चचेरी बहन थी वो मेरी. अरुणा. मासूम. प्यारी से.
शायद १७ की हुयी थी बस. बारहवी की थी बस.
१९८२ में जब ASIAD चल रहे थे तब चाची आखरी सासें गिन रही थी मेरठ में. पापा के साथ एक हफ्ते के लिए चाचा की मदद करने गए थे. कुछ लाइलाज बीमारी थी उन्हें.
चाची हॉस्पिटल में एडमिट थी. पहली मुलाक़ात अभी भी याद हैं. बहुत खुश थी वो अपनी कमजोरी के होते हुए भी... मुझसे अपने बाल बनवाए. मैं सिर्फ ११ की थी. बातें करने लगी. बिलकुल वैसे बातें जो मुझे पसंद थी.
"कितनी अनोखी बात हैं. तुम तीन भाई-बहन और मेरे पहले तीन का जन्म महिना एक हैं. तुम्हारा-नरेश का, अरुणा-सत्येन्द्र का.... सब जोड़े में हैं."
मुझे अपनी बातों में मन्त्र-मुग्ध कर दिया था उन्होंने. कुछ बैग से निकलते हुए बोली.
"ज्योति के लिए ये स्वेटर बनाया हैं. बोर होती रहती थी. हाँ बटन नहीं लाये तुम्हारे चाचा. बटन खरीद के लगवा लेना. तुम्हे तो सिलाई-बुनाई बहुत अच्छी आती हैं न. जल्द ही सर्दी हो जाएगी"
मैं भी बच्ची थी. स्वेटर तो दे दिया पर बटन नहीं लगाये. आज भी अफ़सोस हैं उसका.
चाची चली गयी. सब कहते हैं उन्हें अपने दुखों से मुक्ति मिल गयी. पीछे छोड़ गयी अरुणा जो 6 की थी. एक बड़ा भाई और दो छोटी बहनें.
उस गर्मी छोटे चाचा के घर अरुणा की ड्यूटी लगी थी. बारहवी की छुट्टिया थी न. खाना बनाती थी वो. पर उस दिन किचन में कुछ ऐसा हुआ की उसकी दुनिया ही बदल गयी. मुझे सिर्फ तब इतना पता चला था की अरुणा ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी. और अलीगढ में मौत से लड़ रही हैं।
तीन महीने बाद मैं उससे मिली. उसे अपने घर ले जाने आये थे. छोटा सा स्टेशन था. ट्रेन लेट थी. हम दोनों घंटे बातें करते रहे. उसने मुझे सब बताया. बहुत गुस्सा थी मैं सबसे. पर तसल्ली हुयी की मैं उसको समझा पाई की सिर्फ छूने से बलात्कार नहीं होता. कितनी नादान थी मेरी बहन. घर वालों से क्या बात करती. सबके मुह पर सिर्फ एक शब्द था. मर्यादा.
वो १७ की थी. उसकी शादी एक अधेड़ उम्र के साथ तय हो गयी. मैं और बुआ मना करते रहे. पर किसी ने नहीं मानी. सबके मुंह पर सिर्फ एक शब्द था. मर्यादा.
हमारे घर से उसकी शादी हुयी. मेरे शादी के लहंगे में बहुत ही खुबसूरत लग रही थी अरुणा.
पति बहुत अच्छा मिला. बहुत प्यार मिला उसे. अगले साल उसने एक बहुत प्यारी बेटी को जन्म दिया.
पर फिर उसकी तबियत खराब रहने लगी थी. आत्महत्या के अन्दुरुनी घांव बढ़ने लगे थे. एक दिन वो अचानक चली गयी. अपनी विरासत छोड़ कर.
आज अरुणा शिवानी में जिंदा हैं. पर मर्यादा. और ना जाने कितने मासूमों की ज़िन्दगी तबाह करेगी.
शायद १७ की हुयी थी बस. बारहवी की थी बस.
