शनिवार, फ़रवरी 07, 2015

आस्था

आज सुबह एक कॉल आया, "जय गुरु देव, आपने जो ७ साल पहले दान दिया था, उस पैसे से जो मीटिंग हॉल बनना था पीतमपुरा में, वो तैयार हैं. आप इतवार को जरुर आये!"

मेरा जन्म एक आर्य समाजी परिवार में हुआ. बचपन से हवन और संध्या करती रही हूँ... मिशनरी स्कूल में पढ़ी इसलिए ईसाई धर्म को भी माना. आज भी धन्यवाद में क्रॉस "थैंक गॉड" हो जाता हैं. शादी के बाद हिन्दू देवी-देवताओं को जाना. खूब बेमन से सारे अंधविश्वासों को अपनाया. रिश्ते में परेशानी आई तो आर्ट ऑफ़ लिविंग किया. फिर रेकी. फिर ओशो. फिर इस्लाम. फिर बुद्ध-धर्म. जो किया पूरी तरह से. अच्छी तरह पढ़ कर, समझ कर, पूरी आस्था से, सारे अन्धविश्वासो सहित, बिना तर्क के... किसलिए?
शांति के लिए. ख़ुशी के लिए. मिली? शायद नहीं...


धर्म सहारा नहीं हैं... अगर सहारा हैं तो सिर्फ अपना. फिर क्यों भागी मैं किसी सहारे के लिए?

गुरुवार, जनवरी 08, 2015

इर्षा...

अंग्रेज़ी का एक शब्द है बड्डी(buddy)। बहुत परेशान किया है इस मुए शब्द ने मुझे। हिंदी में सबसे नजदीकी शब्द - यार!
बात ज़्यादा पुरानी नही है पर फ़ेसबुक नया नया था और उसके ऐप का बडा क्रेज़ होता है। एक ऐप आया अपना बेस्ट बड्डी जानिए। यानि जानिये कि कौन आप के बड़े फ़ैन है। हमने भी बडी मासूमियत से ऐप चलाया,  दो कॉलेज के जूनियर राजीव और आलोक का नंबर आगे आया। राजीव पास ही रहते थे सो मुलाक़ात भी थी पर आलोक विदेश में कहीं थे सो सिर्फ़ आभासी जान पहचान थी। ऐप के रिज़ल्ट को शेयर करते हुए हमने दोनो को धन्यवाद दी ख़ासकर राजीव को एक अच्छे बड्डी होने के लिए फ़ेसबुक के बाहर भी। (Thanks for being my best buddy both on and off fb)

बस पोस्ट होना थी की कही ज़ोरों की आग लग गई। संजय कॉल करते है और पूछते है ये ऑफ़ फ़ेसबुक क्या होता है। हम भी हमेशा से अपनी बागी तरीके से बोल गए, 
"जो लिखा है वही मतलब है"

"ज़रूरी था लिखना?"

"कुछ गलत भी नही लिखा"

“सोचो तुम्हे ये क्यों लिखना पड़ा?”
“भई हम इतना सोच कर नहीं लिखते!”
फिर शुरू वही बेतुकी बहस. तुम दुसरो से प्रसंशा चाहती हूँ. तुम्हारे लिए मेरे से ज्यादा सभी अहमियत रखते हैं. वो बास्टर्ड क्या तुम्हारे लिए मोहन मेकिंस में रुक गया वो ख़ास हो गया..
समझ आता था की ये इर्षा हैं. खालिश जलन. पर प्यार करती थी सो पूछा क्या करूं. अनफ्रेंड करो उसको, सो कर दिया. फेसबुक कम करो, सो कर दिया. लगभग दो साल बाहर रही. पर एक बार इर्षा का कीड़ा काट जाये तो वो जाता नहीं. ताउम्र. एक बार एक दोस्त बनारस जा रहा तो हमने पूछ लिया, हमें ले चलोगे? जनाब ने चैट देखा और फिर शुरू.. मुझसे कभी क्यों नहीं कहा कि तुम्हे बनारस जाना हैं. सुनील से कहना जरुरी था... हो गए शुरू और अगले चार महीने और बर्बाद. वही बहस, वही बे बात की नाराज़गी.
हद तो तब हुयी जब एक बार रंथामबोर में बहुत पीने के बाद, मुझको धक्का दे कर बोला,
“जाओ राजीव के साथ सो!”
उस रात में नहीं सोयी, मन किया छोटे से कबीर को ले कर तुरंत होटल छोड़ कर घर वापिस आ जाऊ. नहीं किया, सबसे बड़ी गलती की. उसकी सजा आज तक मिल रही हैं.
अब पूरे ढाई साल हो गए हैं छोड़े हुए पर ६ महीने भी शराब पी कर जब कॉल की तो सिर्फ एक ही रट.
“तुम उसके साथ सो रही हो.”
“वो तुम्हारा नया आशिक हैं तुम्हे बेवकूफ बना रहा हैं.”
“फलाना तुम्हारा यार तुम्हारे बारे में यह कहता फिर रहा हैं.”
“और हाँ अपने नये यार को कहना की आज भी मेरे लंड में उसकी दुन्नालियों से ज्यादा ताक़त हैं.”
वाह! ख़ुशी हुयी जानकार की हम आज भी उनकी प्रॉपर्टी हैं...
कहते हैं औरत में इर्षा ज्यादा होती हैं. पर मैंने इसका बिलकुल उलट पाया. यह एक इंसानी प्रवृति हैं, जो इंसानी रिश्तों को खोखला कर देती हैं. प्यार का दूसरा नाम विश्वास हैं, जहां विश्वास नहीं वहाँ प्यार कभी नहीं जम सकता हैं फिर चाहे आप कितने भी करीबी क्यों का हो.
हसद ओं जलन में खुद को जला लिया तुमने
दिल को स्याह कर के क्या पा लिया तुमने!