गुरुवार, सितंबर 12, 2013

प्रकृति...

कल जब फेसबुक की एक मित्र प्रिया ने पूछा "क्या तुम्हारे पिताजी आयुर्वेद जानते हैं?" तो जैसे उसने मुझे मेरी जड़े याद दिला दी.
मेरे परदादा जाने-माने हाकिम थे। दादा वैसे तो एक पक्के आर्य-समाजी और समाज सुधारक थे पर सबसे ज्यादा एक प्राकृतिक प्रेमी. हमेशा फल, फूल और पौधों के बीच रहना पसंद करते.. और शायद इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा में उनका गहरा विश्वास था.
 
हमारे वेद-शास्त्रों ने इस बाह्य प्रकृति को पांच तत्वों से बना हुआ बताया है। ये पांच तत्व हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। हमें हमारे आसपास जो कुछ भी दिखता है, वह सभी कुछ इन्ही पांच तत्वों के मेल से बना हुआ है। हमारा शरीर भी प्रकृति के इन्ही पांच तत्वों से बना हुआ हैं
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मनुष्य के मूल स्वभाव को भी प्रकृति कहा गया है और बाहर सृष्टि में, तत्वों के संसार के नियमों को भी। वास्तव में बाहर की प्रकृति और आतंरिक संसार अलग नहीं है - बिलकुल जुड़ी हुयी है और बाहर जो भी असंतुलन पैदा होता है, उसकी शुरुआत हमारे अंदर से ही होती है। बिलकुल वैसे ही जैसे अन्दर जो भी असंतुलन हैं वो प्रकृति में भी नज़र आता हैं। अंग्रेजी में भी दोनों को "nature" ही कहा गया हैं.
मुझे बचपन से ही प्रकृति के साथ एक ख़ास लगाव था. बचपन सारा पहाड़, नदी, झरने, पेड़, जीव जन्तुयों के बीच गुजरा.. वही मेरी प्रकृति बन गयी. इंसानी ढाचों और संस्थाए बड़ी बनावटी लगती हैं. अजीब सी उलझन होती हैं अगर ज्यादा देर उनमे रहना पड़े तो..

अजीब बात हैं जहाँ इंसान आ गए वहाँ इर्षा, द्वेष, लालच, अहम्  और न जाने कितने और विकार आ जाते हैं. दूसरी तरफ प्रकृति हमे बहुत कुछ सिखाती हैं.. प्रथ्वी से स्थिरता, निस्वार्थता और नम्रता. जल से प्रेम, समानता और स्पष्टता. अग्नि से उत्कंठा, उत्साह और उर्जा. वायु से साहस, शक्ति और शीतलता. आकाश से उदारता, निष्कपटता और निर्मलता. हर पल प्रकृति हमें कुछ दे रही होती हैं.
प्राकृतिक इलाज भी शायद इन पांच तत्वों को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया हैं. मैं कोई चिकित्सक नहीं हूँ इसलिए मेरे कहे पर बिलकुल मत जाईये। पर जितना देखा हैं उतना बता देती हूँ।
मिटटी, खासकर मुल्तानी मिटटी बहुत की अच्छी मानी जाती हैं। जले पे, बाल धोने के लिए और पेट दर्द हो तो भी। शायद उससे शीतलता मिलती हैं।
जल के बारे में सिर्फ इतना बता सकती हूँ की आज मैं अगर ये लिख पा रही हूँ तो शायद मेरे दादाजी की जल-चिकित्सा की वजह से। १९ साल में जब मेरे साथ एक भयावर हादसा हुआ तो उसके बाद मुझे नर्वस ब्रेकडाउन के साथ सीधी तरफ काफी हद तक लाचार हो गया था। दादाजी २-३ महीने लगातार ठंडा-गर्म पानी का सेक करते रहे। इतना असर हो गया था की लगता था की मर्ज सीधी तरफ से दूसरी तरफ चला गया हैं। जल-नेति करते मैंने अक्सर अपने पिताजी को देखा हैं। उनकी माने तो स्वस्थ रहने के लिए एक आसन तरीका।
आग और धुआ भी बहुत असरदार होते हैं। अजवैन का धुआ से प्रसूता बड़ी जल्दी स्वस्थ हो जाती हैं।
वायु का अगर महत्व मैंने जाना तो प्राणायाम से।
खुले आकाश में तारे गिनते हुए सोना आपको स्रजनात्मक और जिज्ञासु बनता हैं।
ये तो मेरे खुद के छोटे-मोटे अनुभव हैं। पर मुझे खुद इस विषय पर थोडा और गहन अध्ययन करना हैं, खुद के लिए, औरों के लिए...
वातानुकूलित क्लासरूमों और घरो की बजाय उन्मुक्त विशाल आकाश के तले गहन वृक्षों की छांव में ज्यादा सुकून मिलता हैं। अपने बच्चों को हम जितना बाहरी प्रकृति के नजदीक रखेंगे उनकी खुद की प्रकृति उतनी कोमल और जिज्ञासु होगी। तभी हमारे बच्चे आनेवाले समय में सहज ही प्रकृति के प्रति एक सहानुभूति रख सकेंगे और इस धरती व प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण संभव हो सकेगा।

मंगलवार, सितंबर 10, 2013

बदबू...