१९८२ में जब ASIAD चल रहे थे तब चाची आखरी सासें गिन रही थी मेरठ में. पापा के साथ एक हफ्ते के लिए चाचा की मदद करने गए थे. कुछ लाइलाज बीमारी थी उन्हें.
चाची हॉस्पिटल में एडमिट थी. पहली मुलाक़ात अभी भी याद हैं. बहुत खुश थी वो अपनी कमजोरी के होते हुए भी... मुझसे अपने बाल बनवाए. मैं सिर्फ ११ की थी. बातें करने लगी. बिलकुल वैसे बातें जो मुझे पसंद थी.
"कितनी अनोखी बात हैं. तुम तीन भाई-बहन और मेरे पहले तीन का जन्म महिना एक हैं. तुम्हारा-नरेश का, अरुणा-सत्येन्द्र का.... सब जोड़े में हैं."
मुझे अपनी बातों में मन्त्र-मुग्ध कर दिया था उन्होंने. कुछ बैग से निकलते हुए बोली.
"ज्योति के लिए ये स्वेटर बनाया हैं. बोर होती रहती थी. हाँ बटन नहीं लाये तुम्हारे चाचा. बटन खरीद के लगवा लेना. तुम्हे तो सिलाई-बुनाई बहुत अच्छी आती हैं न. जल्द ही सर्दी हो जाएगी"
मैं भी बच्ची थी. स्वेटर तो दे दिया पर बटन नहीं लगाये. आज भी अफ़सोस हैं उसका.
चाची चली गयी. सब कहते हैं उन्हें अपने दुखों से मुक्ति मिल गयी. पीछे छोड़ गयी अरुणा जो 6 की थी. एक बड़ा भाई और दो छोटी बहनें.
उस गर्मी छोटे चाचा के घर अरुणा की ड्यूटी लगी थी. बारहवी की छुट्टिया थी न. खाना बनाती थी वो. पर उस दिन किचन में कुछ ऐसा हुआ की उसकी दुनिया ही बदल गयी. मुझे सिर्फ तब इतना पता चला था की अरुणा ने आत्महत्या करने की कोशिश की थी. और अलीगढ में मौत से लड़ रही हैं।
तीन महीने बाद मैं उससे मिली. उसे अपने घर ले जाने आये थे. छोटा सा स्टेशन था. ट्रेन लेट थी. हम दोनों घंटे बातें करते रहे. उसने मुझे सब बताया. बहुत गुस्सा थी मैं सबसे. पर तसल्ली हुयी की मैं उसको समझा पाई की सिर्फ छूने से बलात्कार नहीं होता. कितनी नादान थी मेरी बहन. घर वालों से क्या बात करती. सबके मुह पर सिर्फ एक शब्द था. मर्यादा.
वो १७ की थी. उसकी शादी एक अधेड़ उम्र के साथ तय हो गयी. मैं और बुआ मना करते रहे. पर किसी ने नहीं मानी. सबके मुंह पर सिर्फ एक शब्द था. मर्यादा.
हमारे घर से उसकी शादी हुयी. मेरे शादी के लहंगे में बहुत ही खुबसूरत लग रही थी अरुणा.
पति बहुत अच्छा मिला. बहुत प्यार मिला उसे. अगले साल उसने एक बहुत प्यारी बेटी को जन्म दिया.
पर फिर उसकी तबियत खराब रहने लगी थी. आत्महत्या के अन्दुरुनी घांव बढ़ने लगे थे. एक दिन वो अचानक चली गयी. अपनी विरासत छोड़ कर.
आज अरुणा शिवानी में जिंदा हैं. पर मर्यादा. और ना जाने कितने मासूमों की ज़िन्दगी तबाह करेगी.

2 टिप्पणियां:
Maryada is one of the most abused word in the male chavunistic society. You brought out the tension in the air into the writing.
दोष मर्यादा की नहीं दोष है की हम गलत चीज का प्रतिरोध नहीं कर पते. और जब इसके खिलाफ आवाज़ उठाते हैं तो यह घटना हो जाती है.
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