बुधवार, जुलाई 31, 2013

समर्पण..



बात ७ साल पुरानी हैं. २६ जनवरी २००६. "रंग दे बसंती" रिलीज़ हुयी थी. २१ फरवरी २००६, जेसिका
केस में मनु शर्मा और उसके साथियों को विमुक्ति मिली. जनता में भारी आक्रोश था. मोमबतियाँ जल रही थी...
हमें मिले कुछ चंद दिन ही हुए थे. पर हम पूरी तरह एक-दुसरे पर हावी थे...

वो, “मूवी अच्छी थी
न?”

मैं, “हाँ मैं बताना चाह रही थी”
वो, “असल में, मैं तुम्हे ये पहले बताना चाहता था.”
मैं, “बोलो, क्या पूछना चाहते हो!”
वो, “ये जो जेसिका के लिए हो रहा हैं, इसका रंग दे बसंती से लेना देना हैं...”
मैं, “हाँ मैं मूवी से सच मैं inspired हूँ!”
वो, “इसलिए मैं चाहता था की तुम उसे देखो!”
मैं, “देव और मैं साथ मिल कर उसपर research करना चाहते हैं”
वो, “किस पर”
मैं, “वो मेरी तरह इसकी तह में घुस कर कुछ करना चाहती हैं. हम दोनों को बहुत ख़ुशी मिलेगी. हम एक ग्रुप बनायेगे. जिसमे जेसिका को ले कर सारी जानकारी डालेंगे”
वो, “जेसिका पर”
मैं, “हाँ. एक महीने में देखिएगा हम सच बाहर निकाल देंगे. हाँ हम दोनों को लॉ नही आता. वहाँ आपकी मदद ले लेंगे.”
वो, “क्या जानती हो तुम जेसिका के बारे में?”
मैं, “देव ने मुझे आज के delhi times की आखरी लाइन दिखाई...”
वो, “delhi times :o”
मैं, “हाँ, उसका कहना था “जॉर्ज मनु शर्मा के पीछे २ बजे भागा..”
वो, “और जॉर्ज ने ऐसा क्यों किया??”
मैं, “क्या इतना साबुत काफी नहीं हैं? प्रश्न हैं क्यों भागा”
वो, “किसका”
मैं, “पूरे कोर्ट की proceedings में “क्यों” क्यों नहीं हैं?”
वो, “जॉर्ज कौन हैं? और क्या delhi times ये पहले नहीं जनता था?”
मैं, “वो बीना रमानी का पति हैं”
वो, “अच्छा, वो फिरंग”
वो, “आह! मेरे पसंदीदा elite वर्ग!”
मैं, “कोर्ट में वो सिर्फ अपने आप को बचाती रही. यही कि उसने खून के धब्बे मिटाए की नहीं..”
वो, “तुमने क्या सोचा था, की वो भगवान् हैं??”
मैं, “उसने जेसिका का साथ नहीं दिया.. अब delhi times में रो रही हैं”
वो, “delhi times. bastard tabloid!!”
मैं, “हमने बहुत देर चर्चा की”
वो, “दूर रहो इन सब से!!!”
मैं, “मैंने उसे मनु और उसके विकास और योगराज से रिश्तों के बारे मैं पता करने को कहा हैं!”
वो, “वाह.. मेरी जासूस... This is tiger calling ami... do you copy?"
