हम अक्सर गूंगे बहरे हो जाते हैं जब किसी और को तकलीफ में देखते हैं।
मैं जबलपुर से इलाहाबाद जा रही थी।
मैं जबलपुर से इलाहाबाद जा रही थी।
यह बात २० साल पहले की है, मेरा पहला बॉयफ़्रेंड और उसके कुछ दोस्त मुझे रेलवे स्टेशन छोड़ने आए थे। ट्रेन चल दी पर उसका हाथ नहीं छोड़ पा रही थी। चंद दिन पहले ही पहले प्यार का अहसास हुआ था।
रात की ट्रेन थी। जबलपुर से इलाहाबाद तक की। फिर वहाँ से लखनऊ जाना था।
ऊपर की बर्थ थी। मेरी पसंदीदा। ऊपर जा कर लेट गई। ट्रेन खचाखच भरी थी। मेरे कूपे में कोई महिला नहीं थी।
रात मे अचानक नींद खुली तो पाया एक आदमी मेरे बग़ल में सोने का नाटक कर रहा है, अपना हाथ मेरे ऊपर रख कर!
मैं उठी और उसको ज़ोर से धक्का मार कर नीचे ढकेल दिया। वो चेन को पकड़ कर लटक गया।
मैं ग़ुस्से से चिल्लाने लगी।
"कैसे हिम्मत हुई तुम्हारी मेरे पास लेटने की"
"जगह नहीं थी इसलिए लेटा था"
पूरी बोगी जाग गई। भीड़ हो गई पर कोई कुछ नहीं बोला। पहली बार पता चला की मैं एक गुँगे बहरे समाज का हिस्सा हूँ जो अन्याय को देख कर अंधा भी हो जाता है। क्या आपके साथ हुए हर हादसे के लिए आप ख़ुद ज़िम्मेदार है?
तीन साल पहले जाना की इस समाज का इलाज हमारी चुप्पी में नही है! हमारी व्यक्तिगत कहानियाँ ही समाज को आईना दिखायेगी। उनकी बिलकुल फ़िक्र मत करो जो कहे "हम तो ऐसे नही है!", "सब पुरुष ऐसे नही होते!", "तुम पूरे समाज के लिए ऐसे कैसे कह सकती हो!"
उनके लिए मेरा एक जवाब है, जिस दिन सब लड़कियाँ अपनी कहानी कहने लगेगी उस दिन मै चुप हो जाऊँगी!! तब तक इस समाज का चिल्ला-चिल्ला कर कान सच में बहरे करने की ज़रूरत है।
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