रविवार, फ़रवरी 09, 2014

घुटन...

मेरी तुम्हारे लिए चाहत दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं। हर वक्त सिर्फ तुम्हारे इंतज़ार का हैं। एक शब्द, एक झलक, एक छुअन, एक चुम्बन…
क्यों? सही गलत इसकी किसको परवाह हैं। सिर्फ आकर्षण नहीं हैं। न ही कोई कामुकता। फिर क्या हैं यह??
शायद एक आश्वाशन, एक स्वस्त्ययन, एक ठंडी हवा का झोंका जो जी को हल्का कर देता हैं। हमने पिछले हफ्ते में सिर्फ दो बार बात की हैं। तुम्हारी ज़िम्मेदारियों का अहसास हैं मुझे। पर क्या तुम्हारे पास किसी से भी बात करने का समय नहीं हैं? मुझे नहीं लगता। शायद हर पल सिर्फ तुम्हारे ख़याल रहते हैं। वो ख्याल जो इतना खुश कर देते हैं कि मैं उन्हें दूर रखना भी नहीं चाहती। तुम मुझे हिम्मत देते हो जीने की। तुम्हारा सामने होना, न होना शायद इतना माने नहीं रखता।  सोचती हूँ, क्या हैं जो हमें बांधे हैं। तुम पहले हो ज़िन्दगी में जिससे मिल कर ऐसा लगा कि बरसों का इंतज़ार पूरा हुआ। मुझे तृप्त कर दिया हैं इस रिश्ते ने।  आज कल जब हम बात नहीं कर पा रहे हैं, तब भी एक अजीब सा चैन हैं। एक अहसास कि तुम मेरे लिए हो।  एक विश्वास जो मुझे जीने कि राह दिखा रहा हैं।  तुमसे मिलने का मन हमेशा कि तरह बरकरार हैं।  तुम क्या सोचते हो उससे ज्यादा तुम्हारी ख़ुशी माने रखती हैं। तुम्हारी मज़बूरी, प्यार, गुस्सा, ज़िम्मेदारी सब अपनी लगती हैं। 
प्यार। एक प्यारा सा शब्द। तुम अक्सर इस शब्द के आस पास मंडराते रहते हो।  पर मुझे वो दिन याद हैं जब तुमने उघोषणा की थी।  "शायद हम प्यार में हैं!
प्यार नहीं तो क्या हैं यह।  कल रात तो तुमने मुझे चौंका ही दिया।  हर बार जब कुछ होता हैं, तो इतना अचानक क्यों होता हैं। I am always caught unaware!पता नहीं क्यों मुझे विश्वास नहीं होता कि में तुमसे इस रिश्ते में हूँ, जब कि हमारा रिश्ता शायद सभी रिश्तों से परे हैं। तुम कहते भी हो, हमारा यह रिश्ता इस ज़माने को समझ आने वाला नहीं हैं।  हम अपनी ज़िम्मेदारियाँ भी निभाएंगे पर इस रिश्ते को भी जियेंगे।  कुछ हैं जो हमें जोड़े हैं। कहीं अंदर हमारे ऐसे तार जुड़े हैं कि समझ पाना मुश्किल हैं कि क्या हैं।  आँखों से तो नहीं दिखता।  न ही शायद दिल महसूस कर पाया हैं।
तुम्हारे साथ बीता हर लम्हा एक सदी जैसा लगता हैं।  तुम्हारा सब कुछ अपना लगता हैं।  तुम्हारा पागलपन, तुम्हारे शौक़ , तुम्हारे सपने, तुम्हारी ज़िम्मेदारियाँ।
और फिर जब मैं तुम्हे कोसते हुए सोने जा रही थी, उन सब कारणो के बारे में सोचते हुए कि किसलिए तुम मुझसे नहीं बात कर पा रहे हो।  कभी कभी यह निर्णय भी करते हुए कि बस अब और नहीं।  यह विरह की आग मुझे तबाह कर देगी। अब मैं तुम्हारे बनाये किसी जाल में नहीं फसने वाली, तभी तुम फ़ोन करते हो।
तुम्हे पता था मैं बरसने वाली हूँ। तुर्रंत बोल पड़े जैसे बहुत जल्दी में हो, "क्या कर रही हो? तैयार हो जाओ। हम अमान अली खान को सुनाने जा रहे हैं।  १५  मिनट में गेट के बाहर मिलूंगा।" 
मैं कुछ कह पाती उससे पहले फ़ोन कट।  मैंने एक फैब इंडिया का काला कुरता और रैप अराउंड पहना।  एक ऊनी शाल डाल ली, बाहर ठण्ड थी।  उतर रही थी फिर कॉल आ गया। 
"छोटे गेट पर कार ले कर आ जाओ।"
