पार्चड यानि प्यासा! वैसे प्यास सिर्फ एक ही है वो है ज़िंदगी जीने की। हर इंसान जो पैदा होता है वो जीना चाहता है, एक दिन का बच्चा भी।
भूख/प्यास सिर्फ दो ही अहम् है, खाने की और प्यार की। खाने की भूख तो हमें हमेशा रहती है और हमारे शरीर और आत्मा दोनो को तृप्त करती है पर प्यार में इसमें एक और भूख जुड़ जाती है, शरीर की जो इंसानों में सिर्फ प्रोक्रियेशन से ज्यादा है। पूरा ब्रह्माण्ड इसी भूख की देन है। पर हम इंसानों ने इसे बहुत ही विकृत बना दिया है।
पार्चड इसी भूख/ प्यास के कई पहलू एक साथ दिखाती है।
पहला भाव फ़ोर्स्ड एबस्टिनैंस! विधवा या अकेली औरत को किसी भी पुरुष के प्रति कोई भाव नही होने चाहिए। फिर चाहे उसे पति से भी कोई प्यार न मिला हो। उसका प्यार सिर्फ बच्चों और बूढो के लिए है। यह भाव रानी का जो कम उम्र में विधवा हो जाती है। बेटे को बड़ा करने में ख़ुशी ख़ुशी अपनी ज़िंदगी काट लेती है।उसके लिए उसकी सहेलियाँ और एक मिस्ड कॉल ही जीने का सहारा बन जाता है।
दूसरी लज्जो जो गाँव की नाचने वाली है। ये वो भाव है जो न जाने कितनों की अधूरी प्यास पूरी करती है। इसमें औरत अपनी आत्मा तो मार कर सिर्फ साक़ी का काम करती है! लोग पीते जाते है और वो ख़ाली होती जाती है! आत्मा के प्यार को तरसती मीन जो सबको पानी दे कर भी प्यासी रह जाती है!
तीसरी वो प्यार जो ममत्व से जुड़ा है। ये हर जीवित प्राणी के प्रोक्रियेशन की भाव है। माँ बनने की चाह। पर कहते है जब प्यार न हो तो अंकुर भी नही फूटते और जब दो टूट कर प्यार करने वाले हो तो महात्मा का जन्म होता है! पर इस प्यार की चाह औरत को बिना बाँझपन के लांछन के नही मिलता, फिर चाहे दोष कही भी हो!
चौथा वो मासूम भाव है जिसमें प्यार सर्वोपरी है। जानकी की ऐसे मासूम और सच्चे प्यार की कहानी है जो हर किसी के हिस्से में होता है पर या तो हमारी खुद की कमज़ोरी या समाजिक मान्यताओं की वजह से हमें नही मिल पाता।
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