मैं, “देव का पति उसकी मदद कर सकता हैं.. आज ही उसने नौकरी छोड़ी हैं, बेटा एक साल का हो जाये, उसके बाद फिर करेगी”
वो, “वो क्या करेगा इस मुद्दे पे? Stick his ass upto dp yadav?
मैं, “क्या पता, वो ऐसा ही हैं!”
वो, “हाँ हाँ!! बड़ा होगा!! इसलिए उसने तुम्हे बुलाया था?”
मैं, “पर देव अपनी मर्ज़ी की मालिक हैं. मैं उसे अच्छे से जानती हूँ!”
वो, “तो उसे जो करना हैं, करने दो अपने पति के साथ.. मैं उसके पति को जानता हूँ”
 मैं, “सच? कैसे?”
वो, “अब तुम चुप रहो! मैं उस जैसे हजारों को जनता हूँ. मैं उनके बीच में रह चूका हूँ. वो सब किया हैं. देव को खुद करने दो, जो उसे करना हैं..”
मैं, “वो मेरी प्यारी बहन हैं..”
वो, “अब, चुप्प!!”
मैं, “हम एक दुसरे को बहुत प्यार करते हैं”
वो, "why dont you just shut up!!"
मैं, “क्यों?”
वो, “ये सब बर्बाद हो रहा हैं. बिलकुल बर्बाद.”
मैं, “क्या, रंग दे बसंती?”
वो, “मैं तुम्हे आखरी बात समझाने की कोशिश करता हूँ”
मैं, “मैंने खुल के मूवी देखी.. पहली बार इतना खुल के..”
वो, “और अब तुम उसे जीना चाहती हो? किसी district court में जाओ और देखो वहाँ रोज़, हर घंटे क्या होता हैं..”
मैं, “मैंने देखा हैं.”
वो, “तुम्हे एक celebrity का केस क्यों चाहिए?
मैं, “तुम्हे मैंने बताया नहीं, मेरे पापा भी एक केस लड़ रहे हैं, और मैं अक्सर उनके साथ जा चुकी हूँ..”
वो, “हाँ, उनका साथ दो. जेसिका का साथ देना बर्बादी हैं”
मैं, “पर पिछले ४ सालों वो केस बिलकुल नहीं बढ़ा हैं”
वो, "Stay there!! damn it. why dont you listen!
मैं, “अच्छा बोलो, मैं सिर्फ सुनती हूँ”
वो, “देव क्यों हैं तुम्हारे साथ? क्योंकि उसने नौकरी छोड़ दी? या वो हीरोइन बनना चाहती हैं और तुम्हारी मदद चाहती हैं?
 मैं(चिडाते हुए), “हाँ बहुत सुन्दर हैं वो”
वो, "good bye 😠"
मैं, “सुनो न..”
वो, “मुझे सोना हैं..”
मैं, “अच्छा अब सुनूंगी.. बोलो..”
वो, “नहीं मुझे कुछ नहीं बोलना, और तुम कुछ सुनना नहीं चाहती. कुछ समझना नहीं चाहती. तुम्हे महान बनना हैं. सच बताऊँ ये तुम्हारा १० पॉइंट सिंड्रोम ओवरटाइम काम कर रहा हैं...”
मैं, “माफ़ करो.. मैं सिर्फ आपको चिढ़ा रही थी.. मुझे कुछ नहीं चाहिए.. i need you.” 