एक मिनट और तुम ऐसे इंतज़ार कर रहे थे जैसे बरसों से वही खड़े हो।  मैं तुमसे नज़र नहीं मिला पा रही थी।
पता नहीं ऐसा क्यों होता हैं कि हम २ दिन बाद भी मिलते हैं और मैं मिलन कि घड़ियों में गोते खाने लगती हूँ।  अजीब हैं यह विरह और मिलन का चक्र। तुम मुझे ड्राईवर सीट से खिसका कर खुद  कार चलाने लगे। इससे पहले मैं कभी किसी पब मैं नहीं गयी थी। मन का बोल दिया, "सुनो ऐसा नहीं हो सकता की हम वहा नहीं जाए?"
"मैं हूँ न"
तुमने किसी रणजीत को कॉल कर के बताया कि हम आ रहे हैं। गाडी जैसे ही पोर्च पर पहुंची रणजीत ने मेरे लिए दरवाज़ा खोला। लगा किसी सल्तनत की मल्लिका हूँ।  पर ऐसी औपचारिकता से मुझे बहुत घुटन होती हैं। तुम कुछ लोगों से मिलने लगे तो रणजीत बोला, "चलिए मैडम, आपको ऊपर ले चलता हूँ।" रणजीत और तीन बाउंसर और मैं, और एक छोटी सी लिफ्ट।  अपने आप को इतने लम्बे चौड़े पुरुषों से घिरा हुआ देख कर मैं कुछ और अंदर समा गयी।  सुरक्षित नहीं, सहम गयी थी।  ऊपर पहुंचे तो कुछ और बाउंसर को देख कर मन किया कही दुबक जाऊ। इतना अटपटा तो मुझे किसी कॉर्पोरेट पार्टी में नहीं लगता जहाँ मैं जाना नहीं चाहती हूँ। रणजीत का मेरे साथ खड़ा होना ही मुझे गला दबाने जैसा अहसास दे रहा था।  तुम आये तो मेरा हाथ पकड़ के बोले, "घबराओ नहीं, तुम पत्नी हो मेरी!"
हम हॉल में घुसे तो मैंने तुम्हारा जैकेट कस के पकड़ लिया।  सिगरेट और शराब का धूआं।  इतनी  घुटन की एक पल को लगा जैसे मेरी सांस रुक जायेगी।  संवृतिभीत!
लगा जैसे सब मेरी तरफ देख रहे हैं।  भीड़ में सब अनजान लगते हैं।  मन हुआ अदृश्य हो जाऊ।  उनके पीछे छिप गयी और उनका जैकेट मैंने और कस कर पकड़ लिया। 
उन्हें मेरी परेशानी भांप ली थी।  "चलो ऊपर छत में चलते हैं"
राहत मिली।  लगा जैसे कितनी देर से रुकी हुयी सांस वापिस आ गयी।  अच्छा हुआ जो हम बाहर आ गए। ऊपर प्यारे प्यारे झरोखे थे जो हॉल कि तरफ खुलते थे। मेरे लिए वेटर एक मॉकटेल ले कर आया।
"शराब तो नहीं हैं न?"
"नहीं, मैंने बता दिया था!"
मुझे लगा कब!
छोटा सा क्यूबिक्ल और उसमे दो राजगद्दी! अपने लिए वोडका और ऑरेंज जूस, एक वेज और एक नॉनवेज स्नैक मंगवाया। कुछ देर हम नीचे डांस फ्लोर और लॉबी को देखते रहे। दूर से अच्छा लग रहा था। तुम्हारा हाथ पकड़ कर ऐसे झरोके से देखते हुए लगा कि बस समय थम जाए।  अभी म्यूजिक शुरू ही हुआ था।  मैं बता रही थी कि मुझे नीचे कैसी घुटन हो रही थी।  तुम मेरा हाथ और कस के पकड़ के बता रहे थी कि यह एक मॉक पार्टी हैं और अमान अली नहीं बजायेगा। एक विडियो ट्रूथ चला फिर वही भोंदा पंजाबी म्युसिक।  तुम बैठ गए, तो मैं तुम्हारे पास ज़मीन पर बैठ गयी। तुम भी सीट से नीचे आ कर मेरे पास बैठ गए। मैं तुम्हारे नजदीक सट कर बैठ गयी जैसे कोई सहमा हुआ बच्चा बैठ जाता हैं।
तुम मुस्कुरा दिए। "तुम मेरी पत्नी हो।" 
मुझे बहुत अच्छा लगा। लगा जैसे मुझे कोई पहचान मिल गयी हैं।  तुम मुझे बहुत ख़ास समझते हो। मैं जानती हूँ। 
तुम्हारी आँखें मुझे अंदर तक पिघला रही थी।  क्यूबिक्ल में कोई दरवाज़ा नहीं था।  कभी वेटर तो कभी बाउंसर परेशान कर रहे थे।  हम बात करते करते अचानक चुप हो जाते।  तुमने एक बार टोक भी दिया। फिर एक गिलास ड्रिंक और मंगाया।
"तुम पियोगी?"
"नहीं"

