बुधवार, नवंबर 19, 2025

रंगीन ज़िंदगी

कल रात मैं अपनी ज़िंदगी का आँकलन करने बैठी। उफ़्फ़! इतनी ज़्यादा eventful ज़िंदगी शायद नसीब वालों को मिलती होगी। जन्म से पहले से ले कर आज तक मैंने हर रस को चखा है और हर लम्हा डूब कर जिया है। हर तरह के गुनाह, परेशानी और दर्द का प्रत्यक्ष रूप में अनुभव किया है (चाहे ख़ुद का/पर न हुआ हो)। हर क्लास की ज़िंदगी जी है। ग़रीबी महसूस की है और अय्याशी भी। नई ज़िंदगी को नज़दीकी से देखा है तो सौ से ऊपर वाली मौत को भी। हर तरह के घर में रहे है तो सड़क पर भी सो चुकी हूँ। हर तरह की नौकरी की है - सरकारी क्लास वन से ले कर कॉन्ट्रैक्ट की! और बिना नौकरी के भी रही हूँ। हर तरह के स्कूल में पढ़ा है - सरकारी से कॉन्वेंट तक! तीन साल की बच्ची के साथ बलात्कार जैसी विभत्सता देखी है तो समानभूति के भी ढेरों अनुभव है। बड़ी ग़लतियाँ की है तो देश और जनता की सुरक्षा  में महत्वपूर्ण योगदान भी किया है। तकनीकी क्षेत्र में भी कम काम नही किया है। कुछ के दिल दुखाए है तो बहुतो को जीवनदान भी दिया है। कुछ कड़वे रिश्ते है तो ढेरों निःस्वार्थ रिश्ते भी है। ख़ुद के साथ बहुत बुरा समय देखा है - पूरी तरह गतिहीनता और अवसाद के, तो पूरी तरह स्वस्थ, अतिव्यस्त और productive भी रही हूँ। बहुतों से प्यार किया तो बहुतों को दिया भी! हद की ज़िल्लत सही है और उतने ही हद की कामयाबी!!

इतना सारा उतार चढ़ाव देखा है ज़िंदगी में पर उत्साह, उमंग और स्वप्रेरणा की कभी कमी नही आई! अगर मैं अपने अनुभव लिखने लगी तो न जाने कितनी खंड भर जाएँगे क्योंकि मेरी ज़िंदगी में हर पल रोमांचक रहा है!

पर क्या ये सब अपने आप हो गया या इसमें मेरा अपना हाथ है। बचपन को छोड़ दो जो बहुत हद तक हमारे अभिभावकों के निर्णय पर निर्भर करता है, ज़्यादातर जो हमारे साथ होता है वो हमारे अपने निर्णय और जगह-समय (space-time) के मिलान से होता है। हर पल हमारे पास अनंत संभावनाएँ होती है, हम जो चुनते है वो हमारा अगला पल हो जाता है।


Life is a tapestry woven by the decisions we make.

Sherrilyn Kenyon

मंगलवार, नवंबर 18, 2025

तस्वीर

तब बेटा छोटा था. हम घंटों कैनन के दूकान पे बिताते.
लाखों के कैमरा लेंस. शायद उनको सीखने का बहुत शौक़ था, और मुझे उनका साथ देने का...
जितने समय उनके साथ मिलता हमेशा कम ही लगता था.
कुमारजी के पास जा कर दो चीज़ ले आना... हाँ पहुँचो तो कॉल करना..
घंटो इंतज़ार कर के उनको फ़ोन पे....
हांगकांग गयी तो, निकोन का लेंस..
अपने लिए कैमरा लेना हैं, कौनसा लें? कैनन खराब हो गया हैं! नया लो.

तस्वीर वो जो लखनऊ के होटल में खिची थी...
परसों जब मैंने तस्वीर मांगी तो बोले, सारा आर्काइव डिस्ट्रॉय कर दिया हैं.. कुछ नहीं बचा!
कुछ दिन पहले रानीखेत की कुछ तस्वीर देखीं तो अजीब लगा. वो सच था, या ये...
तस्वीर मिटा दी होगी, पर जो दिल-दिमाग पे उतारी थी उसे कैसे उतारोगे...

