकी गाडिया पार की, कुछ लोगों से बात करने की कोशिश की, इन्तेज़ार था कोई कुछ पूछेगा. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ!
कुछ १०० मीटर आगे आई, तो अचानक एक प्यारी सी लड़की ने गाडी रोकी. 

बोली, "do you need a drop somewhere?". 
कुछ हिचकिचाहट हुई. पर जब उसने दरवाज़ा खोला तो मैं बैठ गयी. 
मैंने बड़ी हिम्मत से बोला "can you leave me at the crossing? i will get an auto". 
मुझे पता था शायद ऑटो वहाँ भी न मिले. हम क्रोस्सिंग पर पहुंचे, तो मेरे बोलने से पहले बोली, "कोई बात नहीं, आपको आगे छोड़ देती हूँ." अपना नाम प्रज्ञा बताया. हमने कुछ दिल की बातें की! मुझे छोड़ कर काफी देर तक हम एक-दूसरे को देख कर हाथ हिलाते रहे...
जब आपका अच्छाई से विश्वास उठा रहा हो, तो भगवान् इंसान रूप में आ कर आपको विश्वास दिला देता हैं की "हर इंसान में अच्छाई हैं"... उसे देखो, समझो और जानो तो जीवन कितना खुबसूरत हो जाता हैं...