सोमवार, अक्टूबर 23, 2017

नन्ही कली


बचपन से जवानी के अवस्थांतर का हमारा समय नागालैंड में बीता। मैं और मेरी सहेली जूली क्लास में बाकी बच्चों से छोटे थे। आठवीं में थी तो खूब लैंगिक हँसी मज़ाक़ सुनने को मिलता। हर किसी का नाम का ब्रैंड का फ़ुल फ़ोर्म हो जाता! जैसे 'Amita' का 'alright meet-me in the attic' या 'Capstan' का ' come and play sometime at night'. बहुत खुला माहौल था और लड़के लड़कियाँ अपने पहले अनुभव साझा करने में हिचकिचाते नही। इसाई थे पर प्रीमेर्रिटल सेक्स पर कोई रोक नही थी। पर कोई प्रेगनेंट हो जाती तो बहुत बवाल हो जाता।। कोई लडकी १५-२० दिन स्कूल न आए तो सब शक करते की फलांफला ने प्रेगनेंट कर दिया है।पर ये बातें खूब होती खुसर पुसर! यही मेरी पहली सेक्स एज्यूकेशन थी।
इधर बड़ा होना क्या होता घर पर किसी ने न बताया। पर घर में टटोल टटोल कर जो होता पढ़ डालते। गीता प्रेस की स्त्री सुबोधिनी जो नाना ने मम्मी को शादी में दी थी वो तो आठ-नौ साल में पढ़ ली थी। ऐसे ही ख़ाक छानते हुए पापा के मम्मी को पत्र या पापा की निजी डायरी पढ़ डाली। पापा के एक स्टाफ़ में नई लडकी थी जिनकी किसी IPS से एंगेजमेंट हुई थी और उनके पुराने बॉयफ्रेंड जो नागालैंड तक आ गया था उसको लिखे प्रेमपत्र और दीदी की डायरी। सब पढ़ कर ज़िंदगी को समझने की कोशिश में लगी थी। शरीर में बदलाव हो रहा था वो भी थोड़ा कोतहुल तो मचाया हुआ ही था। हमारा घर तो पहाड़ी के ऊपर था और आसपास बहुत सारी जगह जहा फल सब्जी मक्का सब कर रखा था। 
थोड़े दूर टाइप पाँच के क्वार्टर थे जो इतने बडे़ थे की ३-४ नए कपल को वही दे दिये जाते थे। मेरी एक सहेली सुमी वही रहती थी। मैं स्कूल से आने के बाद अकसर वही चली जाती थी। वहा बहुत बड़ा लिविंग रूम था जहा औरतों की बैठक होती रहती थी। सब खुल कर बात करते! हर तरह की अपने पति से अनुभवों के बारे में शादी से पहले के एडवेंचर। मैं नाटक करती की नही समझ रहा पर सब समझती। एक बार एक छोटा लड़का टेबल के नीचे घुस गया और ऊपर एक लडकी। ४-५ साल के होंगे दोनो, साइड से मुँह निकाल के लडकी बोली मैं मम्मी तू पापा और किस करने लगी! सब आंटी लोग हँसने लगे और एक ने जोड़ा बेटा बॉयज ऊपर होते तो दूसरे ने जोड़ा नही ये भी चलता कभी कभी!एक दिन में सुमी के पास गई तो उसने कहा दीदी आपको कुछ सुनाती हूँ। हम दबे पैर एक और कमरे के पास खड़े हो गए। शू शू करते हुए हमने पूरे लव मेकिंग को बाँस की दीवार के बाहर कान लगा कर मस्त सुना! हाय क्या अनुभव था आज भी सोच कर मु्सकान आ गई!सर्दी के दिन थे मम्मी लोग बाहर कुर्सी लगा कर बैठे थे मैं और सुमी बेड रूम को बंद कर रज़ाई में घुस गए। सर भी अंदर फिर दोनो ने एक दूसरे के शरीर को बढ़िया से महसूस किया। याद नही कितनी देर पर मेरा ये पहला सेक्सूअल एंकाउंटर था। रज़ाई से बाहर निकले तो मारे शर्म के हम भग लिए। हमने दोबरा नही कुछ किया पर जब मैने अब जल्दी में पढ़ा की औरत स्वभाविक तौर पर समलैंगिक है और हेटरोसेक्सुअल प्यार सिर्फ पितृसत्ता का छलावा तो लगा की शायद सही ही है!बचपन से जवानी के ये क़दम उस नन्ही कली की तरह होते हैं जिसे कोई मख़मली स्पर्श ही फूल बना सकता हैं। 

