मंगलवार, जुलाई 16, 2019

हम किसान है

हम किसान है।

इसलिए बाबूजी ने पापा को एग्रीकल्चर पढ़ने की तरफ ढकेला। गुलावटी से बीएससी एग्री के बहुत किस्से सुनाते रहते है पापा। पहला ये कि वहा सब बच्चे नंगे पैर आँतों थे। दूसरा लड़कों की हॉस्टल, रसोइए का दूर से फेंक कर रोटी देना और लड़कों का कैच करना। 

पापा मेरी तरह दादाजी की पहली संतान थे। पढाई की महत्ता बाबूजी समझ चुके थे। शायद बचपन से सपना देखा था की बेटे को देश के सबसे ऊँचे कृषि संस्थान में भेजेंगे। 

पापा का पूसा इंस्टिट्यूट में दाख़िला हो गया। उस समय वहा सिर्फ साउथ इंडियन्स बच्चे थे ज्यादातर। और वाह री हमारी शिक्षा व्यवस्था। वहा तो पढाई भी अंग्रेज़ी में थी। पापा नार्थ इंडिया के गाँव के स्कूल से पढ़े पहले स्टूडेंट थे। ऊपर से इतने अमीर भी नही थे की हॉस्टल की फ़ीज दे पाते। तो दिल्ली कैंट में सिपाही लोगों के साथ उनके टेंट में कुछ रुपयों में रह लेते और पैदल पूसा जाते। 

हमेशा से मेधावी रहे पापा, अंग्रेज़ी के चलते पहले सेमेस्टर में पास नही हो पाए। उन्होंने सोचा घर वापस जाना बहुत शर्म की बात है तो क्या किया जाए। ऐसे में इकलौते नोर्थ इंडियन प्रोफ़ेसर माहेश्वरी (वो भी विदेश से पढ़े) ने उन्हे बुलाया और ख़ुद घर पर एक्सट्रा क्लास ली। 

मात्र उन्नीस की उम्र में अच्छे नम्बर से पास कर पापा को पहली जॉब दी स्वामी ब्रह्मानंद ने राठ में। उन्होंने १९६० पहला प्राइवेट कृषि पर कोर्स शुरु किया था और पापा को बतौर प्रोफ़ेसर आठ साल नौकरी का मौक़ा मिला। 

बुंदेलखंड की बंजर भूमि को बौद्धिक संपदा में बदलने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, त्यागमूर्ति, शिक्षा के सागर, युगपुरुष, कर्मठ संत प्रवर स्वामी ब्रम्हानंद की १२३वीं जयंती आज राठ में बनाई जा रही है।

हमें गर्व है ऐसे महापुरुष पर जिन्होंने राठ, हमीरपुर के पिछड़े क्षेत्र में कई शिक्षण संस्थाएं खोलीं। उनके और भी अनेकों योगदान रहे है। १८३८ में सूखे पर उन्होंने १० दिन का अनशन किया जिसके बाद गांधी जी की मदद से किसानों को सरकारी रिलीफ़ मिला। वो किसानों की ज़रूरतें भली प्रकार समझते थे। उन्होंने दलितों और किसानों में दहेज, नशाबंदी, बाल विवाह के ख़िलाफ बड़े पैमाने पर काम किया। लडकियों के हॉस्टल और उनकी शिक्षा पर जोर दिया। वो खेतों की बीच अपनी छोटी सी झोपड़ी में रहते थे। मेरे जन्म पर मम्मी पापा मुझे ले कर उनके पास गए थे। 

उन महानात्मा ने मुझे तब पता नही क्या आशीर्वाद दिया था पर आज उन्हे याद कर में जरूर तय करती हूँ कि किसान की जर्जर हालत की बेहतरी में अपनी बात हमेशा रखूँगी और जो कर पाऊँगी ज़रूर करूँगी।

वोल्गा से गंगा

राहुल सांकृत्यायन जिन्हें महापंडित की उपाधि दी जाती है, हिन्दी के एक प्रमुख साहित्यकार थे । वे एक प्रतिष्ठित बहुभाषाविद् थे और बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में उन्होंने यात्रा वृतांत/यात्रा साहित्य तथा विश्व-दर्शन के क्षेत्र में साहित्यिक योगदान किए । वह हिंदी यात्रा सहित्य के पितामह कहे जाते हैं।