वो, "You have me..."


ये हमारे प्यार की नयी नयी शुरुआत थी. ठोस. 


हम सब अपना अतीत लेके किसी रिश्ते में जाते हैं. पर प्यार हमारा अतीत, हमारी विचारधाराएं, हमारा स्वरुप, हमारी प्रकृति सब को एकलय कर देता हैं. एक को दुसरे से आप अलग देख भी नहीं सकते..

समर्पण. यही सच्चा प्यार हैं.

सोमवार, जुलाई 29, 2013

छोटी छोटी ख़ुशी..

प्रकृति की गोद में एक छोटा सा गाँव. बेहद खूबसूरत, हमेशा बादलों और अनेको तरह के फल-फूल से भरा. अनानास, आम, लीची, अमरुद, कटहल से भरपूर जंगल और बगीचे. “मेद्ज़िफेमा” नाम था स्थानीय अंगामी भाषा में, यानी "आम का गाँव". पर आम बोल-चाल में घासपानी.. घास तो बहुत थी, पर दिनों नल में पानी नहीं होता था! हर घर की टिन की छत ने नीचे आधा बांस बंधा होता था, बारिश के पानी को एक ड्रम में भरने के लिए. बारिश साल में ९ महीने होती थी. फिर उसी पानी से सारा घर का सारा काम चलता था. पीने के लिए, ३ कम दूर एक झरना था, जिसका पानी बहुत मीठा था!. पापा जब पानी नहीं होता तो सुबह-सुबह वहा नहाने जाते और साथ में २ डब्बों में पीने का पानी लाते.
मेरी एक सहेली नीनो जिसका मेरा साथ स्कूल की पहली पहाड़ी तक का था, अचानक ही येशु की प्यारी हो गयी. उन्ही दिनों मेरी जूली से दोस्ती हुयी थी. छठी कक्षा में हम घसपानी के एक छोटे से प्राइवेट स्कूल में साथ-साथ पढ़ते थे. जूली की माँ भी उसी स्कूल के प्राइमरी विंग की प्राचार्य थी. मौहौल ऐसा था की हर बच्चा ५-६ कक्षा में आ कर बड़ा हो जाता था. हमको बचपन ने नहीं छोड़ा था, मैं और जूली छोटी छोटी बातों में खुश हो लेते थे.
जूली का घर स्कूल के पीछे ही था. एक छोटा सा स्वर्ग. अपने में पूर्ण. गाय, मुर्गे, कुत्ते, बिल्ली और ४ भाई-बहन. घर के चारो तरफ जो हरी फेंस थी उसे पार करने के लिए बांस की सीडी. साग सब्जी, फल फूल से भरा बहुत सुन्दर बगीचा. मैं अक्सर जूली से फूलों के नाम और उनके बारे में जानती, वो मुझसे हमारे घर के बारे में जानती. एक दिन उसने बताया की उसके दादा लन्दन में रहते हैं और शाही परिवार को भी जानते हैं. उस वक़्त अच्छी चॉकलेट खाना और सुन्दर फोटो देखना ही लन्दन का अहसास दिलाता था...
आठवी कक्षा में आये तो सरकारी स्कूल जाना पड़ा. अंग्रेजी के राम सर (जो बिहार से थे) और सोशल की सुज्ही मैडम (जो सिविल सर्विसेज जी तयारी कर रही थी) मेरे बहुत प्रिय थे. भाषा से प्यार, विज्ञान को प्रयोगों से जानना, समाज और देश के बारे में जानना, स्थानीय सभ्यता, काष्ठ्कर्म, चर्च सेवा(हम खुद हर हफ्ते चर्च की मिटटी की लिपाई करते थे), बास्केटबॉल; सब इतनी सहजता से साथ सीख रहे थे हम. जूली के साथ अक्सर उसके घर आना-जाना लगा रहता था. अब ये पता चल गया था की मेरी सबसे प्यारी सहेली, भूमिगत नागा लीडर, AZ फिजो की पोती हैं.
कुछ दिन पहले, मेरे एक IAS दोस्त जो नागालैंड में हैं, उनसे मुझे जूली की बहन का मोबाइल मिला. जूली से भी बात हुयी. १० कक्षा में उसने हमारे ही कक्षा के फुटबॉल चेम्प, रोकोंगुले से शादी कर ली. १० साल पहले उसकी मौत हो गयी. ५ बच्चे हैं. बड़ा बेटा २२ का और सबसे छोटी बेटी १४ की. खुद यूनिवर्सिटी में लाइब्रेरियन हैं... मैंने पूछा, "कैसी हैं, समय कैसे बितता हैं.?" बोली, “खुश हूँ. काम, घर और बच्चों से फुरसत नहीं मिलती, जो मिलती हैं तो चर्च की सेवा करती हूँ.”!
आज भी जूली उन छोटी-छोटी बातों से खुश हो लेती हैं, और मैं?

घर



एअरपोर्ट के बाहर बेटे को लेके निकली तो कॉल आया...

“टैक्सी लो और आ जाओ”

फिर कुछ देर बाद फिर कॉल आया.

“कैब भेज रहा हूँ, और हाँ एक कश्मीर से भाईजान हैं, उनको भी आना हैं, उनके साथ रुके रहना”

रात के १०:३० बज चुके थे. बेटा घर पर  होता तो अब तक सो चूका होता. पर जैसे यहाँ आना, मेरे खुद के लिए ज्यादा जरुरी था.

भाईजान तो उनके पहनावे की वजह से आसानी से पहचान लिया. कुछ देर तक कैब वाले से बात करने की कोशिश की, उसने नहीं उठाया. ११ बज रहे थे. बेटे को मैंने एक ट्राली पर बैठने को कहा. 

परेशान हो के बोला, “आप गंदे हो..”

लगा जैसे अनजान के सामने बेईज्ज़त हो गयी. वो कुर्सी ढूँढने लगे, पर बेटा बहुत झुंझला चूका था...

कुछ देर में कैब आई तो हम बैठ गए. उन्होंने मेरा परिचय पूछा.

बड़े गर्व से बोली, “माँ हूँ, नौकरी भी करती हूँ और घर भी, कुछ लिख लेती हूँ और कुछ समय देश सेवा..”