गुरुवार, जनवरी 26, 2017

अपराधी कवि

एक लोधा आदिवासी कवि को जेल हो जाती हैं।  उसका अपराध, आपराधिक जनजाति का होना।
वो कविता लिखता हैं जो अब लोक गीत हैं..  एक सुन्दर कविता, संघर्ष एक सरल समाज का सभ्य समाज से!!
वो सभ्य समाज जो बड़े दंभ से कहता हैं, "तुम असभ्य, तुम अशिक्षित, तुम भाग्यहीन, मैं तय करता हूँ तुम्हारा भाग्य।"

(असल गीत आदिवासी बंगला में हैं, मैंने अंग्रेजी वाले से हिंदी में लिखने की छोटी कोशिश की हैं। )


'नहीं जानता! भाग्य का क्या भगवान, खेल निर्दयी जो उसने खेला था! उन्होंने मुझे एक बदमाश सोचा, एक साधारण लोक -
और अदालत में भेजा है, बंधे हाथ
कौन भाग्य के खेल से बच सकता हैं? कोई भी आदमी, महान हो या छोटा! काश! मेरा भाग्य!
मैं एक बतख के रूप में पकड़ा गया था - और एक सेल में डाल दिया गया जमानत के बिना।
और मैं बहुत अकेला हूँ - और अपनी किस्मत को अकेले कोसता हूँ! अब से मुझे मिलेगा - सिर्फ एक आधा थाली,
और मैं भूख से हड्डी बन-
हो जाऊंगा एक कीड़े (बीटल ड्रोन) की तरह। हर एक संभावना से धूमिल - यह सब जेल की चाल है!
मैं प्रार्थना करता हूं! अच्छे और दयालु गार्ड ! ,कृपया मुझे आज़ाद कर दो। मैं हमेशा घर के लिए विलाप करता हूँ। सेल में अधिकारी ने, 
मेरे याचिका को असफल किया और उन्होंने लंबे समय तक सजा का समर्थन किया - उसके साहब ने उसपर ठप्पा लगाया; मुझे मिला एक जेल का किट - दोषी के ढीला पतलून और अन्य छूटपुट। और मेरे वार्डन को जब मैंने कारण पूछा उन्होंने मुझे बिना राहत या थमने के, काम पर काम देते गए;
बकवास! उन्होंने कहा, जेल इतनी कमीनी है! कठिन परिश्रम से परिश्रम करना होगा, पर थोड़ी देर भी आराम नहीं। इंसान जिस दिन हर दूसरे को इंसान समझेगा, उस दिन ही 'सबके' दुखों का अंत होगा।