तेरह साल की हो गयी थी पर दुनियादारी बिलकुल नहीं जानी थी. इतिहास को बीती कहानी की तरह पढ़ती थी. समाज में क्या हो रहा हैं उससे बिलकुल अनभिज्ञ.
पहली बार गाँव में ऐसा देखा था. सुबह सुबह घर के बाहर मट्ठा लेने वाले लाइन से बैठ जाते थे. बचपन में काम करने की बहुत लालसा थी. उस दिन सबको बाटने की मेरी बारी थी. मट्ठा छलके नहीं इसलिए घड़े को उनके बर्तन से टेक कर डाल रही थी. उन्ही में से किसी ने टोका.
"लली, ज़रा दूर से डालो. घड़ा गन्दा हो जायेगा"
मुझे कुछ समझ नहीं आया. कुछ बचा हुआ मट्ठा ले के जब घर में गयी तो किसी ने दादी से मेरी पहले ही शिकायत कर रक्खी थी.
"सारा सान लिया. जा फोड़ दे घेर में."
"पर इसमें अभी मट्ठा बाकी हैं"
मुझसे बेमन वो मट्ठे का घड़ा तुडवाया गया. नन्हे के दिल में कई सवाल थे. पर जवाब कोई नहीं.
हैदराबाद के किचन के सिल पे अलग रखे वो टूटे कप याद आते थे, जो कुछ ख़ास लोगों के लिए होते थे. अक्सर माँ से आँख चुरा के उनमे पानी पी लेंती थी.
"गंदे रहते हैं वो. नहाते नहीं हैं. गन्दी बदबू आती हैं उनके घर में"
"क्यों?"
"मीट खाते हैं"
मीट मुझे भी गन्दा लगता था, पर मैं अक्सर सहेलियों के टिफ़िन से चीज़े खा लेती थी अगर उसमे मीट न हो.
"क्या मीट खाने वाले सब गंदे होते हैं?"
"हाँ."
नहीं समझ पाती थी माँ की दलीलें!!
दसवी कक्षा में थी. शहर का बड़ा कान्वेंट स्कूल. पापा ने कभी बेटी होते हुए भी अंतर नहीं रखा. बाकि घरों में देखती बेटी सरकारी स्कूल में, और बेटे कान्वेंट में.
नए स्कूल का पहला दिन था. सुबह की असेंबली में सब लाइन में खड़े हुए थे. मैंने जैसे ही खड़ा होना चाहा, प्रीति जो मेरे साथ ही थी, नाक-मुहँ सिकोड़ने लगी.
"छी छी, तुम लोगों से बदबू आती हैं. तुम लाइन में नहीं खड़ीं हो सकती"
अजीब लगा. ऐसा तो कभी नहीं हुआ पहले. माँ ने तो हमेशा उल्टा बताया था. शायद उस कप से पानी पीते पीते मुझमे भी बदबू आने लगी थी.
आज प्रीति दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में डेंटिस्ट हैं. ना जाने कितनो की मुहं की बदबू दूर कर रही हैं...
क्यों हम बच्चों के नाजुक फूल जैसे दिल में ये दीवारे बना देते हैं. कब हम एक दुसरे की बदबू को स्वीकारेंगे और  कब ये हमारी बगिया महकेगी... आखिर भेदभाव की यह भावना लिए कब तक समाज इन्ही खोखले विचारो पर खड़ा रह पायेगा...!!

सोमवार, सितंबर 02, 2013

पहचान..