तुम्हे लगा शायद मैं उक्ता गयी हूँ।
"चलो"
हम नीचे पहुंच कर हमारी कार का इंतज़ार कर रहे थे। अचानक  हमारी आँखें मिली।  सामने रैडिसन होटल देख कर तुम बोले,
"काश हमारा यहाँ एक कमरा होता।  और इस रोज की किट-किट से दूर मैं तुम्हारे साथ कुछ और समय बिता पाता।"

बादल, धुंद, थड़ी हवा, आधी रात और तुम्हारा कसा हुआ आलिंगन। कुछ पल जब समय रुक जाता हैं। और फिर छोड़ने का वक्त।
तुम्हारे शब्द आज भी मुझे सुनायी देते हैं।  तुम जैसे इस ब्रह्माण्ड को कह रहे थे। 
"तुम मुझ पर विश्वास करती हो न? नहीं? तो अब करो!"
"मैं तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा"
फिर अब कैसी घुटन? क्यों घबराता हैं मन कि हम मिल नहीं पा रहे हैं।  जो हमेशा से तुम्हारा हैं उसको क्या खोने का डर।

सोमवार, जनवरी 13, 2014

कितना लोगी?

यह बात १९९० की है। मैं डीटीसी बस से रोड से उतर कर पैदल २ किलोमीटर रोज़ घर के लिए चलती।


उस दिन देर हो गई थी। सोचा औटो ले लूँ। जब तक कमाना नहीं शुरू किया सिर्फ़ ३-४ जोड़े कपड़े थे। रोज़ साफ़ कर लेती थी पर हाल फटीचर ही थे।



औटो तो मिल गया, थोड़ी आगे पहुँच कर बोला,

"कितना लोगी?"

