जिस रिश्ते में कोई परदा न हो उसमें हम बेशर्म होने से क्यों बचते है? क्या डर है जो हमें बहने से रोकता है?
प्रेम भी अजीब शय है! हम जिससे प्रेम करते है उसे हम अपनी कमियाँ गिनाते नही थकते। जो भी ग़लतियाँ हुई है वो क़ुबूल करने में बिलकुल नही हिचकिचाते। पता होता है ये सब सुन डाँट पड़ेगी पर जैसे हम इंतज़ार करते है उस ग़ुस्से का जो प्यार से भी प्यारा होता है!
पर जैसे ही नज़दीकी दिल से शरीर के तरफ़ बढ़ने लगती है एक अजीब सी सिहरन हमें जकड़ लेती है। हम बहना चाहते है पर बह नही पाते। शर्म हया डर बहुत कुछ को पार कर ही दो शरीर एक हो पाते है। वो कौन लोग है जो कहते है दिल एक होना मुश्किल है और शरीर आसान। दिल की आत्मीयता रिश्ते को ख़ूबसूरत बनाती है।
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