अभी कुछ दिन पहले सुनने को मिला, "मैं उसके पास वापिस नहीं जाऊंगा. पर उसके बेटे को अपना नाम जरुर दूंगा."
क्या अजब हैं दुनिया की रीत. पहचान बनाने के लिए न कोई मेहनत की जरुरत हैं और न अन्दर टटोलने की. बस जन्म ले लो किसी मर्द(?) के शुक्राणु से. मिल गयी पहचान! एक नाम का बाप और न जाने उसके कितने बेनामी बाप! इतने पीछे चले जाते हैं और इतने अहम् से जैसे डीएनए टेस्टिंग करवा रखी हो हर बच्चे की.
“कुछ बताना हैं, सुनोगी?”
“बताओ”
“पुरु मेरे पूर्वज थे, इसलिए वो सिकंदर से हार गए”
“आपके पूर्वज होने और हारने में क्या लेना देना? कोई भी हार सकता हैं, कोई भी जीत सकता हैं”
“हम सब परास्त होने वाले हैं! कृष्ण, लालू, मुलायम”
“कृष्ण लूज़र(loser)?”
“पहले कृष्ण ने अपनों को खो दिया. फिर एक धनुषधारी के तीर ने उन्हें भी एडी में मार दिया!”
“पर हम सब तो उनकी पूजा करते हैं न!”
“कृष्णा राधा के थे इसलिए उनकी पूजा की जाती हैं. महाभारत में तो वो परास्त हुए थे!”
“तो वो प्यार के लिए पूजे जाते हैं”
“हाँ, वो प्यार में भी राधा से हार गए!”
“कैसे?”
“अगर राधा और मीरा नहीं, तो क्या कृष्ण होते?”
“वो एक चालाक तिकड़मबाज़ थे जिन्होंने युद्ध में हर दुष्ट योजना और छल कपट का इस्तेमाल किया. में भी गोपी हूँ. गोपी सारे धूर्त होते हैं."
“पर पुरु हारा क्यों?”
पुरु के पास हाथी थे जबकि सिकंदर के पास धनुषधारी थे. बहुत तेज बारिश हो रही थी. हाथी तेज नहीं चल पा रहे थे. धनुषधारी दूर से ही तीर चलाये जा रहे थे..”
“पर इसका पुरु के हारने से क्या लेना देना. जो पुरु ने जाना उसने वो किया, जो सिकंदर ने जाना उसने वो किया...”
"सुनो, हमारे बेटे के कान जरुर छेदना. बिलकुल एक पक्के यादव की तरह इसे बड़ा करना.."
कितने बंधे हुए थे वो इस पहचान से. जैसे पहचान न हुयी तो हमसे इस ज़मीन पर खड़े होने का हक ही छीन लिया जायेगा. शायद इसलिए कभी हमारे बेटे को नहीं स्वीकार पाए.
उस बाप की पहचान ही क्या जिसने उसे न कभी देखने की चाह हुयी, न जोर के हग्गी देने की, न धीरे से हग्गी देने की. न जोर से किस्सी देने की और न धीरे से किस्सी देने की... बाप जो साल पहले खो गया हैं. रह गयी हैं हैं तो एक खीज, “कब आयेंगे वो?”. शायद इस खीज के आगे ही उसकी पहचान हैं.
पहचान बच्चे को अपने वजूद से मिलती हैं, न की सड़े-गले जातिवादी अतीत से, वो अतीत जो उसे अकेला छोड़ गया. वो माँ जो आगे बढ़ गयी सच के लिए. वो बाप जो आगे बढ़ गया झूठी इज्ज़त के लिए... हरामी वो नहीं, हरामी उसके माँ-बाप हैं जिन्होंने उससे उसका बचपन छीन लिया. वो माँ हैं जो बच्चे को ज़माने के लिए छोड़ देती हैं या वो बाप हैं जो उसको माँ के गर्भ में सिर्फ इस लिए मारना चाहता था क्योंकि उसका उसकी माँ से परदे में जो रिश्ता हैं जो नाजायज नहीं साबित हो सकता पर बच्चा हो गया तो सब स्वाहा. हरामी वो समाज हैं जो बाप-बेटे को इस लिए अलग रखता हैं क्योंकि वो सार्वजनिक शादी से नहीं हुआ हैं. मन से अगर कोई पति-पत्नी हैं, तो वो पापी हैं और बच्चा पाप!

अगर हमारे बेटे को पहचान चाहिए तो उसकी जिसने उसे भूल-भुलैया में अँधेरे से लड़ना सिखाया, या जिसने उसे जंगलो को अपना साथी बनाना सिखाना, या जिसने पंगोत की नयी-नयी बर्फ के अनजाने डर के आगे देखना सिखाया. वही उसकी सही पहचान हैं.

पहचान कोई भीख नहीं हैं जो मेरे बेटे को उसका लूज़र(loser) बाप देगा. वो बाप जिसने उससे उसका बचपन छीना. अपने स्वार्थ के लिए. समाज में सफ़ेद पोश बने रहने के लिए.
 
न ही पुरु की हिम्मत और न ही कृष्णा की रास-लीला! उसकी पहचान ये नहीं हैं.. वो अपनी पहचान खुद बनाएगा...