"जितना लगता है, १० रूपये, पाँच और दे दूँगी रात की वजह से"

"तू कितना लेगी?" वो ज़ोर से फिर बोला।

दिल धक्क से रुक गया।

"भैया, औटो रोको।"

"क्यों भाव दिखा रही है, इतनी परी भी नही हो, १०० दूँगा और घर भी छोड़ दूँगा"

"रोको रोको" कह कर में चलते औटो से कूद गई। भागते हुए घर पहुँची।

वही घर जहाँ कुछ दिन बाद फिर वही हुआ, पर एक घर वाले से। और उस बार में बच नहीं पाई। शायद औटो वाला बेहतर था जो माँग तो रहा था।

मंगलवार, जनवरी 07, 2014

ममता

"ममता" सिर्फ एक शब्द नहीं हैं. पूरी दुनिया इसके अंदर समा जाती हैं. "एक बच्चा ही माँ को जन्म देता हैं" सच कहा हैं किसी ने. जब तक कोई माँ नहीं बनता तब तक उस अहसास को महसूस करना असम्भव हैं. कितने बड़े से बड़ा ज्ञानी भी माँ को नहीं समझ सकता.

कुछ ही दिन पहले, डॉक्टर ने अल्ट्रासाउंड में मेरी पी.सी.ओ. को देख कर कहा था, कुछ ज्यादा बड़ी बीमारी नहीं हैं, हाँ शायद दोबारा माँ नहीं बन सकती. बेटी ११ साल की हो गयी थी. कभी दूसरे का ख़याल नहीं किया था. पर जैसे इस एक बात ने मेरे अंदर उथल पुथल मचा दी थी. माँ बनने से बड़ा जीवन में कोई सुख नहीं हैं. जब भी बेटी का जन्म याद करती थी तो असहनीय दर्द नहीं, काले लम्बे बाल कि गोरी सी बिटिया याद आती थी, जो होते ही ऐसे मेरा दूध पीने लगी थी जैसे कितने जन्मो से तरस रही थी.

उसको मेरे अंदर जन्म लिए हुए सिर्फ १५ दिन हुए थे. देवयानी और कान्हा के साथ नॉएडा के सेक्टर १८ के कोस्टा कॉफी में बैठी थी।

"दीदी कौनसी कॉफ़ी लेंगी?"

बिना कुछ सोचे बस मुंह से निकल गया, "आज कॉफ़ी पीने का मन नहीं हैं. चॉकलेट मिल्क चलेगा".

दोनों को घर छोड़ कर कहा, अभी आती हूँ, पास के केमिस्ट से प्रेगनेंसी किट लिया। वापस आ कर सीथे बाथरूम में जा कर टेस्ट किया। पॉजिटिव था. शायाद मेरी रूह को पता था, जानते हुए कि ये नामुमकिन हो सकता हैं. पता था पिता तैयार नहीं होंगे. पर हिम्मत कर उनको शाम को मिली. हमारी दिल की बातें हमेश लॉन्ग ड्राइव में होती थी.

"कुछ जरुरी बताना हैं"

"क्या"

"आ जाओ फिर गाडी में बताती हूँ"

वो आये. उनको मेरी हालत देख कर अजीब लगा. कुछ देर आगे बढ़ने के बाद बात शुरू हुयी.

"क्या हैं?"

"मैं प्रेग्नंट हूँ"

उन्होंने गाड़ी धीमी कर दी. उनके लिए जैसे कोई पहाड़ टूट गया था !

"तुम्हे बच्चा गिरना पड़ेगा। मैं तुम्हारी मदद करूँगा"

एक बार को लगा जैसे मदद तो ज्यादा तब होती जब तुम कहते तुम जो फैसला करोगी, मैं तुम्हारे साथ हूँ।

सुना था प्रेगनेंसी में योग करते रहना चाहिए। जो रोज सुबह ५ बजे निकल पड़ती पार्क में योग के लिए। अभी एक महीना ही हुआ था, योग करके लौटी तो बाथरूम में खड़े खड़े चक्कर सा आ गया। कुछ देर में खुद को जमीन पर पाया। नीचे पानी जैसा लगा तो हाथ लगा के देखा, हाथ में खून था। पगला गयी। नहीं। यह बच्चा में खो नहीं सकती।

