कबाली का रिव्यू लिखने की कोशिश कर रही हूँ। शोषण, समाज और समाजिक परिवर्तन को ले कर अब तक की मेरी समझ पर आधारित। विचार विमर्श के लिए तैयार हूँ!
मै पहले साइंस की, फिर शोशलोजी की स्टूडेंट हूँ। शायद ये ही नज़रिये में फ़र्क़ लाता है। किसी भी शोशल कंडीशन, इवेंट्स या फिनॉमेनॉ को समझने के दो तरीक़े है। पहला रैशनल तरीक़े से समझा जाए फिर उस पर भावनात्मक समीक्षा हो। दूसरा पहले भावनात्मक तरीक़े से प्रभावित हो कर रैशनल समीक्षा पेश की जाए। मै पहले को ज्यादा सही मानती हूँ क्योकि आप समता भाव से पहले समझते हो, एसेसमेंट करते है फिर अपनी भावनाओं को भी एक टूल की तरह इस्तेमाल करते हुए उस कंडीशन, इवेंट या फिनॉमेनॉ को पेश करते हो।
पहले कबाली का कॉनटेक्स्ट समझना ज़रूरी है। फ़िल्म मलेशिया मे प्रवासी भारतीयों की गाथा है। वो जो कॉलोनियों में स्लेव (indentured labor) की तरह भेजे जाते थे। कहा जाता की लगभग ५ मिलियन लोग (भारत के उस समय के लगभग ५% लोग) भारत के बाहर अफ़्रीका, साउथ ईस्ट ब्रिटिश कॉलोनी मे भेजे गए। शायद ही उससे पहले या बाद इस हद की ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग हुई हो। वहाँ टी, रबर, टिंबर ऐस्टेट में खूब ज़बरदस्त शोषण होता था। चीनी लेबर भी इसी प्रकार मलेशिया पहुँची थी।
अब हम मार्क्स बाबा की कंफ्लीक्ट थ्योरी से दमन को समझे तो समाज में मालिक नौकर का पावर स्ट्रगल निहित है। ऐसी समाजिक स्थिति और इससे उबरने का तरीक़ा मैक्जिम गार्की की "मदर" में देखी जा सकती है। ऐसी रेवोल्यूशनरी एप्रोच बहुत हद तक समाजिक बदलाव लाई भी है। फ़्रेंच, रशियन रेव्यूलैशन... और हमारा खुद का स्वतंत्रता संग्राम! इतिहास गवाह है की बिना ख़ून ख़राबे के कोई भी शोषित समाज तो आज़ादी नही मिली है।
तो क्या दलितों के साथ आज तक हो रहे शोषण से निजात पाने का भी ये ही रास्ता है? क्या शोषित वर्ग का एजीटेशन अपने हक़ से ज्यादा पावर अपने हाथ में लेने की जंग है? क्या दलितों को शोषण के ख़िलाफ़ हथियार उठा लेने चाहिए!
समाजिक चेतना को बढ़ाने का क्या कोई अहिंसात्मक तरीक़ा नही हो सकता। समाजिक कुरीतियों को मिटाने के लिए रेव्यूलैशन के अलावा दो और तरीक़े है हमें उन्हें भी समझना ज़रूरी है। पहला तरीक़ा सिस्टम्स के साथ काम करना, सरकार के साथ ऐसे कानून और प्रोग्राम शुरु करना जिससे शोषण का अंत हो। ये तरीक़ा बाबा साहेब का था। दूसरा तरीक़ा ये की हम चीज़ों को बदलते परिवेश मे ढाले तो शोषण को नई तरह से प्रतिभाषित करे ताकि वो कारगर नही रहे।
ये शायद हमारी ग़लतफ़हमी है की समाजिक बदलाव पावर हाथ मे आने से आता है। समाजिक बदलाव किसी भी आंदोलन के प्रति लगाव और सच्ची निष्ठा से ही पाया जा सकता है। उलटा पावर से हिटलर पैदा होते है। इतिहास उदाहरणों से भरा पड़ा है।
ख़ैर कबाली जैसे मूवी जहा सामूहिक अनुरोध पैदा करती है और लोगों को अपने हक़ के प्रति जागरुक बनाती है वही अत्याधिक ख़ून ख़राबा हमारी पशु प्रवृति को उकसाने का भी काम करती है। रजनी का लार्जर देन लाइफ़ पोटरेयल इंसान को अपने बराबर न खड़ा कर ऐसे पावरफुल पॉजिशन में बैठा देता है जहा धर्म अंधत्ता का आना स्वभाविक है। जब अत्याचार को राबिनहुड के काम की तरह जस्टिफाई किया जाता है तो अक्सर हम बस मुद्दों को फ़िक्स कर रहे होते है, उनके निवारण की सोच भी नही रहे होते है।
मूवी जरूर देखिए! क्योकि ये विद्रोह की आवाज़ है। जिसे हम सबको सुननी ज़रूरी है ताकि हमारी सोई हुई चेतना जाग सके!
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