मंगलवार, जनवरी 24, 2017

हमारा बजाज

आज बुआजी से मिलने गई तो फूफाजी ने बताया की उन्होने दो हफ़्ते पहले हमारा बजाज दो हजार मे बेच दिया। २३ साल पहले जब राजाजीपुरम, लखनऊ में मेरी पहली फ़िल्ड पोस्टिंग हुई थी तो पहली बार थ्री बेडरूम का सरकारी फ़्लैट मिला था। इधर उधर जाने के लिए गाड़ी बहुत जरूरी थी। फूफाजी ने सलाह दी की नया क्या लोगी, ये बजाज चेतक ले जाओ, यहा खड़े भी जंग ही लगनी है। पूरे चालिस किलो की मै और उस समय का सबसे भारी स्कूटर!! सुबह ऑफ़िस के लिए किक मारते हुए सर्दी मे तो १०-१५ मिनट लग जाते थे। पड़ोसी भी मेरी परेशानी देख कर अपने सुझाव देते नही थकते। एक बार बढिया सर्विस करवाने के बाद भी खास अंतर नही आया। बहुत बार जब शुरु नही कर पाती तो पड़ोस के गुड्डू से दोस्ती काम आती। पर मुझे जैसे पहली बार पंख लग गए थे। दोस्तो के यहा जाना या पूरे लखनऊ में घूमना, या ऑफ़िस की दौड़भाग सब आसान हो गई थी। एक बार चारबाग़ के पास भीड़ मे स्कूटर स्किड कर गया। इतना भारी था कि मुझसे तो उठने से रहा। जाम बढ़ने लगा तो लोगो ने मदद की। मदद क्या की सुनाया ज्यादा की जब उठा नही सकती तो चला क्यूँ रही हो! ख़ैर अपनी स्वच्छंदता की कुछ क़ीमत तो देनी पड़ती है।
छ: महिने बाद वापस ग़ाज़ियाबाद टेलीकॉम ट्रेनिंग सेंटर जॉइन करना था तो घर के सामन के साथ स्कूटर भी ट्रेन से भिजवा दिया। पर १० दिन बाद बाकी सामान तो मिल गया पर स्कूटर ग़ायब था। पता चला गलती से अमृतसर पहुँच गया है और वहा से वापस भेजा जाएगा। पूरे एक महिने बाद मै और एक दोस्त स्कूटर माल गोदाम से ले कर लाए। काफी हालत ख़राब थी। किसी तरह ग़ाज़ियाबाद तक लाया गया। फिर सर्विस करवाया और मेरे पहले जैसे दिन आ गए। हम कुछ दोस्त जिनके पास बाइक स्कूटर था, सब लाइन से रोज़ शाम को तफ़री के लिए निकलते। मेन गेट बंद होता था और मेरा सबकी तरह स्कूटर साइड गेट से बिना उतरे निकालने की ज़िद्द होती। सबसे भारी स्कूटर होने के बावजूद एक दो बार मे अच्छी प्रेकटिस हो गई थी। वैसे मुझे उन दिनों बाइक चलाने का इतना भूत सवार था की अपने बॉयफ़्रेंड की बाइक की चाभी छीन कर अपने स्कूटर की चाभी उसे पकड़ा देती थी! वैसे हॉस्टल मे एक गाड़ी होने का मतलब हमेशा चाभी घूमती रहती थी। किसी को ड्रोप करना है, कोई जरूरी काम सब मे हमारा बजाज बहुत काम आता था। मेरी रूममेट नीलम को ले कर लगभग हर रोज़ राजनगर जाना होता था। और एक बार तो उसे बिना बैठाए ही एक किलोमीटर चला ली फिर पता लगा की नीलम मेरी बात का जवाब क्यो नही दे रही थी :)
आने लगी तो भैया ने बताया की वो इसे हज़रतगंज के एक शोरूम से ६०० डॉलर दे कर ऑफ़ थ शेल्फ़ ले कर आ गए थे। उनके भी टेलीकॉम ट्रेनिंग का ये मज़बूत साथी था! आज उसकी कोई फ़ोटो नही है पर वो जहा भी है उसे सौ सलाम ठोकने का मन है! (फोटो इन्टरनेट से ली हैं, इसी 
कलर का था हमारा बजाज) 
ये ज़मीन ये आसमाँ, हमारा कल हमारा आज, हमारा बजाज.. बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज।।

