मंगलवार, जून 19, 2018

पापा ...

पूरी दंगल मूवी में रोती रही! अपने पापा की खूब याद आ रही थी। फ़िल्म को न ही मैं पेरेंटिंग के पैमानों से देखना चाहूँगी और न ही किसी फेमिनिजम के लेंस से। ये संघर्ष की कहानी है एक बाप की समाज से ही नही बल्कि खुद से लडाई की!
मैं परिवार और घर में पहली बेटी थी। पापा की पूसा की पढ़ाई का असर होगा शायद, उन्होंने मुझे कभी उन बेटियों की तरह नही देखा जैसे आसपास के लोग अपनी बेटियों को देखते थे। शायद दो-तीन साल की थी तब से रोज़ मेरे साथ बैठ कर पढ़ाते थे। मुझे याद है रोज़ ऑफ़िस जाने से पहले बहुत सारा लिखने का काम दे कर जाते थे। शाम नही करने पर डाँट पड़ती थी। मम्मी कहती छोटी है पर पापा को कोई दया नही आती थी। मैं बहुत ज्यादा शैतान थी, पाँच साल की थी तभी से पूरे कैम्पस के बच्चो की टोली बना कर पास के पहाड़ों में पिक्निक बनाने निकल पड़ती थी। शाम को पड़ोसी मम्मी पापा को शिकायत करते तो पापा बहुत डाँटते। मेरे जाने पर नही, बाकि बच्चो को बिना परमीशन ले जाने के लिए। फिर बहुत बार मैं अकेले चले जाती थी। हैदराबाद के जंगल खूब साँपों से भरे होते थे, अजगर भी दो बार देखने को मिल गया पर घूमने की पूरी आज़ादी !
हाँ स्कूल जाने लगे तो रोज़ सुबह पाँच बजे जगना, नहाना फिर टेपरिकार्डर में संध्या लगा कर संध्या करना, योगा करना फिर स्कूल के लिए तैयार हो कर सात बजे बस से स्कूल जाना। मेरी डिसीप्लीड लाइफ़ कॉलेज में जा कर बिगड़ी जहा औरों से अलग बन कर शायद मैं नही रहना चाहती थी। स्कूल भी अंग्रेज़ी मीडियम वो जहा सब अपने बेटों को पढ़ाते थे। लडकियों को कैम्पस तक में लोग हिंदी मीडिया या लोकल तेलुगू मीडियम में पढ़ाते। वीकेयंड में या ट्रेन के सफ़र में जहा फ़ुरसत होती तो किताबें, कहानियाँ, गणित को तिकडमी सवाल, रूबिक क्यूब, चायलिस चेकर.. तब तक खेलते जब तक मै पापा को नही हरा देती।
नागालैंड में किसी भी तरह का डर न हो उसके लिए रात में हमें उठा कर कहते दूर वाले बरगद के पेड़ को छू कर आओ। मैं तो फटाफट छू आती पर भाई डर के मम्मी के कारण बच जाते थे। छोटी सी थी तब से अडल्ट साइकिल चलवानी शुरु करवा दी थी। सातवी में प्लूरसी हूई तो जब तक बिमारी का पता नही चल गया न जाने कितने डॉक्टर देख डाले। फिर ढेड़ साल इलाज चला और छ: महिने इंजेक्शन। छोटी थी साइकल में बैठ कर नीचे पैर नही पहुँचते थे पर रोज़ स्कूल से आने के बाद पाँच किमी दूर ऊँचे नीचे रास्ते में साइकिल से खुद को इंजेक्शन दिलवाने जाती थी। इनाम में हमेशा की तरह मेरे फ़ेवरिट वेफर मिलते। पापा के ऑफ़िस की मीनी बस के ऊपर से कूदना, घर के चारों तरफ ज़मीन में खूब मेहनत से मक्का, सब्ज़ियाँ करना, पानी नही आने वाले दिनों में दूर श्रोत से पानी लाना... बचपन कठिन पर बहुत ही उत्साह भरा था। अपने परिवार या आसपास देखती तो खुद को बहुत प्रिविलेजड महसूस करती। पापा जितना कमाते उससे सभी छोटे भाई बहन के पढ़ने के पैसे भेजते। हमेशा कोई २-३ परिवार के हमारे साथ ही रह कर बड़े हुए है। हमारी मौसी और मामा भी।