छोटी सी कार में बेटे को पैर फैलाने की जगह नहीं मिल रही थी.
“सोना हैं”,
“आप गंदे हो..”

ये सब देख कर भाईजान कुछ ऐसा बोले की मैं सिर्फ उनको सुनती रह गयी.

“ये तो अच्छी बात हैं, पर एक बात जो में साफ़ बोलना चाहता हूँ, ये समय आपके बेटे का सोने का था, घर पर रहते तो अब तक अच्छे से सो गया होता. माँ का रोल बच्चों के जीवन में बहुत अहम् हैं. वो बच्चों के बहुमुखी विकास के लिए ज़िम्मेदार हैं. हमारा भविष्य इन बच्चों से हैं, इनकी ज़िम्मेदारी पहले माँ की हैं. एक ज़िम्मेदार बाप का काम हैं की माँ और बच्चों को उनका हक दें, उन्हें खुश रखें. एक औरत घर बनाती हैं. अगर घर मजबूत होगा तो ही समाज मजबूत होगा. और समाज मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा. इसलिए औरत के लिए देश सेवा पहले घर से शुरू होती हैं.”

हॉस्टल पहुंचे, तो मेरे भारी बैग, बाकी सामान और बेटे को देख कर बोले, “हमारी बहनों के नाज़ुक कंधे पर इतना बोझ. सही नहीं हैं.”

रात भर मैं सोचती रही की क्या इसलिए मैं अपने घर को घर नहीं बना पाई...

शनिवार, जुलाई 27, 2013

दो बातें..

  ५ साल पुरानी बात हैं, पर आज अपनी सहेली से बात करते हुए अचानक याद आ गयी.. कबीर पेट में था, छठा महिना था. पांचवे महीने तक कही भी जाने की मनाही थी, इस लिए इस नयी स्वछंदता का पूरी तरह आनंद लेना चाहती थी. पहले कुछ दिन हैदराबाद अपनी प्यारी सहेली मधु के पास बिताये थे, पर मन नहीं भरा. लगा बनारस जाना जरुरी हैं. आने वाला वहीँ का हैं! आगे पता नहीं क्या हो, उसे अपनी पितृ-भूमि पे कदम रखने की ही मनाही न हो जाए
शाम को गंगा आरती देखने के बाद, मैं और शिवी सीधे गाडी तक न जा कर बनारस की गलियों में घुमने लगे.. खाने की चीज़े, गरम दूध, छोटी छोटी दूकाने, बड़ा मज़ा आता हैं एसे बेपरवाह और बेफिक्र घूमने में...

एक बड़ी सी हवेली और उसके सामने पक्का झज्जा. झज्जे पे एक ५०-६० साल की औरत छोटे से गैस के चूल्हे पे गरमा-गर्म टिक्की तल रही थी. मैंने पूछा, “माई, कितने की हैं?” वो बोली, “एक रूपया प्लेट”. मुँख से निकला, “क्या??”. पास एक-दो लोग और बैठे खा रहे थे, बोले, “ऐसी कहीं खाने को नहीं मिलेगी. खा के जाईये..”
साफ़ सुथरी साड़ी. साफ़ स्टील के बर्तन, कढ़ाई. साफ़ कपडे से ढका आलू और पीठी.
मुझसे रहा नहीं गया, मैंने पूछ ही लिया, “माई, क्यों बेचती हैं आप टिक्की?”
बोली, “बच्चे विदेश में हैं, पैसे की कोई कमी नहीं हैं, पर इससे थोडा मन लग जाता हैं, दो बातें हो जाती हैं, और कुछ जेब खर्च भी...”
कहते हैं खाना और प्यार धीरे धीरे ही बने तो उसका स्वाद आता हैं!
बड़े धीरे धीरे उन्होंने २ प्लेट टिक्की तैयार की, फिर पत्तल की कटोरी में हरी धनिया की चटनी, जो एक स्टील के टिफ़िन में थी, के साथ परोसी.
टिक्की ऐसी की मुंह में डालते ही घुल गयी.. और वो सिल-बट्टे की हरी धनिया और मिर्च की चटनी! क्या कहूं! इतना ताजा, स्वच्छ खा कर मन खुश हो गया..
प्रेम के बाद विरह स्वाभाविक हैं, पर इस तरह “दो बातें” कर के ज़िन्दगी कितनी आसान बन जाती हैं... ऐसी सीख और कहाँ मिल सकती थी...

