शुक्रवार, दिसंबर 24, 2021

पारस

हर नकारात्मक समझे जाने वाले शब्द को ध्वस्त होते देखा है। 

दसवीं में थी तो एक कविता लिखी थी नारी पर, पूरी याद नही पर अबला, त्याग की देवी, अनुरागी, पैर की जूती, जौहर, बेसहारा, बेचारी शब्दों को जोड़ कर कुछ ज़बरदस्त बना था..

तुझको जौहर सिखला कर

इतना कायर बना दिया

नर तूने इसका क्या किया भला

अपने पैरों की जूती बना...

ये शायद इसलिए क्योंकि मुझे बचपन से ये अहसास था की लड़की हूँ पर हर तरह से बराबर हूँ। गणित लड़कों का तो वो मेरा फ़ेवरिट, क्रिकेट लड़कों का तो लड़कों के साथ लेदर बॉल से खेल कर बच्चों की नाक तोड़ना, छह साल में बच्चों की टोली बना कर जंगल पहाड़ों में घूमना, पेड़ों पर घर बनाना और घंटों उछल कूद करना। स्कूल में कबड्डी हो रेस हो क्लास से बाहर खिड़की से कूदना या कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में कर्फ़्यू टाइम के बाद गेट फाँदना सब किया है और बहुत जोश में!

नारीवाद शब्द किसी को तब शायद नही पता था। शरीर के दुबली पतली थी पर इरादों से मज़बूत थी सच्चाई के लिए लड़ना भिड़ना पीटना कूटना सब किया है।

फिर कुछ ऐसे हादसे हुए की मैं अंदर से टूट गई। बहुत ही नाज़ुक और भावुक हो गई। इतनी की ये वाक्य लिखने तक मैं आज भी मेरी आँख छलक जाती है। खैर कुछ बड़ों का साथ और शिक्षा की चाभी जो बचपन में पापा ने दी थी उसने बचाए रखा। पढ़ी, गोल्ड मेडलिस्ट हुई, क्लास वन अफ़सर बनी, बड़ी टेलिकॉम कंपनी में ज़िम्मेदार ओहदे पर रही.. बहुत सम्मान और धन-सम्पति मिली - सब बहुत आसान था।

पर भावुकता ने मारा, रिश्ते नही तय कर पाई। जिसने प्रपोज़ किया उससे प्यार नही किया, जिससे प्यार किया उससे शादी नही हुई और जिससे शादी हुई उससे निभी नही, जिससे निभी उसकी शादी हो चुकी थी... सब बहुत उलझ गया। निकलना आसान नही था बिना पूरी तरह टूटे। टूटी फूटी और बिखर गई। पर ख़त्म नही हुई क्योंकि कही वो बचपन का जोश वो उमंग ज़िंदा थी। मैं भी जी गई। लिखने लगी, पेंट करने लगी, फ़ोटो खींचने लगी, गाड़ी दौड़ाने लगी, नाचने लगी... फिर सब मुझे छद्म नारीवादियों कहने लगे, लोध फेमिनाजी, लेडी केसानोवा और वो सब जो मैंने सर आँखों पर रखा। 

फिर टिस आया। जवानों के साथ पढ़ कर एक और जवानी जी ली। शोध करते करते बेहतर जाना खुद को, अपने समाज को, और प्यार हो गया मुझे खुद से, अपने समाज से और उसके वो इतिहास से जो जानते सब है पर बहुत कम लोग क़बूल करते है। उस आत्म सम्मान के सामने ख़ानाबदोश, घुमंतू, ठग, असुर, जरामय जैसे शब्द ठिगने पड़ गए। रिसर्च के दौरान अपने समाज की महिलाओं की वो स्थिति जानी जिसे जान पर ख़ुद को मॉडर्न समझने वाली नारीवादी शर्मा जाए। 

और अब मैं नारी सतत कार्य में स्नातकोत्तर करने वाली हूँ। बाकि मुझमें जो भी बचा है वो संघर्षरत बच्चियों और महिलाओं के नाम...!

अब हर नकारात्मक शब्द में मुझे सोने की परत देखने का हुनर गया है। पारस बनना चाहती हूँ, ताकि जिसे छूवो बदल जाए। मेरे लिए बदलना धन समाप्ति और एशवर्य नही बल्कि वो हिम्मत और मज़बूती का होना है जिसमें ख़ुद को बदलने की ताकत है!