बरेली आये तो मैं गणित में ठीक थी पर बायलॉजी लेना चाहती थी। पर पापा बोले हिंदी तुम ने वैसे ही कम पढ़ी है, केवी में दोनो मिल रहे है दोनो पढ़ लो। कोचिंग जैसा कभी करने का नही सोचा क्योकि घर के हालात मुझे पता थे। हमने तभी कच्चा घर बनाया था और बिना प्लासटर को घर में रह रहे थे। मम्मी अकसर घर के काम पर ज़ोर देती पर पापा पढाई पर। रुड़की और ऊपी के ऐंटरेंस बिना किसी विशेष तैयारी के निकल गए। उस साल कम उम्र की वजह से मेडिकल एंटरेंस नही दिया तो पापा ने कहा घर रह कर क्या मेडिकल की तैयारी करोगी, कॉलेज ज़ॉइन कर लो। कॉलेज जा कर फिर पीछे नही देखा। मेरे होने के बाद मम्मी ने बारहवी की थी। मेरे ग्रोज्यूएशन के साथ उनका बीए एमए हो गया!
दसवीं में थी तो पापा ने स्कूटर चलाना सिखा दिया। जितनी मूझे आज़ादी मिली उतनी शायद ही मेरे समय में किसी प्रिवीलेजड लडकी को भी मिलती थी। कॉलेज में गोल्ड मेडल मिलना मुझे आसान लगता है पर उसके पीछे की पापा की मेहनत नही देख पाती हूँ। आईआईटी दिल्ली में एमटेक के समय पापा चाहते थे की मै आईएएस की तैयारी करूँ पर मेरा मन नही था। इससे पहले एमबीए का भी मन नही था। खैर जो मन किया करती गई। जहाँ मन किया वो दिशा ले ली। हाँ रिश्तों में भी। पापा समझाते गए पर मै मन की करती गई। बहुत ठोकर खाई, पापा की पहली बार गाली भी रिश्तों को ले कर मिली। टूट गई तो खैर संभाला भी उन्होंने ही। पर पापा ने मुझसे कभी आस नही छोड़ी।
पापा अकसर कहते है कितना भी समझा लो करती है अपने मन की। पर वो मन के करने की पूरी आज़ादी भी साथ में देते है। पापा को मम्मी, घर समाज वाले अकसर कहते की आप सर पर चढ़ाते हो पर पापा के कभी कोई परवाह नही की। मुझे पीछे मुड़ कर देखू तो लगता है क्या एक ऐसे समाज में जहा लड़कियाँ आज भी स्ट्रगल कर रही है और जो है उसे नियति मानती है वहा सबसे महँगे और अच्छे स्कूल में लड़की को पढ़ाना, उस प्रोफ़ेशनल लेवल तक पहुँचना जहा मैं पहुँच गई थी, दोबारा नए सारे से ज़िंदगी शुरु करना, कितनी लड़कियाँ कर पाती है।
जल्द में मैं दिल्ली से कोई नाटक देख कर मम्मी पापा के पास पहुँची तो शोर्टस पहने थे। मेरा छोटा भाई भी वही था। वो बोला, "दीदी आप ये पहन कर घूम रही थी!" पापा मुझे हग करते हुए बोले, "देखो तो कैसे इस ऊम्र में भी कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है। इसे तो हमेशा अपनी ज़िंदगी जीने की आज़ादी रही है। कपड़े हम तय करने वाले कौन होते है!"
मेरा हर उस पापा को सलाम जो समाज की फ़िक्र करे बग़ैर लडकियों के लिए वो करते है जो मिसाल बन जाता है। हम पापा की बिगड़ी हुई बेटियाँ जो पापा के ख़िलाफ भी खड़ी हो जाती है!

टूटती रूढ़िवादिता...