गुँगा बहरा समाज

हम अक्सर गूंगे बहरे हो  जाते हैं जब किसी और को तकलीफ में देखते हैं।

मैं जबलपुर से इलाहाबाद जा रही थी। 

यह बात २० साल पहले की है, मेरा पहला बॉयफ़्रेंड और उसके कुछ दोस्त मुझे रेलवे स्टेशन छोड़ने आए थे। ट्रेन चल दी पर उसका हाथ नहीं छोड़ पा रही थी। चंद दिन पहले ही पहले प्यार का अहसास हुआ था।
रात की ट्रेन थी। जबलपुर से इलाहाबाद तक की। फिर वहाँ से लखनऊ जाना था।
ऊपर की बर्थ थी। मेरी पसंदीदा। ऊपर जा कर लेट गई। ट्रेन खचाखच भरी थी। मेरे कूपे में कोई महिला नहीं थी।
रात मे अचानक नींद खुली तो पाया एक आदमी मेरे बग़ल में सोने का नाटक कर रहा है, अपना हाथ मेरे ऊपर रख कर!
मैं उठी और उसको ज़ोर से धक्का मार कर नीचे ढकेल दिया। वो चेन को पकड़ कर लटक गया।
मैं ग़ुस्से से चिल्लाने लगी। 
"कैसे हिम्मत हुई तुम्हारी मेरे पास लेटने की"
"जगह नहीं थी इसलिए लेटा था"
पूरी बोगी जाग गई। भीड़ हो गई पर कोई कुछ नहीं बोला। पहली बार पता चला की मैं एक गुँगे बहरे समाज का हिस्सा हूँ जो अन्याय को देख कर अंधा भी हो जाता है। क्या आपके साथ हुए हर हादसे के लिए आप ख़ुद ज़िम्मेदार है?
तीन साल पहले जाना की इस समाज का इलाज हमारी चुप्पी में नही है! हमारी व्यक्तिगत कहानियाँ ही समाज को आईना दिखायेगी। उनकी बिलकुल फ़िक्र मत करो जो कहे "हम तो ऐसे नही है!", "सब पुरुष ऐसे नही होते!", "तुम पूरे समाज के लिए ऐसे कैसे कह सकती हो!"
उनके लिए मेरा एक जवाब है, जिस दिन सब लड़कियाँ अपनी कहानी कहने लगेगी उस दिन मै चुप हो जाऊँगी!! तब तक इस समाज का चिल्ला-चिल्ला कर कान सच में बहरे करने की ज़रूरत है।

सच की बाउंड्री

एक बच्चा जब अपनी मम्मी या पापा को चोरी-चोरी किसी और से नज़दीक पाता है तो उसे कैसे लगता है? आप को किसी और से अपने मम्मी या पापा के अंतरंग संबंध को बारे में पता चलता है तो आपको कैसा लगेगा। ऐसे में आप क्या करेंगे?
हम माँ बाप को इस ऊँचे स्थान पर रख देते है की हमें वो आपस में सेक्स करते भी खटकते है!
ये भी क्या पेरेंटिंग की कमी है या समाज ये भाव बच्चों में डालता है? या ये सब उम्र को हिसाब से सेक्स के बारे में जानकारी न देना का नतीजा है?
जो भी इस सबने तमाम बचपन और ज़िंदगी बर्बाद की है! ग़ुस्सा, घृणा, डर और अपराध बोध जैसे ख़तरनाक अहसासों से बचपन और जवानी भर जाती है। आप अपने मम्मी पापा ही नही ख़ुद को भी माफ़ नही कर पाते हो!
छुपा हुआ हलके से हल्का सच से बेहतर है भारी से भरकम सच जो सबके सामने है!

Ritual

I called him up just a little while after the ritual.
He had asked me to write about every book I read. I am almost through with The SandGlass. A lovely travel book, as Prasad called it as he gifted it to me. The story line as it is unfolding makes me more clear of the two word message he would get once I complete the book. Thank you!
The three days in hyderabad flew in abandon. My soul unwinded in the solace of Mad. Madhavi- my Alter ego as she calls me.
I experienced real freedom after a long time, though many have promised me to free me from my invisible cage. A treat of Life with Mad, Prasad and their two lovely Lahari and Millie.
When Prasad looked around his shelves for the Legends of Kasaks, I could make the eagerness he had to show me the dark part of his life through this unique way. As we sat through the afternoon imploring and exploring the word freedom, I got stuck as he quitely plumbed a question, Are you really free?
Freedom for him is to have faith and let go. Faith, we debated it for long. He said faith is food for the poor, religion for the sinner.. Legs have faith in feet, body has faith in mind.. Faith is like fatherhood, only the expereincer knows of it, like a mother. I could understand the pain in him which showed a little everytime we went a little further. Mad, my darling, my chatterbox, would irritate me like hell. As she says we like each others physical touch. It fills the gaps we have from our partners. She would pinch me everywhere and I would allow her till I would pinch her so hard that she would stay away from me for a while. Just a while. She couldnt sleep for days after we left each other.
We would like to watch Godfather when everyone would have been interested in watching cricket. She would throw everyone out of the common room through her pranks.
She came to pick me up at an hour past midnight, with a very sceptic Prasad. Our meeting, the extended hugs and kisses must have eased him a bit as he held Shivi's hand and our baggage. She was pale and weak. I felt the pain she had had all these months.
And as I became a part of her again after 15 yrs, I could understand what strayed her. She lived in a real world and he lived in an imaginary world.
He lived through his values and she through her worldliness. She was as selfish as his selflessness.
He was quite hungry as he came early from office to see us off for the evening flight. Madhu in the kitchen made dosa for him to compensate for the breakfast he had. We woke so late and she could only manage to give the last night leftovers for breakfast. I sat opposite to him, braiding Shivi's hair. And he in his ever generous demenour shared his dosas with four of us. I got a double treat as Millie kept feeding her favourite aunty as well.
I wrote about a living book instead of Romesh Gunesekera's The Sandglass.
Alone I called him from the attic. I lied. I had had my 5 min ritual. And he had gone to sleep with Shivi in the ground floor. The bed wouldn't have accommodated me. But I knew that I won't have anymore of him. I had had my share.

