पैर छूना आदर है। हमारी संस्कृति का पीडीआर (pdr- public display of respect)! बड़े है तो आदरणीय होगें ही! आदरवाद हममें जन्म से इतने प्यार से कूट कूट को भरा जाता है हर समय ये हम पर सबसे ज्यादा हावी रहता है। बीवी गर्लफ़्रेंड हमें कम उम्र की चाहिए- फ्री में आदर मिलेगा। बड़ों के सामने तुरंत खड़े हो कर उन्हे जगह न दो तो हमें संस्कार याद दिलाए जाते है। सास पूरा दिन बैठी रहे पर बहु काम ख़त्म करके पैर न दबाए तो असंस्कृत! बस लड़कियाँ शादी के पहले बच जाती है, हमारे यहा! वो किसी के भी पैर नही छूती पर उनकी मामा मामी चाची उलटा लडकियों के पैर छूती है! लडके तो एक-दो साल के हुए नही की उन्हे सभी बड़ों के पैर छूना सिखाते है। पर शादी हो जाए तो ससुराल में लडकी की दादी भी उलटा दमाद के पैर छूती है। ससुराल में सब लडके और उसके घर वालों से छोटे है आदर में!
हम भी यूँही बड़े हुए है। मम्मी चाची सबको खूब करते देखा। नानी को पापा के करते देखा। हमारे लिए भी पैर छूना आदर देना का पर्याय बन गया। बड़ा शौक था की पति के पैर छुएँगे। पर शादी हुई तो पति के प्रति वो आदर ही नही पैदा हुआ और हमने कभी पैर नही छुए! पर फिर जब संजय से रिश्ता हुआ तो पता नही क्यों वो पैर छूने की ख्वाइश को जगह मिल गई। उसे भी अच्छा लगता और हम भी मिलने बिछड़ने पर करने लगे। कभी कभी सो जाते तो उसके पैर पर सर रख कर सोने में बहुत सुकून मिलता।
४ मई २०१२ को जब एक तरीक़े से रिश्ते का अंत हुआ तो १९ अगस्त उसकी बीवी से मुलाक़ात पर पूरी आत्मस्वीकृति करना मेरे लिए तो रिश्ते का अंत था पर कबीर को अपने मन्ना का छोड़ना बहुत ही मुश्किल था। मन्ना मन्ना रटते रहते थे, पर मेरे सामने कम। बहुत समझदार बचपन से है। एक बार पॉटी करते हुए मन्ना मन्ना गा रहे थे। मैने चोरी से रिकोर्ड करके संजय को ईमेल किया। संजय का कभी कोई जवाब नही आया!
फ़रवरी २०१३ में कबीर बहुत बिमार चल रहे थे। तो लगभग एक साल होने पर भी मन्ना को याद करके हुए कहते की मन्ना क्यो नही आते। एक दिन सुबह जब वो याद कर रहा था तो मैने ठान लिया की आज ले चलती हूँ इनको इनके मन्ना के पास। शनिवार का दिन था फ़रीदाबाद के अरावली पहाड़ी पर वॉक मे बाद मैं सूरजपुर कलैक्टरेट (ग्रेटर नॉयडा) कबीर को ले कर पहुँच गई। काफी भीड़ में पुछते हुए मै ऑफ़िस के सामने पहुँची। एक्साइज इंस्पेक्टर ढेरों होगे। हॉल से में बहुत सारे स्टाफ़ के बीच उनकी जगह थी। मैं बाहर ही रही और कबीर को इशारा किया। कबीर मन्ना बोलता हुआ दौड़ कर संजय के पास पहुँच गया। पाँच साल के होने वाले थे। संजय उठे, कबीर की ऊँगली पकड़ी और बाहर आ गए। मुझे देख बाहर को निकलने लगे।
"कैसे आई हो?"
"गाड़ी से।"
"कहा है गाड़ी?"
