रविवार, मार्च 27, 2016

गिबरिश ध्यान..

आज सुबह हैप्पी स्ट्रीट्स नॉएडा में एक लड़की पूजा ने गीब्बेरिश ध्यान करवाया. कहा ओशो की देन हैं.. आपको ऐसी भाषा बोलना हैं जो किसी को नहीं समझ आये, हाथ पैर बेतरतीब चलाने हैं.. ५ मिनट बिना किसी को छुए करने से सारा तनाव/स्ट्रेस कम हो जायेगा..
शहरी जीवन में ये बहुत आम हैं ही आदमी दिन भर के जद्दोजहद के बाद थक, परेशान और निराश हो जाये. ये गिब्बेरिश ध्यान एक band-aid की तरह हैं जो आपको अगला दिन शुरू करने की हिम्मत दे देता हैं.. इसकी जगह एक घंटे गिम में बिता लीजिये, या कोई खेल खेल लीजिये, बच्चों के साथ समय बिता लीजिये, कोई गाना सुन लीजिये, डांस कर लीजिये, कोई स्केच बना लीजिये, कोई प्यारी सी फिल्म देख लीजिये, दोस्तों के साथ व्हात्सप्प या घर पर गपशप कर लीजिए... या कोई नयी योग्यता हासिल कर लें जो आपको व्यस्त रख सके.. बहुत ज्यादा हो गया तो दारु पी ली, या दिन भर तम्बाखू के नशे में काटा, सब एक ही काम करेंगे, band-aid का. आप अगले दिन वही गलतियां, वही प्रतिक्रियाएं, वही दर्द और वही लुफ्त दोबारा झेलने के लिए तैयार हो जाते हो.. यही दुष्चक्र चलता रहता हैं और एक आम इंसान की ज़िन्दगी कटती रहती हैं.. हर दिन इस उबाऊपने से निकलने की एक नयी जद्दोजहद! 
जब इस दुष्चक्र से ऊब होने लगती हैं तो अगर बचपन से हमने धर्म को नहीं माना हैं तो हम अब धर्म के पीछे भागते हैं, या कहिये गुरु की तलाश शुरू करते हैं.. हर धर्म में अध्यात्म हैं, साथ उसके बहुत सी उलझुलूल रीति-रिवाज़ और अंधविश्वास.. और एक आम इंसान इन्ही रीति-रिवाज़ और अंधविश्वास में फंस कर रह जाता हैं. ये भी सिर्फ band-aid का ही काम करते हैं. नास्तिक हुए तो ऊपर दिए नुक्सों पर ज्यादा यकीन करता हैं.. किसी को कुछ चाहिए और नहीं मिल पा रहा तो लॉ ऑफ़ अट्रैक्शन बेचने वाले भरे पड़े हैं.. कुछ समय निचिरेन बुद्धिज़्म फॉलो करके मेरा बुद्धिज़्म से ही विश्वास उठ गया था.. वही दिन भर बिन सर पैर की चैंटिंग, और जो चाहो वो ज़िन्दगी में मनिफेस्ट करलो. ईसाई धर्म में भी ऐसे बाबाओं का बहुत बोल बाला हैं. हमारे हिन्दू धर्म की पूछिए ही नहीं, यहाँ तो भगवान्  को याद ही तभी किया जाता हैं जब कुछ चाहिए हो और नहीं मिल रहा हो.
पर इस पुरे रास्ते में हम खुद को खुद से दूर करते जाते हैं. अपनी सही पहचान से दूर. खुद को किसी व्यक्ति, किसी धर्म, किसी विचारधारा या अपनी किसी योग्यता से जोड़ कर देखने लगते हैं. सच्चाई से दूर होते जाते हैं..
अध्यात्म के बारे में सिर्फ अभी इतना कहना चाहूंगी की वो सिर्फ खुद के जानने की प्रक्रिया हैं. और उस दुष्चक्र 
से मुक्ति जिसमे हम सब फंसे हुए हैं..

तूफ़ान में किश्ती...