मैंने इनकी "वोल्गा से गंगा" बहुत पहले पढ़ी हैं, इसके बाद इनकी मानव समाज पढ़ी। मेरे लिए समाज की समझ बढ़ाने के लिए ये दो शुरुआती किताबें बहुत मानक थी। बहुत सी और किताबें है जो मानव विकास को नए नज़रिया देती है पर जेम्स स्कॉट की 'द आर्ट ऑफ़ नॉट बींग गवर्नड' सबसे ज़बरदस्त लगी!

वोल्गा से गंगा में राहुल सांस्कृत्यायन ने पिछले आठ हज़ार सालों के इतिहास को एक आम जन की नज़र से देखा है। पहली कहानी निशा ६००० ईश्वी पुर्व की है जब हिंद, ईरान और यूरोप की सभी जातियाँ कबीलों के रूप में रहती थी। ये आज से ३६५ पीढ़ी पहले की कहानी है जो वोल्गा के तट पर मानवता के प्रारंभिक काल को दर्शाती है। जहा मानव जीवन कठिन और दुर्गम था, और पूरा विस्तृत परिवार जिसका नेतृत्व एक बलिष्ठ महिला करती थी -  सभी गुफ़ाओं में रहते थे। समाजिक व्यवस्था मातृसत्तातमक थी। आग का आविष्कार हो चुका था और सभी शिकार पत्थर के औज़ार से होता।

कुछ कहानियों को छोड़ सभी आमजन ही इनके नायक-नायिका है और उनके बीच के रुमानी पलों को दर्शाते हुए उस पीढ़ी के समाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक जीवन का दर्शन कराया है। राहुल ने इस चित्रण से अपनी आदर्श दुनिया को भी चित्रित किया है जहा धर्म और उससे जीने वाला ब्रहवाद, राज्यों के सामंतवाद और राज्यवाद, बढ़ते पितृसत्ता से लगातार गिरता महिलाओं का समाजिक स्तर के प्रति आमजन सचेत है। मानव स्वार्थ को इन सबके देखते हुए हर कहानी का नायक/ नायिका इनका विरोध करते हुए अपनी प्राणों की आहुति तक देता है। 

दूसरी कहानी में घुमंतू जीवन जहा पूरा कबीला इकट्ठा रहता है और उसका संचालन एक जन-समिति करती है जिसमें  नेतृत्व एक नायिका करती है। मानव विकास की श्रंखला में धीरे धारे अविष्कार जुड़ते जाते है जैसे ताँबा, लोहा, खेती, कपास और ये सब एक जगह न हो कर अलग अलग जगह होता है जिससे व्यापार  को बढ़ावा मिलता है। संचय जिसका भी हुआ हो लूट मार और आक्रमण का कारण बना। पहले पशु, अनाज, खनिज मानव समूहों के बीच संघर्ष का कारण बना, आगे चल कर दास-दासियों की चाह कारण बनी। 

सबसे ज़रूरी पहलू ये है की इनकी कहानियाँ हमें उस समय के विश्व की स्थिति जिस समय की कहानियाँ कही गई है जिसमें लगभग पूरा एशिया, यूरोप और भारत, जहा जहा उन्होंने ख़ुद घुमक्कड़ी की थी, उसके दर्शन, दार्शनिक और संस्कृति से हमें मिलवाती है। 

एक तरफ ये ब्राह्मणवाद और हिंदू धर्म का स्वार्थी चेहरा दिखाते है वही इस्लाम धर्म जिसे कट्टर माना जाता है उसका उदारवादी चेहरा दिखाते है। 

शुरुआती आर्थिक व्यवस्था, श्रेणी संरचना, व्यापारियों के स्वार्थ और आख़री कहानियों में युद्ध, पूँजीवाद और साम्राज्यवाद में गहरा संबंध दिखाते हुए ये साफ दिखाते है की अर्थ मानव विकास में बहुत अहम भूमिका रखता है।

समाजिक संरचना के बदलते स्वरूप हमें हर कहानी में मिलते है - पहली कहानी निशा जगा एक परिवार में आपस में समागम होता है से जन समूह के अंदर फिर दो के बीच संबंध से शुरु हो कर दो नस्लों (आर्य- असुर) के बीच, दो संस्कृति (यवन-आर्य), दो धर्मों के बीच रिश्तों को दिखा कर दर्शाते है की जो भी संरचना रही हो मानव प्रेम सभी दीवारों से परे है!

