हम किसान है।
इसलिए बाबूजी ने पापा को एग्रीकल्चर पढ़ने की तरफ ढकेला। गुलावटी से बीएससी एग्री के बहुत किस्से सुनाते रहते है पापा। पहला ये कि वहा सब बच्चे नंगे पैर आँतों थे। दूसरा लड़कों की हॉस्टल, रसोइए का दूर से फेंक कर रोटी देना और लड़कों का कैच करना।
पापा मेरी तरह दादाजी की पहली संतान थे। पढाई की महत्ता बाबूजी समझ चुके थे। शायद बचपन से सपना देखा था की बेटे को देश के सबसे ऊँचे कृषि संस्थान में भेजेंगे।
पापा का पूसा इंस्टिट्यूट में दाख़िला हो गया। उस समय वहा सिर्फ साउथ इंडियन्स बच्चे थे ज्यादातर। और वाह री हमारी शिक्षा व्यवस्था। वहा तो पढाई भी अंग्रेज़ी में थी। पापा नार्थ इंडिया के गाँव के स्कूल से पढ़े पहले स्टूडेंट थे। ऊपर से इतने अमीर भी नही थे की हॉस्टल की फ़ीज दे पाते। तो दिल्ली कैंट में सिपाही लोगों के साथ उनके टेंट में कुछ रुपयों में रह लेते और पैदल पूसा जाते।
हमेशा से मेधावी रहे पापा, अंग्रेज़ी के चलते पहले सेमेस्टर में पास नही हो पाए। उन्होंने सोचा घर वापस जाना बहुत शर्म की बात है तो क्या किया जाए। ऐसे में इकलौते नोर्थ इंडियन प्रोफ़ेसर माहेश्वरी (वो भी विदेश से पढ़े) ने उन्हे बुलाया और ख़ुद घर पर एक्सट्रा क्लास ली।
मात्र उन्नीस की उम्र में अच्छे नम्बर से पास कर पापा को पहली जॉब दी स्वामी ब्रह्मानंद ने राठ में। उन्होंने १९६० पहला प्राइवेट कृषि पर कोर्स शुरु किया था और पापा को बतौर प्रोफ़ेसर आठ साल नौकरी का मौक़ा मिला।
बुंदेलखंड की बंजर भूमि को बौद्धिक संपदा में बदलने वाले महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, त्यागमूर्ति, शिक्षा के सागर, युगपुरुष, कर्मठ संत प्रवर स्वामी ब्रम्हानंद की १२३वीं जयंती आज राठ में बनाई जा रही है।
हमें गर्व है ऐसे महापुरुष पर जिन्होंने राठ, हमीरपुर के पिछड़े क्षेत्र में कई शिक्षण संस्थाएं खोलीं। उनके और भी अनेकों योगदान रहे है। १८३८ में सूखे पर उन्होंने १० दिन का अनशन किया जिसके बाद गांधी जी की मदद से किसानों को सरकारी रिलीफ़ मिला। वो किसानों की ज़रूरतें भली प्रकार समझते थे। उन्होंने दलितों और किसानों में दहेज, नशाबंदी, बाल विवाह के ख़िलाफ बड़े पैमाने पर काम किया। लडकियों के हॉस्टल और उनकी शिक्षा पर जोर दिया। वो खेतों की बीच अपनी छोटी सी झोपड़ी में रहते थे। मेरे जन्म पर मम्मी पापा मुझे ले कर उनके पास गए थे।
उन महानात्मा ने मुझे तब पता नही क्या आशीर्वाद दिया था पर आज उन्हे याद कर में जरूर तय करती हूँ कि किसान की जर्जर हालत की बेहतरी में अपनी बात हमेशा रखूँगी और जो कर पाऊँगी ज़रूर करूँगी।