"उधर!" मैने इशारा किया।
हम चल के गाड़ी के पास पहुँच गए। सेकरैटेरिएट की बाउंड्री के पास गाड़ी खड़ी थी। बाहर स्टाफ़ पब्लिक की भारी भीड़ थी। संजय गाड़ी के पीछे ड्राइवर साइड पर खड़े हो गए। कबीर चलो चलो करता हुआ गाड़ी के अंदर घुस गया। मैं उसके ठीक सामने खड़ी हो गई। पीछे बहुत गहरा नाला था। मन किया पीछे धक्का मार दूँ। मैं संजय के चहरे को देख रही और संजय मुझसे आँख चुरा रहे थे।
"गाडी कब ख़रीदी?"
"दो महिने पहले!"
"अच्छी पसंद है!"
मैने कुछ जवाब नही दिया। मुश्किल से दो मिनट हुए थे। अचानक मैने दो करारे झापड़ संजय के गाल पर जड़ दिये। फिर लगा ग़लती हो गई। तुरंत बोली गाड़ी में बैठो। गाड़ी बाहर निकाल कर मैंने ऑफ़िस से ५० मीटर की दूरी पर खड़ी कर दी। मैं बकने लगी। पता नही क्या। वो भी जवाब देता रहा पता नही क्या। खूब घूँसे मारे जा रही थी तभी देखा मेरे झापड़ की वजह से संजय के कान से खून निकल रहा था। नई गाड़ी में फ़र्स्ट एड किट सलामत था। तुरंत निकाल कर दवाइ लगाई। रुई से दबाया तो पता चला मेरा अँगूठा झापड़ मारने की वजह से सूज गया है। और बहुत दर्द हो रहा था। संजय भी परेशान हो गए।
"दिखाओ। पास में डॉक्टर को दिखा देते है।"
"नही कुछ नही है जितनी चोट दी उसके मुक़ाबले!" मैने हाथ दूर करते हुए कहा।
मै सिर्फ कबीर की बात करती रही और संजय उसे छोड़ सब कुछ। इस पूरे समय कबीर सहम कर पीछे वाली सीट पर जा कर चुपचाप लेट गए।
हम दोनो ठंडे हुए तो संजय फिर बाहर निकले तो मैं भी बाहर आ गई।
"हम कबीर की वजह से आए है, आप बात तो कर लो।"
"क्या बात करनी है!"
"प्लीज़ करो न बात।बेटा है तुम्हारा!"
"कबीर कैसे हो आप।"
"बेटा पूछो मन्ना से क्यो नही आते हमसे मिलने। मम्मा हर बार नही जवाब देगी। चलो बाहर आओ!"
"कबीर आप कौन से क्लास में हो!"
"एक साल में भूल गए बेटा किस क्लास में है!" मुझे हँसी आ गई!
"मन्ना आप हमारे पास क्यो नही आते?" कबीर पीछे गाड़ी की ज़मीन पर दुबके हुए बोले।
"आएँगे कबीर!"
ये संजय को कबीर के आखरी शब्द थे!
फिर मैं संजय के नज़दीक पहुँच पर चिपक गई। उस आलिंगन में और उससे पिछले सात साल के आलिंगन में आज भी मैं अंतर ढूँढने की कोशिश करती हूँ। होगा तो मिलेगा शायद!
फिर मैं झुकी मैने दोनो हाथो से संजय के पैर छुए और माथे पर लगाया और तुरंत दूसरी तरफ आ कर बाय बोल कर गाड़ी दौड़ा दी वापस गुड़गाँव! ये हमारी आखरी परिवारिक मुलाक़ात थी।
कबीर आज भी मुझे यही कहते है आपको मन्ना से नही लड़ना था। आप लड़ी इसलिए मन्ना हमसे मिलने नही आते!
उसने अपनी मम्मी और मन्ना को लड़ने के बाद हग करते हुए और मम्मी को मन्ना के पैर छूते नही देखा था!!
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