ध्यान

काफ़ी साथी विपसना कर चुके हैं और काफ़ी लोग इच्छुक भी होंगे। मैंने भी छह साल पहले की थी पर किसी केंद्र में न जा कर पूरा एक महीना एक साथी के मदद और फ़ीडबैक से। हाँ घर में ये तभी संभव है जब आप अकेले रह रहे हो और घर में सभी सुविधाएँ हैं और आपको लोगों से मिलना-जुलना बिलकुल नहीं हो रहा है। मुझे किसी काम के लिए जाना पड़ा था तो मुझे ब्रेक करना पड़ा पर उसकी असर इतना था कि मुझे अपने आसपास के लोगों के मन की हलचल भी महसूस कर पा रही थी।  

कुछ साथियों के प्रश्नः

1. क्या खुद को जानना एक यांत्रिक प्रक्रिया है जो किसी शारीरिक क्रिया पर निर्भर है

2. क्या मन किसी चीज पर केंद्रित करके खुद को जानने की तरफ जाया जा सकता है

3. क्या मन की क्रियाओं को मन्द करके आत्मज्ञान का द्वार खुल सकता है

4. क्या बार-बार किसी ढर्रे का अनुसरण मन को मंद, निर्जीव और असजग नहीं कर देता?

5. क्या ध्यान जीने से अलग कुछ है?

6. यानी क्या जीना रोक कर ध्यान किया जाता है और फिर ध्यान रोक कर जीना

7. क्या जिस ध्यान के परिणामों के बारे में हमे पहले से पता है वह ध्यान हो सकता है?

8. क्या उस अवस्था में मन बड़ी आसानी से अपेक्षित परिणामों को प्रक्षेपित नहीं करने लगता

9. क्या मन को नियंत्रित करने की कोशिश मन का ही खेल नहीं है?

उत्तर: बहुत ही जरुरी प्रश्न, मैं खुद इन्ही सवालों से जूझी हूँ, अभी मैं ध्यान के कॉमन misconceptions पर लिख रही थी, आप की बातें और मदद करेंगी. आपके एक एक सवाल का जवाब दे तो दूंगी पर ध्यान बिना किए, ध्यान को समझना बेमानी हैं.

. ध्यान सिर्फ एक यांत्रिक प्रक्रिया नहीं हैं जो सांस या किसी शारीरिक क्रिया पर निर्भर करती हैं, ये सांस और इन क्रिया को बेहतर जानने और उन्हें जानते हुए और गहरे रहस्यों को जानना हैं। 

. मन को केन्द्रित करने के पीछे मन की exercise करना हैं ताकि मन आपके कहे दिशा पर चल सके। एक बार आप मन के मालिक बन जाते हो तो मन के आधीन नहीं रह जाते, जिससे आप जैसा चाहते हैं वैसा कर पाते हैं। खुद को जानना इनमें निहित हैं, अपनी विषमताओं, मेंटल defilements को जानने के लिए इससे बेहतर तरीका नहीं हैं। ये कैसे उजागर होते हैं उसके लिए आनापन को पूरी तरह करना पड़ेगा। 

. ध्यान मन की क्रियायों को मंद नहीं बल्कि तेज किया जाता हैं। आत्मज्ञान ध्यान द्वारा प्राप्त हुयी संवेदनशीलता, समझ और अंतदृष्टि का फल हैं.

. मैं खुद सभी ritual के खिलाफ हूँ. ध्यान ऐसा कुछ नहीं जैसा बाहरी तौर से हमे लगता हैं. हाँ एक मोंक को चुपचाप घंटो बैठा देख हमें ऐसा लगता हैं जैसे वो मंद, निर्जीव और असजग हैं. जबकि ध्यान आपके senses को बहुत ज्यादा सचेत और सजग बना देता हैं. बाकि, ऊपर के कमेंट में लिंक पढ़ लें. एक विडियो लिंक हैं वो भी देख ले. बहुत जरुरी हैं हमें समझना की ध्यान चेतना को बढ़ाता हैं की उसका विपरीत जैसा बाहरी तौर से प्रतीत होता हैं

सांस के through खुद के अन्दर झाँका जा सकता हैं, बुद्ध ने ये साइंस २५०० साल पहले दी थी.. इतना ही नहीं, रिसर्च के अनुसार इससे DNA भी बदला जा सकता है।

. नहीं ध्यान जीवन का एक अंग हैं, जीवन को और नजदीकी से देखने का तरीका. आप कभी जंगल में हो तो क्या करते हो, आपको सिर्फ खुद की सांस सुनाई देती हैं. उस वक़्त आप ध्यान कर रहे होते हो