कैसे समय बीत जाता है पता ही नही चलता। ४५ साल हो गए है। में १८ की थी। ८ बहनों मे तीसरा नम्बर था मेरा। पिताजी पुलिस में अफ़सर थे, घर नौकर चाकरों से भरा रहता। कभी कोई घर का काम करने की ज़रूरत नही १८ में शादी हो गई एक गाँव मे। सबसे बडी बहू। कड़क सास। रात में ही ४ बजे उठ पर पाँच किलो गेंहू चक्की में पीसना, फिर चौका करना, खाना पकाना, घर बुहारना, दिन भर अनाज, दालें तैयार करना... जब समझ आया तो समझ नही आता था की कैसे करूँगी। दूसरे सुबह गेहूँ देख कर टकटकी लगाए देख रही थी की सास आई और एक चपत लगा दी। मै वही बेहोश हो गई।
कुछ दिन बाद पति भी चले गए काम पर। एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे। पिताजी को शायद इतने पसंद आए की ससुर जी को झूठ पर झूठ बोल गए। हमारी सप्पो घर का सारा काम करती है! बस वही झेल रही थी।
किसी तरह कुछ महिने कटे तो पता चला मैं पेट से हूँ। दिक़्क़त बढ़ती जा रही थी। काम करना मुश्किल होता जा रहा था। सिर्फ एक रास्ता दिखता था। खुद को ख़त्म करना। २ बार चूहे मारने की दवाई खाई पर फिर उलटियों में सब निकल गई।
काफी सर्दी हो गई थी। दिसम्बर का महिना था। उस रात तय कर लिया था कि कुएँ में आज कूद कर जान देनी थी। रात मे सबके सोने के बाद चुपके से बाहर निकल कर कुएँ पर गई। कूदने की हिम्मत नही हुई। पेट मे बच्चा घूँसे मारने लगा था। बस घर छोड़ कर निकल पड़ी। चौराहा एक किमी दूर था। पहुँची तो पता चला अब गाड़ी सुबह ही मिलेगी। कुछ लफ़ंगों ने ज़बरदस्ती छेड़छाड़ शुरु की पर मेरा पेट देख कर एक के कहने पर छोड़ दिया।
३-४ घंटे बहुत डर मे किसी तरह बीते। फिर एक अलीगड़ की बस आई। बैठ कर याद आया मेरे पास न पैसा है न कुछ और। कंडक्टर को बताया कानपुर जाना है, सिर्फ एक सोने की अँगूठी है। वो अच्छा था। कहानी सुनी और अलीगड़ से कानपुर की बस में भी बिठा गया। मुझे पता नही मै कानपुर वाली मौसी के यहा क्यो जा रही थी। पर शायद वो ही एक जगह थी जहा जाने की हिम्मत थी।
मौसी मौसा बहुत अच्छे थे। २ दिन वही रुकी। फिर मौसाजी ने मुझे मनाया की मै उनके पास चलू। मुझे डर लग रहा था पर वो मुझे छोड़ने गए। पति को पहले से ही पता था, उन्हे तार आ गया था और वो घर के लिए निकलने ही वाले थे। १-२ महिने में सब ठीक हो गया। पहला बच्चा था पर मै खुद बच्ची थी। ९ महिने से कुछ ऊपर हो गए पर दर्द नही थे। पति ने मेरी बहन, भाई; अपनी बहन को बुलाया पर सास भी आ गई। पर यहा इतनी दिक़्क़त नही थी। खाना पकाने के लिए महारिन लगी हुई थी।
उस दिन चैत्र की अष्टमी थी। मौहल्ले मे कन्या खिलाई जा रही थी। घर पर भी पूरी हलवा बना था। खा कर सब सोने चले गए। बार बार पेशाब जाने का मन हो रहा था। ननंद बोली की आँगन की नाली मे कर ले, अंदर रोशनी नही है।
रात १०:३० पर मै नाली पर बैठी तो लगा कुछ निकल रहा है। मै चिल्लाने लगी। तब तक बच्चा नाली मे निकल चुका था। घर के पास से ही दाईं आई, तो नाल काटा।
एक प्यारी सी बेटी हुई थी!
काट कर रखा ही था की एक जंगली बिल्ला मुँह मे दबा कर चल दिया। सास मे शोर मचा कर उसे भगाया! आज ४४ की हो गई है मेरी गुड़िया।
ये एक माँ की कहानी जिसने तूफ़ान में एक किश्ती को बचा लिया...

गुरुवार, फ़रवरी 04, 2016

बुत

अरुंधती सो नहीं पा रही थी. रह रह कर वशिष्ठ की बलिष्ठ बाहें सता रही थी. एक बार उन्हें छू भर ले तो उसे नींद आ जाये. पर यह अब कहाँ मुमकिन था.
उसे पता था की मन की तृष्णा अब शायद ही पूरी हो. वशिष्ठ अब उसके पास नहीं आ पायेगा. 
वशिष्ठ भगवान् नहीं था, शायद दुनिया का सबसे ज्यादा अय्याश, धोखेबाज़ और भ्रष्ट मानव था. पर जब दिल गधे पर आ जाये तो किसी और को कहाँ जगह मिलने वाली थी. खुद को पूरी तरह उसका बनाना भी उसके लिए आसन नहीं था, पर जब एक बार ठान लिया तो खुद को जीवन भर के लिए समर्पित कर दिया.
उसको जीना था, वशिष्ठ के लिए, खुद के लिए और उसके आने वाले कल के लिए. अरुंधती जानती थी की उसमें इतनी उर्जा हैं की वो जो चाहे कर सकती हैं. कितने रोते बच्चों को हंसा सकती हैं, बिलखती माँओ को संभाल सकती हैं, लोगों को जोड़ सकती हैं, दुनिया बदल सकती हैं.
पर उसकी खुद की ज़िन्दगी उसके बस में नहीं हैं. वशिष्ठ कहीं गुम हो गया हैं. वो वशिष्ठ जिसके कुछ पल हाथ थामने से उसकी उर्जा सौ गुनी बढ़ जाती थी.
उसे पता हैं ही अगर वो बुत के साथ होगी तो वशिष्ठ के साथ धोखा होगा. पर आज उसको वशिष्ठ का प्यार जिंदा रखना हैं, क्योंकि उसने खुद को ये वचन दिया था. उसका सतीत्व ही उसकी असली उर्जा थी.
और उसे पता हैं, सिर्फ एक बुत ही उसकी मदद कर सकता हैं. रात के अँधेरे में, कुछ पल के लिए आँखें बंद कर के वो बुत में वशिष्ठ की बलिष्ठ बाहें ढूँढ लेती हैं. अगला दिन बेहतर हो जाता हैं, उसके लिए और उन सब के लिए जो वशिष्ठ की अरुंधती पर आश्रित हैं.

हम छूते हैं उसको पत्थर की बुत समझकर.
हमें डर हैं की वो इंसान न बन जाए...