एक पहलू जो सभी कहानियों को जोड़ता है वो है हर पीढ़ी की संस्कृति - कला, कविता, नृत्य, गीत-संगीत, नाटक, साहित्य-चर्चा - चाहे जिस रूप में हो नायक नायिका अपनी संस्कृतिक कला से ख़ुद को एवम् अन्य आमजन को ख़ुश रखते है। 

राजनैतिक संरचना के बदलते स्वरूप में राहुल सांकृतायन गण-राज्य (यौद्धेय), पंचायत राज और जन समिति को राजशाही और साम्राज्यवाद की आँधी ने कैसे तबाह किया ये बख़ूबी चित्रित करते है। एक तरफ वो गांधी और अंबेडकर दोनों को कुछ हद तक नकारते है और तो दूसरी तरफ समानता, स्वतंत्रता और भ्रातृभाव के शासन की आह्वान करते है! शिक्षा और खासकर साइंस के महत्व पर ज़ोर देते है।

मेरे लिए इस किताब का दोबारा पढ़ना एक अच्छा अनुभव था। बहुत सी बाद में पढ़ी किताबें और वो भी जो पढ़ने से रह गई - उन सभी को संख्याब्रध करती है।ये कहानियों ऐंजेल की फिलोलोजी से ले कर वेद, धर्मशास्त्र, विदेशी पथिक से ले कर बाण, हर्ष और अबू फ़जल के लिखे से एतिहासिक प्रामणिकता लेती है! ये बीस कहानियाँ मानव चेतना, संवेदनशीलता, प्रेम और सोहर्द की उच्चतम पेशकश है!

गुड़िया खो गई

मेरा बचपन हैदराबाद के पास एक छोटे से क़सबे राजेन्द्रनगर के एक प्यारे से कैम्पस में बीता। जब मै पाँच साल की थी तब पापा को ६ महिने के लिए ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा, सो मेरा स्कूल जाना पोस्टपॉन हो गया। वैसे भी पापा ने मुझे पहली से ही पढ़ाने का तय कर रखा था।
वो ज़माना था जब अच्छे प्राइवेट स्कूल शहर मे होते थे। ज्यादातर लड़कियाँ पास के सरकारी स्कूल और लड़के शहर के प्राइवेट मे जाते थे। पापा ने मम्मी के मना करने के बावजूद १६ किमी दूर स्कूल ने दाख़िल करवाया। पड़ोस के एक खान अंकल की बेटी तय्यबा नर्सरी से उसी स्कूल में पढ़ती थी। हम एक ही क्लास मे थे तो मम्मी ने उसे समझा कर भेजा की गुड़िया का ध्यान रखना।
हम  बस से आराम से स्कूल पहुँच गए। वहा सभी क्लास के साथ एसेंम्बली शुरु हुई। इतनी भीड़ मैने पहली बार देखी थी। डरी सहमी मे तय्यबा का हाथ पकड़े खडी रही। ख़त्म होते ही बच्चो की भगदड़ में मेरा हाथ छूट गया। मै वही बैठ कर रोने लगी।
उधर जब काफी देर बाद तय्यबा को याद आया तो वो टीचर के पास गई और रोने लगी, 
"टीचर गुड़िया खो गई"!
टीचर ने भी सोचा वो किसी डॉल की बात कर रही है तो ये कह कर चुप करा देती की किसी को मिलेगी तो रख देगी। उसे समझ आ रहा था की टीचर को समझ नही आ रहा। फिर उसने अच्छे से समझाया!
"गुड़िया मेरे घर के पास रहती है और आज उसका पहला दिन है।"
फिर मेरी खोज शुरु हुई और मुझे ऐसेम्ब्ली में जहा छोड़ गई थी वही पाया गया। रो रो कर थक कर वही सो गई थी!