. ध्यान से जीवन रुकता हैं और जीने से ध्यान. नियमित ध्यान करने पर आपका ध्यान अक्सर आपकी सांसो पर चला जायेगा. ध्यान खुद के भाव, क्रिया, प्रतिक्रिया को समझने में सहायता करता हैं बस. हो सकता हैं बहुत लोग ध्यान करते हैं पर उसे कुछ और नाम देते हो. मैं अपनी ददिया सास के बारे में कह सकती हूँ जो ११० साल तक जी. वो दिन में - घंटे सिर्फ अकेले बिताती थी, क्या करती थी नहीं पता, पर उन्हें मैं किसी योगी से कम नहीं मानती.

. ध्यान के परिणाम हर इंसान के अलग होते हैं. जैसे मुझे ध्यान में सर पर jesus जैसा काटों का ताज महसूस होता, जिससे हमेशा खून रिसता हो, मेरे लिए ये बहुत बड़ा अनुभव था. हर इंसान अलग हैं, इस लिए उसके ध्यान के अनुभव भी अलग होंगे. अपने लिए ध्यान आपको खुद करना हैं.

. नहीं, ध्यान किसी भी भाव हो desire बनने से बहुत पहले रोक देता हैं. इसलिए आपका सवाल का कोई मतलब ही नहीं रहता. बहुत से ध्यान के नाम पर लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन बेचते हैं. वो गलत हैं. हमारे thoughts जैसे होंगे हमें वो मिल जाये, ये मन के हिसाब से चलना हैं, की मन को अपने हिसाब से चलाना. बुद्ध desire(इच्छा/कामना) को suffering (कष्टों) का root cause (मूल कारण) मानते हैं. जब आप अपने मन को हर स्तिथि में समभाव रहना सिखा देते हो तो कोई भी भाव राग या द्वेष नहीं पैदा करता. desire राग या द्वेष से पैदा होती हैं. ध्यान से आप मन को इतना स्ट्रोंग बनाते हो की आपका ईगो, सुपर-ईगो और ID (अहम्) balance में रहे (फ्रॉयड पढ़ना पढ़ेगा अगर ये जानना है)

. इसमें आप मन को नियंत्रित कर रहे हैं ताकि आप खुद को बेहतर जान सके, खुद को और बाकि सबको बेहतर जीने की कला दे सको. ताकि आप जीवन समभाव से जी सको, ताकि दुनिया में सुख और शान्ति हो

आपकी खुद की जीवन से क्या अपेक्षाएं है, उन्हें जानने और उन्हें जीने में ध्यान आपका सिर्फ एक टूल हैं.

आखरी सवाल: ये खुद को जानने का क्या मतलब?

थोडा मुस्किल सवाल, पर जवाब देने का प्रयास करती हूँ, नहीं दे पाई तो अपने गुरु लोगों की मदद लुंगी.

ये सवाल हम सब करते हैं. हम कौन हैं? हम यहाँ क्यों हैं? हमें इतने सुख दुःख क्यों झेलने पड़ते हैं? मैं ग़ुस्सैल क्यूँ हूँ, मैं impulsive क्यूँ हूँ, मेरे sexual desires इतने ज्यादा क्यों हैं?

और जाने कितने सवाल. इन सवाल के उत्तर तो हमें मिलते नहीं तो हम अपने desire के हिसाब से दुनिया में आगे बढ़ाते जाते हैं, दुःख ज्यादा हो जाये तो addiction का सहारा ले लेते हैं, जैसा मन कहता हैं उसका कहना मान कर जीवन की नैया  को आगे धकेलते रहते हैं

खुद को जानना अपने अन्दर झांकना हैं, अपने जड़ कर गए भावों को जड़ से उखाड़ फेकना हैं, खुद को बेहतर जानना हैं, अपने मन को समझना और उसे इतना स्ट्रोंग बनाना की आप उसके मालिक बन जयो. आप जैसा चाहो वैसा जी सको. ज़िन्दगी आपको नहीं, आप ज़िन्दगी को चलाओ... <3


______ Invites

Stay @ home moms, senior citizens for a once in a life time experience 

On

"Reset your life"

(Mindfulness meditation)

It will help you deal with not just the vagaries of city life: stress, depression, anxiety, addiction but also come out of any emotional/ physical or mental trauma that you may have faced anytime in your life and you are still struggling in fully recovering from it.

Group sessions on technique/ individual sessions from third week to deal with individual experiences in anapana and vipasana.

Timings(5:30-6:30am sun/tue/thru)