ऐ सुनो
आज फिर तुम्हारी हुड़क लगी है।
सुन रही हूँ कबीर के कुछ गीत तो
फिर दबोच लेना मेरा हाथ किसी तान पर
खोई हूँ कही अपने भीतर तो
फिर पीछे से आ कर भर लेना अपनी बाँहों में
करके बैठी हूँ बंद आँखें ऋषिकेश में गंगा तीरे
फिर बैठ जाना चुपचाप मेरे पास आके
जी रही हूँ पंगोट की पहली बर्फ़ के फायों में
फिर मेरे चेहरे को अपने पोरों की छू लेना
तेरे आने के कोताहुल में औंधी पड़ी हूँ
फिर वैसे ही मुझे पलटा कर होंठों को चूम लेना
आज तेरे जाने के फ़िक्र में मेरा पागलपन
फिर हमेशा सा तेरा रूठ कर विदा होना...
इस हुड़क में वो सब लम्हे जी लेती हूँ
फिर एक बार तमाम होने के लिए...
हुड़क - किसी चीज़ की तीव्र इच्छा, हुड़कने अथवा तड़पने की क्रिया या भाव, शौक़, धुत, ठरक
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