शुक्रवार, जुलाई 26, 2013

पुनर्मिलन

सुबह उठी तो अजीब सी थकान और निराशा. ये दिन भी औरों जैसा ही होगा. एक पुराना सफ़ेद चिकन का कुरता पहना और ऑफिस चल दी...
लंच तक कोई कॉल नहीं आया. फिर एकाएक वो कॉल जिसका इंतज़ार जैसे मैं सदियों से कर रही थी.  
"शाम को फ्री हो?"
"हाँ"
"बताता हूँ. ऑफिस से देर से निकलना"
फ़ोन काट दिया. मैं कुछ पल के लिए फ़ोन कान पे लगाये रही, जैसे कुछ और बोल पड़ेंगे..
शायद ५ बजे होंगे, बड़े बेमन फ़ोन उठाया. 
"चलो आ जाओ. सेक्टर-१८"
"अभी?"
"हाँ अभी!"
अनूप को बुलाया ड्राईवर रूम से.
"चलो मुझे अट्टा छोड़ दो." 
"अभी मैडम?". 
"हाँ अभी".
गाडी से बच्चों को कॉल किया, "बेटा देर हो जाएगी. खाना खा कर सो जाना."
उनको कॉल किया तो मार्किट का नाम बता कर फिर फ़ोन काट दिया. २० मिनट में हम अट्टा पहुँच गए. 
"मैं घर आ जाउंगी, तुम घर गाडी पार्क करने चले जाना"
 गाड़ी से उतर कर रेस्टोरेंट तक पहुंची. वो बाहर आये. बोले, "१० मिनट का समय दो, कुछ दोस्त हैं, फारिग करके तुम्हे बुलाता हूँ." अजीब लगा, जैसे डॉक्टर की दूकान में नंबर लगा दिया हो!
नया मार्किट था, सिर्फ कुछ खाने-पीने की जगह और कोने में "ferns and petals" की एक फूलों की बढ़िया दूकान.
समय बिताने के लिए मैं टहलने लगी, फिर सोचा एक गुलदस्ता ले लेती हूँ. पीले गुलाब मुझे बहुत पसंद हैं. वो भी जब कोई मुझे भेंट दे! और आज बहुत दिनों बाद जैसे मुझे खुद के लिए कुछ करने का मन हुआ. २५ पीले गुलाब का एक सुन्दर का गुलदस्ता बनवाया. जैसे ही तैयार हुआ, उनका कॉल आ गया, "आ जाओ"
मैं हाज़िर हुयी. एक बढ़िया "fine dining" रेस्टोरेंट, प्यारा अंग्रेजी संगीत और कम रौशनी.. हम अकेले थे. शायद रात में जोड़े आते होंगे. अभी तो सिर्फ ६ बजे हैं!
बैठने के लिए बोला, मैंने अपने पुराने चिकन के कुरते को देखा और  फिर उनके कपड़ों को. लज्जाते हुए बोली, "अगर पता होता आप बुलाओगे, तो सुबह कुछ ठीक ठाक पहनती!". बोले, "बहुत सुन्दर लग रही हो..."
ये दो शब्द मेरी चुप्पी तोड़ने के लिए काफी थे. कुछ प्यारी प्यारी बातें हुयी. मैं उनकी मुस्कराहट और तीखे नैन सहन नहीं कर पा रही थी. उनकी नज़र मुझसे हट नहीं रही थी, और मेरी इधर उधर देखने की कोशिश. 
एक लड़के को बुलाया. बोले "ले आओ, चिल्लड हैं न?" 
लड़का एक शैम्पेन की बोतल लाया. उनके लिए परोसी, फिर वो बोले, "थोडा इस गिलास में भी कर दो." 
"मैंने कभी नहीं पी"
"हर चीज़ का पहली बार होता हैं!"
लड़के को जाने को कहा. फिर बहुत देर तक जीब रोल कर के कैसे पीनी हैं, बताते रहे.. मैंने एक दो सिप पी. बस.
फिर कुछ इतालियन खाने को मंगाया. स्वादिष्ट था. क्या था ये याद नहीं, मन कहीं और था..
बाहर निकले तो हलकी फुहार हो रही थी.
"भीग जायेंगे". 
"चलो"
हाथ पकड़ के वो चलने लगे. बारिश की बूंदे तन-मन में आग लगा रहीं थी.
"आँखें मूंद लो और बूंदों को चेहरे पे महसूस करो.."
"गिर जाउंगी"
मुस्करा के बोले, "नहीं गिरोगी, मैं हूँ न, मेरा हाथ पकड़ के चलो.."
मैं उनका हाथ पकडे चलती गयी... लगा मैं स्वर्ग में हूँ. बारिश की बूंदे मानो प्यार झलका रही थी. इस अहसास का नाम ही प्यार हैं. इस विश्वास का नाम ही प्यार हैं. वो ३ महीनो का विरह जब मैं समाज के दायरों की वजह से अलग हुयी थी, हर बूँद के साथ घुल रहा था..
बारिश बहुत तेज हो गयी. इतनी तेज की आस-पास कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. हम गाडी में बैठ गए. युही कुछ देर गाडी घुमा के, सेक्टर-३३ आ कर उन्होंने गाडी रोक दी. उनका मेरी उँगलियों में उंगलियाँ फसा कर घंटों बातें करना, मुझे पूरी तरह पूर्ण कर रहा था.. उनकी प्यारी सी कार में बैठ कर घंटो बतियाते रहे.. ऐसी पूर्णता का एहसास जीवन को तृप्त कर देता हैं...
शाम ६ से रात के १२ बज गए... न उनको मुझे छोड़ने का मन, और न मुझे उनको. 
"आपका जन्म दिन हैं, घर पर मम्मी और भैया इंतज़ार कर रहे होंगे"
वो कुछ  नहीं बोले. वो घंटों आलिंगन, वो बाहर का तूफ़ान मानो तन-मन के तूफ़ान की तरह थमने का नाम ही नहीं ले रहा था...
आज २६ जुलाई, उनका जन्म दिन हैं. और मेरा उनकी दी हुयी विरासत से पुनर्मिलन. इस हिंदी ब्लॉग के माध्यम से. उनको एक सच्ची भेंट.
पुनर्मिलन, अपने आप से, आप सब से, उन जीवन के रस से जो हम सबको तर जाते हैं...