मर्यादा...

चचेरी बहन थी वो मेरी. अरुणा. मासूम. प्यारी से.
शायद १७ की हुयी थी बस. बारहवी की थी बस.
१९८२ में जब ASIAD चल रहे थे तब चाची आखरी सासें गिन रही थी मेरठ में. पापा के साथ एक हफ्ते के लिए चाचा की मदद करने गए थे. कुछ लाइलाज बीमारी थी उन्हें.
चाची हॉस्पिटल में एडमिट थी. पहली मुलाक़ात अभी भी याद हैं. बहुत खुश थी वो अपनी कमजोरी के होते हुए भी... मुझसे अपने बाल बनवाए. मैं सिर्फ ११ की थी. बातें करने लगी. बिलकुल वैसे बातें जो मुझे पसंद थी.
"कितनी अनोखी बात हैं. तुम तीन भाई-बहन और मेरे पहले तीन का जन्म महिना एक हैं. तुम्हारा-नरेश का, अरुणा-सत्येन्द्र का.... सब जोड़े में हैं."
मुझे अपनी बातों में मन्त्र-मुग्ध कर दिया था उन्होंने. कुछ बैग से निकलते हुए बोली.
"ज्योति के लिए ये स्वेटर बनाया हैं. बोर होती रहती थी. हाँ बटन नहीं लाये तुम्हारे चाचा. बटन खरीद के लगवा लेना. तुम्हे तो सिलाई-बुनाई बहुत अच्छी आती हैं न. जल्द ही सर्दी हो जाएगी"
मैं भी बच्ची थी. स्वेटर तो दे दिया पर बटन नहीं लगाये. आज भी अफ़सोस हैं उसका.
चाची चली गयी. सब कहते हैं उन्हें अपने दुखों से मुक्ति मिल गयी. पीछे छोड़ गयी अरुणा जो 6 की थी. एक बड़ा भाई और दो छोटी बहनें.
उस गर्मी छोटे चाचा के घर अरुणा की ड्यूटी लगी थी. बारहवी की छुट्टिया थी न. खाना बनाती थी वो. पर उस दिन किचन में कुछ ऐसा हुआ की उसकी दुनिया ही बदल गयी. मुझे सिर्फ तब इतना पता चला था की अरुणा ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी. और अलीगढ में मौत से लड़ रही हैं।
तीन महीने बाद मैं उससे मिली. उसे अपने घर ले जाने आये थे. छोटा सा स्टेशन था. ट्रेन लेट थी. हम दोनों घंटे बातें करते रहे. उसने मुझे सब बताया. बहुत गुस्सा थी मैं सबसे. पर तसल्ली हुयी की मैं उसको समझा पाई की सिर्फ छूने से बलात्कार नहीं होता. कितनी नादान थी मेरी बहन. घर वालों से क्या बात करती. सबके मुह पर सिर्फ एक शब्द था. मर्यादा.
वो १७ की थी. उसकी शादी एक अधेड़ उम्र के साथ तय हो गयी. मैं और बुआ मना करते रहे. पर किसी ने नहीं मानी. सबके मुंह पर सिर्फ एक शब्द था. मर्यादा.
हमारे घर से उसकी शादी हुयी. मेरे शादी के लहंगे में बहुत ही खुबसूरत लग रही थी अरुणा.
पति बहुत अच्छा मिला. बहुत प्यार मिला उसे. अगले साल उसने एक बहुत प्यारी बेटी को जन्म दिया.
पर फिर उसकी तबियत खराब रहने लगी थी. आत्महत्या के अन्दुरुनी घांव बढ़ने लगे थे. एक दिन वो अचानक चली गयी. अपनी विरासत छोड़ कर.
आज अरुणा शिवानी में जिंदा हैं. पर मर्यादा. और ना जाने कितने मासूमों की ज़िन्दगी तबाह करेगी.