डॉक्टर को दिखाया, अल्ट्रासाउंड किया, बच्चा ठीक लगा बोली कुछ रुकना पड़ेगा, इतने दिन में धड़कन नहीं सुनायी देती। कोई इंजेक्शन लगाया, कुछ दवाई दी और योग बंद कर आराम करने को कहा।

माँ से बाबूजी के नुक्से पूछे। दूधी, मुलैठी, कमलगट्टा और मिश्री। रोज तजा बना के दूध के साथ लेने को कहा, सुबह शाम। मेरे लिए जरुरी था, एक तो उम्र ज्यादा थी, दूसरा हर दूसरे दिन स्पोटिंग हो जाती। जिस दिन लाल खून के साथ होती और ज्यादा होती तो दिल धक् से रुक जाता। पता नहीं कितने और इन्तेहाँ लेना चाहती हैं ज़िन्दगी। डॉक्टर्स ने कुछ दिनों बाद कहा कि प्लेसेंटा प्रेविआ हैं। ऐसा कंडीशन जिसमे प्लेसेंटा वैजाइना के मुँह पर अपने को जमाता हैं। बच्चे गिरने कि बहुत सम्भावनाये हैं। इस विश्वास के साथ हर दिन कटता ही इतने भी इन्तेहाँ नहीं हो, यह लड़ाई मैं कभी नहीं हार पाऊँ। अभी तो बहुत लम्बी लड़ाई लड़नी हैं।

ऑफिस जाना चालू था। खुद को व्यस्त रखना जरुरी था। तीसरे महीने में एक हफ्ते ब्लीडिंग बढ़ गयी तो, एक हफ्ते घर आराम किया। रोज सुबह ताज़ी दूधी पार्क से मंगवाती। बिना नाका किये खाती। गूगल में घंटो बिताती दूसरी माँओं के अनुभव पढ़ती। एक करवट सोना, पैर के बीच तकिया रखना, खाने कि हिदायते। वो कुछ किताबे ले आये थे मंटो, ग़ालिब, कबीर, अमिताभ घोष कि "हंग्री टाइड" और रोहिंटन मिस्त्री कि "अ फाइन बैलेंस".पूरी प्रेगनेंसी में इतनी किताबे पढ़ी जितनी पहले कभी नहीं।

किसी तरह ५ महीने कटे, फिर एक और अल्ट्रासाउंड और। डॉक्टर ने हर महीने करने को कहा था, पर जानती थी उसको न करना ज्यादा ठीक हैं। स्पोटिंग भूरी और कम हो रही थी। अल्ट्रासाउंड में खबर अच्छी थी। प्लेसेंटा थोडा ऊपर जा चूका हैं। एक महीने में सही जगह पहुँच जायेगा। राहत कि सांस ली। फिर मेरे जूनून, बच्चा बिलकुल नेचुरल तरीके से होना चाहिए, घर में जैसे माँ चाची का हुआ करता था। लामाज़े के लिए बात की, गोआ में वाटर क्लिनिक के लिए बात की। हैदराबाद गयी तो मधु बोली मेरे पास आ जाना , वैसे भी वहाँ पता नहीं बच्चे कि शक्ल देख कर उसको जीने दिया जायेगा कि नहीं।

मैंने घूमना फिरना शुरू किया, हैदराबाद, बनारस, कोर्बेट, जहां बन पड़ता चल देती। दूसरे तरफ देश छोड़ दो, दिल्ली छोड़ दो का दबाव था। सिर्फ इसलिए क्योंकि मैंने कहाँ था कि चाहे मुझे जगह छोड़नी पड़े पर मैं बच्चा नहीं गिराउंगी। सातवे महीने में गुडगाँव जाने का फैसला कर दिया। मुस्किल था। पर एक दिन सोचा और अगले दिन से शिवि के स्कूल और घर ढूंढ़ना शुरू कर दिया। पाथवे स्कूल के तीन चक्कर लगाये , रास्ता इतना खराब था कि हर बार प्रिंसिपल कहती कही ऐसा न हो कि बच्चा रास्ते में हो जाए।