शनिवार, जुलाई 06, 2013

प्यार...

पिछले देढ़ महीने से, मेरा दो जगह अक्सर जाना हो रहा हैं. एक कार की वर्कशॉप और दूसरा मेरा साइकिल मैकेनिक.
कल जब में कबीर की साइकिल की सीट ठीक कराने गयी, तो मुझे वो ही मुस्कुराते चहरे देख कर दिन की सारी थकान जाती रही. एक छोटी सी दूकान हैं घर के बिलकुल पास, मालिक अक्सर दूकान पर नहीं होता हैं. मिलते हैं तो एक १४-१५ साल का लड़का और २ छोटे ८-१० साल के बच्चे. मन भर आता हैं उन बच्चों को अपनी देहाड़ी कमाते हुए देखने में. मुझे सिर्फ सीट ठीक करनी थी, पर बड़े लड़के ने खुद बोला, हैंडल टेड़ा हैं और ठीक करने लगा, फिर देखा पहिये ठीक घूम नहीं रहे हैं, तो गियर ठीक किये, फिर हवा भरी. जब ठीक सी लग रही थी तो एक छोटा बच्चा जो अपने पापा के साथ आया था उसको बिठा कर मुस्कुरा कर बोला "अपने पापा से कहना आपके लिए भी साइकिल ले कर आयेंगे!" फिर साइकिल पर कपडा मार कर छोटे लड़के से बोला, "क्या हुआ?" रात के ९ बज रहे थे, वो बोला, "अब घर जाना हैं."(शायद भूखा था, पर बोला नहीं)
दूसरी तरफ कार वर्कशॉप की बेरुखी. हर काम प्रोफेशनल! हर काम सिर्फ हिशाब से. ऐसा ठंडापन की अगली बार आने का कभी मन न करे.
साइकिल ठीक होने पर मैंने पूछा "कितना हुआ/" लड़का बोला, "२० रुपये". मैंने ३० रुप्रये दिए तो उसने १० रुपये छोटे लड़के को दिए और मुस्कुरा कर बोला, "जा खाले कुछ"...
लगता हैं प्यार सिर्फ गरीबो के दिल में रहता हैं! फिर काहे का रोज का ज़िद्दों-ज़हद, रोज की किट-किट!! किसके लिए??