हर नकारात्मक समझे जाने वाले शब्द को ध्वस्त होते देखा है। 
दसवीं में थी तो एक कविता लिखी थी नारी पर, पूरी याद नही पर अबला, त्याग की देवी, अनुरागी, पैर की जूती, जौहर, बेसहारा शब्दों को जोड़ कर कुछ ज़बरदस्त बना था..
तुझको जौहर सिखला कर
इतना कायर बना दिया
नर तूने इसका क्या किया भला
अपने पैरों की जूती बना...
ये शायद इसलिए क्योंकि मुझे बचपन से ये अहसास था की लड़की हूँ पर हर तरह से बराबर हूँ। गणित लड़कों का तो वो मेरा फ़ेवरिट, क्रिकेट लड़कों का तो लड़कों के साथ लेदर बॉल से खेल कर बच्चों की नाक तोड़ना, छह साल में बच्चों की टोली बना कर जंगल पहाड़ों में घूमना, पेड़ों पर घर बनाना और घंटों उछल कूद करना। स्कूल में कबड्डी हो रेस हो क्लास से बाहर खिड़की से कूदना या कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में कर्फ़्यू टाइम के बाद गेट फाँदना सब किया है और बहुत जोश में!
नारीवाद शब्द किसी को तब शायद नही पता था। शरीर के दुबली पतली थी पर इरादों से मज़बूत थी सच्चाई के लिए लड़ना भिड़ना पीटना कूटना सब किया है।
फिर कुछ ऐसे क़िस्से हुए की मैं अंदर से टूट गई। बहुत ही नाज़ुक और भावुक हो गई। इतनी की ये वाक्य लिखने तक में आज भी मेरी आँख छलक जाती है। खैर कुछ बड़ों का साथ और शिक्षा की चाभी जो बचपन में पापा ने दी थी उसने बचाए रखा। पढ़ी, गोल्ड मेडलिस्ट हुई, क्लास वन अफ़सर बनी, बड़ी टेलिकॉम कंपनी में ज़िम्मेदार ओहदे पर रही.. बहुत सम्मान और धन-सम्पति मिली - सब बहुत आसान था।
पर भावुकता ने मारा, रिश्ते नही तय कर पाई। जिसने प्रपोज़ किया उससे प्यार नही किया, जिससे प्यार किया उससे शादी नही हुई और जिससे शादी हुई उससे निभी नही, जिससे निभी उसकी शादी हो चुकी थी... सब बहुत उलझ गया। निकलना आसान नही था बिना पूरी तरह टूटे। टूटी फूटी और बिखर गई। पर ख़त्म नही हुई क्योंकि कही वो बचपन का जोश वो उमंग ज़िंदा था। मैं भी जी गई। लिखने लगी, पेंट करने लगी, फ़ोटो खींचने लगी, गाड़ी दौड़ाने लगी, नाचने लगी... फिर सब मुझे छद्म नारीवादियों कहने लगे, लोध फेमिनाजी, लेडी केसानोवा और वो सब जो मैंने सर आँखों पर रखा। 
फिर टिस आया। जवानों के साथ पढ़ कर एक और जवानी जी ली। शोध करते करते बेहतर जाना खुद को, अपने समाज को, और प्यार हो गया मुझे अपने समाज से और उसके वो इतिहास से जो जानते सब है पर बहुत कम लोग क़बूल करते है। उस आत्म सम्मान के सामने ख़ानाबदोश, घुमंतू, ठग, असुर, जरामय जैसे शब्द ठिगने पड़ गए। समाज में महिलाओं की वो पारंपरिक संस्कृति जानी जिसे जान पर ख़ुद को मॉडर्न समझने वाली नारीवादी शर्मा जाए। 
और अब मैं जल्द ही नारी सतत कार्य में स्नातकोत्तर करने वाली हूँ। बाकि मुझमें जो भी बचा है वो संघर्षरत बच्चियों और महिलाओं के नाम...!
अब हर नकारात्मक शब्द में मुझे सोने की परत देखने का हुनर आ गया है। पारस बनना चाहती हूँ, ताकि जिसे छू वो बदल जाए। मेरे लिए बदलना धन समाप्ति और एशवर्य नही बल्कि वो हिम्मत और मज़बूती का होना है जिसमें ख़ुद को बदलने की ताकत है!