१३ अप्रैल, मैं गुडगाँव आ गयी। माँ आयी हमें छोड़ने। खुद से अपना भरोसा कभी ख़त्म नहीं हुआ था। अगले दिन जन्मदिन बहुत अच्छे से बना। थक गयी थी पर खुश थी।

पहला वीकेंड आ रहा था। बेटी बोली मां बुक्स खरीदनी हैं. अब तो हम गुडगाँव आ गए हैं। लैंडमार्क के बाहर ड्राईवर ने उतारा। अभी हम अंदर जाने का रास्ता ही पूछ रहे थे , कि एक गार्डबोला ,

"मैडम ये पानी कैसे गिर गया। "

नीचे देखा तो समझ आया। लगभग एक लीटर पानी जैसे नीचे फैला दिया हो। शिवि सिर्फ ११ साल कि थी। किसी को भी जानती नहीं थी गुडगाँव में। गलती से एक बार पारस हॉस्पिटल जा चुकी थी। डॉक्टर मिनाक्षी सहोता अच्छी डॉक्टर थी। ड्राईवर को बुला कर सीधे अस्पताल पहुंची। रास्ते में अपने बॉस को कॉल कर दिया।

मेरे पहुँचते ही वो भी अपनी पत्नी को ले कर पहुँच गए थे। इन्शुरन्स का पेपर वर्क किया। तब तक भैया आ गए थे.

शाम तक वो भी देवयानी के साथ आ गए थे. रात भर मेरे पास रहे। दर्द हो रहा था, पर डॉक्टर चाहती थी कि जितना डिले हो जाए उतना ठीक। अभी सिर्फ तीस हफ्ते हुए थे। पर जो आ रहा हो उसको कौन रोक सकता हैं। सुबह ५ बजे मैंने उनको कहा कि जा कर आराम कर लो। ७ बजे डॉक्टर आयी। देखा तो बोली अब इंतज़ार नहीं कर सकते। बच्चा पुश कर रहा हैं। शिवि देवयानी के साथ घर चली गयी थी। घर में कोई नौकर नहीं था। मम्मी पापा बरेली कल ही गए थे। उनको आने में समय लगता।

८ बजे उनसे साइन करा कर मुझे ऑपरेशन थिएटर में ले गए। शनिवार, हनुमान जयंती, पूर्णिमा के दिन, ८ बज कर ७ मिनट में नन्हे साहब बाहर आ गए। नाम तो पहले से ही तय था। होते ही अपने पिता कि गोदी मिली। खुशनसीबी थी।

मैं अपने आपको गुनाहगार मानने लगी थी। ये तसली थी कि पूरे २ किलो का था। पर दुधी अपना काम कर रही थी। बारह घंटे बाद से मैंने दूध देना शुरू किया। तब तक साहब थोडा स्टैबल हो गए थे। हर आधा घंटा में २-३ मिली दूध देना था बस। एक बार में १० मिली तो निकल ही आता था। पर मुझे जैसे हर बार ताजा देने कि धून सवार थी। मम्मी मना करती। जच्चा का इतना चलना ठीक नहीं वो भी ऑपरेशन के बाद। पर उस समय बस मुझे मेरे बच्चे के अलावा कुछ नहीं दिख रहा था। २४ घंटे में २०-३० बार चक्कर लगाती उसकी नर्सरी तक। १० दिन बाद वो जाने के लिए तैयार था। मुझे डॉक्टर ने कंगारू केअर के बारे में बताया। मैंने उसके बारे में पढ़ा भी।

“इस वक़्त उसे माँ के पेट जैसा मौहौल देना हैं।“

माँ बनने के लिए अपनी माँ से झगड़ा किया। मेरे सिवाए सभी को साहब को छूने की मनाही थी। प्रीटर्म बच्चे को इन्फेक्शन जल्दी हो हैं। मुझे उसे हर शह से बचा कर रखना था। सारे ऊपर के कपडे उतर कर उसको भी बिना कपडे के अपनी छाती से घण्टों चिपकायी रहती।

अकेली। बेहद अकेली थी। कभी कॉल आता तो अच्छा लगता।

सिर्फ इस उम्मीद पर हर दिन काटती कि साहब का वजन बढ़ रहा हैं। ४० दिन में कबीर का वजन पौने पांच किलो था। एक चेकअप में डॉक्टर बोला.

