गुरुवार, अप्रैल 22, 2021

काली रात

"ऐ रज्जो उठ न!"

"बाबू आज हमाओ नही तुम्हारो ब्याह है, सोन दो हमे!" 

ये हमारे कोठरी में रोज की बात थी। केतन बाबू का आ कर मेरा घाघरा खींचना और किसी न किसी बहाने उठाना। अम्मा के बाद इस घर की पूरी ज़िम्मेदारी हमारे नाज़ुक कंधों पर आ गई है। अम्मा थी तो पूरा घर संभाल लेती और मैं केतन बाबू और गौरी के साथ घर खेत में पूरा दिन खेलती। अब तो केतन बाबू भी बड़े बाबू के साथ खेत पर ज्यादा रहते है और मैं और गौरी घर पर। 

"राजेश्वरी रात भर किसके साथ रात काली कर रही थी नासपीठी! चल नीचे आ बहुत काम पड़े है!"

राजेश्वरी कोई न कहता हमको सिवाय बड़ी अम्मा के। ये रात काली क्या होता हमें नही पता था तो हमने पड़ोस की गीता से पूछा था। बोली तू छोटी है ब्याह की बात चलेगी तेरी तो समझा दूँगी। हम भी समझ गए ब्याह से पहले कुछ करते होंगे।

बाबू अभी भी हमारे कमरे में बैठे हमारा समान इधर उधर कर रहे थे।

"बाबू तुमने अपनी रात काली कर ली?"

बाबू हँसने लगे। "अरे रज्जो तू बहुत ही भोली है!"

"बिलकुल नही। अम्मा बताए रही की हम तुम से कोई एक-दो साल ही छोटे है! बस अम्मा नही है न तो कोई हमारे ब्याह की चिंता नही करता। नही तो हम भी सिर्फ ताने क्यों सुनते कर न लेते रात काली!"

"चल जा अम्मा का काम ख़त्म हो जाए तो वापस यही आना खूब बातें करेंगे। आज हमारी दुल्हन आ रही है न गौना कर के तो हम खेत नही जा रहे!"

मुझे बाबू के साथ हमेशा से अच्छा लगता तो मैं झट ये उठी और अम्मा के पास पहुँच गई।

"जा फटाफट नहा ले फिर खाना बनवाना है।"

मैं नहा न निकली तो अम्मा ने चूल्हा कर दिया था। तैयारी कर दी थी। 

"पूरी आलू टमाटर, सीताफल, रायता और खीर। इतना सब बनना है। गीता को मैने सफ़ाई के लिए बुला रखा है। काम ख़त्म करके तेरी मदद कर देगी।"

"ठीक है अम्मा अब तुम्हारी बहू आ जाएगी तो हमारी रसोई से रुकसती मत कर दियो!"

"न केतन को तेरे हाथ का पसंद है। बहु को भी तुझे ही सिखाना पड़ेगा!"

हम जुट गए। ज्यादा बडा परिवार नही है और अभी तो दिन का ही बनाना है शाम को लिए तो पाँत लगेगी तो गांव की औरतें आ कर बनाएगी। गीता भी आ गई भोर फूटने से पहले ही। तेज़ आँच कर फटाफट पूरी निकाली हमने। गौरी भी आ गई और रायता खीर की तैयारी उसने कर दी। हमें जैसे ऊपर जाने की जल्दी थी। एक बडी थाली लगाई और हम बोल दिये सबको। 

"कुछ देर हमें आराम करने देना। फिर तो पता नही कब आराम मिले!"

थाली ले कर कोठरी में पहुँचे तो बाबू वही बिस्तर पर लेटे थे। हमने चौका कर उठाया।

"रज्जो धूप आ रही है। साँकल लगा दे!"

हमने थाली कोने में रख साँकल बंद करने लगे! पीछे से अचानक बाबू ने पकड़ लिया और घाघरा खोलने लग गए।

"अरे अरे ये क्या कर रहे हो बाबू?"

"हमने सोचा रात नही तो दिन ही काली कर दे तुम्हारी!"

"हप्प। ऐसे होती क्या?" 

हमको लाज आ रही थी पर बाबू का स्पर्श बहुत ही सुखद था।

"आँखें बंद कर लो रज्जो।"

फिर वो हमें चारपाई पर बैठा कर बोले, 

"अब खोलो आँखें!"

वो निर्वस्त्र खडे़ थे। हमें समझ नही आ रहा था हमारे अंदर क्या हो रहा था। हम उनको छू छू कर ख़ुद को यक़ीन दिला रहे थे की हम सपना नही देख रहे। फिर वो आलिंगन जिसका शायद में हर बार बाबू तो देख मैं ख़्यालों में कर लेती थी। आज यक़ीन नही हो रहा था की मैं उनके साथ हूँ जिसके मेरे दुल्हे बनने का सोच भी नही सकती थी। 

बाबू का प्रेम इतना कोमल हो सकता है मैं सोच नही पा रही थी ये मेरे साथ हो रहा है। बीच बीच में पूछ लेते, "ठीक लग रहा है न! कोई तकलीफ़ हो तो कहना!"

और हम सिर्फ हम्म करके रह जाते!

जो हुआ मुझे बताने वाला कोई नही था। शायद अम्मा के प्राण भी मुझे यही बताने के लिए अटके थे। पर वो आखरी समय में बोल कहा पा रही थी।

हम दोनो जब पूरी तरह तृप्त हो कर एक दूसरे के आलिंगन में खो गए तो मुझे लगा नीचे गौरी की आवाज आ रही थी।

"भैया कहा हो, डोली गाँव में आ गई!"

मैने बाबू को झंझकोर कर उठाया...

"आ गई तुम्हारी बहू!"

"पर मेरी पहली बहू तो तुम हो रज्जो!"

लगा जैसे ये सुनने के लिए मैं सदियों से तरस रही थी।

बहू सुंदर थी। उन्हे एक बड़ा कमरा मिला जिसे मुझे सजाना था। 

दिन बीते रात बीती...

दो महिने पर पता चला बहू के पैर भारी है। मैने पूछा कैसे पता चला तो अम्मा ने बताया माहवारी बंद है और जी मचलता है। यह सुन मेरा भी मचल गया और मैंने खूब उलटी की। मेरी भी शादी के बाद से माहवारी बंद थी!

गीता को जा कर मैने बताया तो वो गाँव की दाईं के पास ले गई। 

मेरे भी पैर भारी थे! ये बात किसको बताती। बाबू शायद वही समझ सकते है।

एक दिन बहु पास के मंदिर गई थी तो मौक़ा पा कर में बाबू के पास पहुँच गई।

"हम भी माँ बनने वाले है आपके दो दो बालक होने वाले है!"

"ये कैसे हो सकता है! कोई पूछे तो कह देना किसका पाप है - बहुतों के साथ रात काली की है न तुमने!"

मैं भक्क रह गई! ये क्या वही बाबू है जो शादी के दिन मेरी कोठरी में था। शायद मैने ही गलत सपने देखे थे!

और उस दिन जब बहू की गोद भराई थी मैं अपनी कोठरी में काठ पर रस्सा कस रही थी। अब आगे कोई और रज्जो नही बनेगी!