रविवार, जनवरी 22, 2017

चुनी कोटल - भूली बिसरी कहानियां


आज रोहित वेमुला को शायद पूरा देश जान गया है। उसके मरने के तुरंत बाद के प्रोटेस्ट का मै भी हिस्सा थी। पर रोहित की आत्महत्या पहली संस्थागत हत्या नही थी! 
आपमें से कितनों ने चुन्नी कोटल का नाम सुना है? सुना भी क्यों होना चाहिए! वो एक असभ्य और अशिष्ट आदिवासी लोधा समाज की पहली कॉलेज जाने वाली लडकी थी। 
उसके साथ क्या हुआ था? बंगाली भद्रलोक को उसका आगे बढ़ना पसंद नही आ रहा था। एक जंगली और आपराधिक जनजाति की लडकी कैसे पढ़ सकती है! उसे प्रताड़ित किया गया और आत्महत्या करने पर मजबूर किया गया। शायद रोहित वैमुला से ज्यादा विभत्स केस था पर पिछड़े और अधिकारहीन की अपनी आवाज़ कहा सुनी जाती है। होती भी है तो उसे चुप करा दिया जाता है। पर उन्हीं भद्रलोक में से कुछ लोगों ने उसकी आवाज़ बनने की कोशिश की। ढे़रों पेपर और किताबें लिख डाले। नही तो शायद मै ये लिख नही पा रही होती! (वैसे रोहित वैमुला के माँ की जाति 'माला' भी मुलनिवासी जनजाति ही है जिसने हिंदू अधिपत्य को बहुत पहले मान लिया था!)


महाश्वेता देवी की किताब "ब्यधखंड" का रिव्यू न पढ़ा होता तो शायद उसे ख़रीदने का सोचती भी नही। वो जिस लोधा गाँव की काल्पनिक कहानी कह रही है उसका नाम भी अरिहारा है जो मेरे ननिहाल का नाम भी है! अरिहारा यानि दुश्मनों को हराने वाला गाँव! बचपन से लोधी समाज की वीर गाथाओं (oral histories) में सुना है की लोधों ने अंग्रेज़ों को बंगाल में सबसे पहले ललकारा था, जिस वजह से उन्हें बहुत प्रताड़ित किया गया, जंगलों में डकेल दिया गया, उनकी ज़मीन छीन ली गई और उन्हें आपराधिक जनजाति घोषित कर दिया गया। लोधों ने शायद सबसे लम्बे समय तक न सिर्फ ब्राह्मणवाद से लड़ा है पर अंग्रेज़ों को भी दाँतो तले उँगली दबानी पड़ी। यही कारण है आज भी ढेरों लोधी गाँव के अपनी ज़मीन और गाँव में ब्राह्मण और बनिए नही मिलेंगे! हाँ शहरीकरण और ब्राह्मणीकरण से वो उत्तर भारत में अनछुए नही रह पाए और १९३२ की लोधी महासभा में खुद को राजपूत और क्षत्रिय घोषित कर दिया! कल का मेरा शेयर किया फोर्वडप्रेस का आर्टिकल "क्या लोधा को हिंदू धर्म अपना लेना चाहिए" जो बंगाल, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के लोधा पर है, लगा की मेनस्ट्रीम इंडिया उन्हें सच में जीने नही दे रहा है! अजीब है, बचने के लिए आपको खुद के दुश्मन को साथ सोना पड़ता है! (Sleeping with the enemy)



वैसे किताब का नाम मुझे ज्यादा intriguing लगा। "The book of the hunter"! सोचिए कौन असल शिकारी है? वो जो पेट भरने के लिए और अपनी जल ज़मीन जंगल बचाने के लिए शिकार करता है या वो जो उनसे छल कपट से उनकी ज़मीन जंगल छीनते ही नही बल्कि जंगलों पर क़ब्ज़ा कर लेते है, उनके गाँव के गाँव जला देते है, उनके पढ़ने और आगे बढ़ने से रोकते है, वो जो उन्हें अपने शातिर तरीक़ों से रोज़ शिकार करते है!








History will be rewritten when the hunted will write about the hunter!