“७० मिली एक दिन में , विश्वास नहीं होता। दूध नहीं अमृत हैं।“

३ महीने हर घंटे दूध एक्सप्रेस करती , ताजा स्टील के दिए से देती। पहले १० मिनट ढूढ़ पिलाने में लगते। तब तक दूसरे कि बारी आ जाती। नहाना, खाना, सोना, मालिश सब साहब के हिसाब से। २ महीने के बाद जब एक्सप्रेस करना मुस्किल हो रहा था तो पिलाने कि आदत डालना जरुरी था। पर इतने आसानी से दूध पीने कि आदत जो हो गयी थी , जनाब खुद पीने से इंकार करते। १५ दिन कि जद्दोज़हद के बाद जब पूरी तरह खुद पीने लगे तो तस्सली हुयी। बच्चे के लिए मालिश बाहर जरुरी हैं। मालिश कभी मलाई से, कभी जैतून के तेल से, कभी नारियल के तेल से। कहते हैं कि नारियल तेल अकेला तेल हैं जो त्वचा सोख सकती हैं।

फिर धीरे धीरे मेरी एड़ी में असहनीय दर्द शुरू हो गया. डॉक्टर ने कहा प्लांटर फसीटीस हैं। तलुए कि नसे चिर जाती हैं ओवर युस कि वजह से। मैंने अपने शरीर को कुछ ज्यादा ही परेशान कर दिया था, उसे तो रिवोल्ट करना ही था। कुछ दिन फिजियोथेरेपी करायी,पर आराम नहीं था। दो महीने ऑफिस से छुट्टी बढ़ा ली, खड़ा होना मुश्किल हो गया था।

फिर वो ही बाबूजी कि प्राकृतिक इलाज। मेरे लिए हमेशा काम करता रहा हैं। गरम पानी, ठंडा पानी दिन में ३-४ बार। ३ महीने लग गए। वापस चलना आसान हो गया था, पर इलाज छोड़ा नहीं। वजन पर काबू करना भी जरुरी था। ७ महीने सिर्फ मेरे दूध पर थे साहब, बच्चे को पानी कि कोई जरुरत नहीं होती। दो साल तक मेरा दूध पिया, ऊपर कि जरूरत  बिलकुल नहीं पड़ती। माँ का एक्सप्रेस्ड दूध भी पाउडर दूध से बेहतर हैं।  फिर धीरे धीरे सब्जी फल और देसी अनाज देना शुरू किया। अमरंथ , बाजरा और रागी। पहले दो साल मैंने अपने बच्चों को नमक, चीनी, आटा, चावल और सारे प्रोसेस्ड खाने से दूर ही रखा. बाहर का कभी कुछ देने कि जरुरत नहीं पड़ी। आज जब घर में बीमार पड़ती हूँ तो बिना एंटी बायोटिक के ठीक नहीं होती, पर मेरे बच्चे देसी हैं, खुद लड़ लेते हैं! खुश हूँ कि मैंने उन्हें ठोस बनाया। एक माँ से अच्छा उसके  बच्चे के लिए क्या हैं कोई और नहीं जानता।  मेरे अजीज मुझे सरफिरा कहता। पर मैंने हमेशा वो किया जो मुझे ठीक लगा।

धीरे धीरे साहब भी बड़े होने लगे और मेरा दर्द भी जाता रहा।

We must accept finite disappointment, but we must never lose infinite hope. Martin Luther King Jr.

सोचती हूँ कैसे मैंने वो १२ महीने काटे, तो आज भी गर्व से फूल जाती हूँ। चाहे हर जन्म में मुझे यह तकलीफ मिले फिर भी मैं माँ बनाना चाहूंगी।