रस्म पूरी होते ही मैं कमरे से बाहर ऐसे निकली जैसे किसी बंद पंछी को एक दरवाज़ा मिल गया हो. तुरंत ऊपर वाले कमरे में भागी. कमरे में कोई बिस्तर नहीं था, पर नींद कहाँ आनी थी.
वो चाहते थे की हर किताब जो मैं पढ़ रही हूँ, उसपे अपनी समीक्षा लिखूं. "The SandGlass" लगभग ख़त्म होने वाली हैं. एक पतली सी किताब को रवि ने मुझे ये कह कर दी थी की हैदराबाद से पुणे के सफ़र में ख़त्म हो जाएगी... कहानी ऐसी की सोचा, किताब ख़त्म होते ही उन्हें तहे दिल से धन्यवाद् कहूँगी.
हैदराबाद के तीन दिन बड़ी जल्दी फुर्र हो गए.. प्रिया के साथ ने मेरी आत्मा और मन को तृप्त कर दिया था. प्रिया मेरी सहेली. सबसे प्यारी, सबसे न्यारी..
लगा सदियों बाद आज़ाद हुयी हूँ.. बहुतों ने मुझे मेरी बंदिशों से आज़ादी के सपने दिखाए, पर शायद अपने शिकंजे में कस के.. मुझे ऐसी आज़ादी और कहाँ मिलती. ज़िन्दगी का पूर्ण अहसास अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ.
अगले दिन सुबह रवि मेरे लिए कुछ अच्छी किताबो को ढूँढने में लग गए. "The Legends of Kasaks" ढूँढ रहे थे. बड़ा अनूठा तरीका था उनका अपने जीवन के अनछुए भाग को परोसने का, पूरी शाम हम सिर्फ एक शब्द "आज़ादी", "स्वतंत्रता", "Freedom" को पलट-पलट के सेक रहे थे... मैं शायद अपने ही ख्यालों में थी की उन्होंने मेरी तरफ एक पत्ता फेक दिया, "क्या तुम सच में आज़ाद हो?" मैं मुस्कुरा दी...
वो आगे बात करते रहे, जैसे मेरी मुस्कराहट में उनको जवाब मिल गया हो..
"आज़ादी - विशवास में और त्याग में हैं.."
विश्वास क्या हैं हम घंटों डिबेट करते रहे..
"विश्वास गरीब के लिए रोटी और पापी के लिए धर्म हैं! पैरों को कदम पर और शरीर को दीमाग पर विश्वास होता हैं. विश्वास पितृत्व की तरह हैं जिसको सिर्फ जिसने जीया हैं वो जान सकता हैं, जैसे की माँ!"
मैं उनका दर्द समझ रही थी, वो उस आस्तीन के नीचे के घाव की तरह, जैसे मेरी नज़र पड़ती तुरंत छिपा देते.
प्रिया मेरी प्रिय, मेरी चिकर-चिकर करने वाली दोस्त, जिसके प्यार करने का तरीका ही अनोखा हैं. मुझे हद का परेशान कर देती थी. कहती थी लगता हैं हमें एक दुसरे का स्पर्श अच्छा लगता हैं. शायद हमारे पार्टनर में जो कमी हैं वो पूरी होती हैं. मुझे इधर उधर चुटी काटती रहती, जबतक मैं उससे इतने जोर के काटती की वो कुछ देर तक अलग रहती. सिर्फ कुछ ही देर के लिए :)
जब हम हॉस्टल से बिछड़े तो वो कई दिनों तक सो नहीं पायी थी...
हॉस्टल के दिन भी कितने प्यारे थे. जब सबको क्रिकेट देखना होता तो हमे "Godfather" देखना होता. और वो अपनी बदमाशियों से सबको टीवी रूम से बाहर निकलने में सफल होती. रह जाते सिर्फ हम दोनों.
वो मुझे एअरपोर्ट से रात के एक बजे अपने पति के साथ आई थी. हमारा मिलना, गले मिलना और चुम्बन देख कर उनको कुछ आराम तो मिला होगा. वो एक हाथ से शिवी को पकडे थे और दुसरे से हमारा भारी बैग. प्रिया बहुत कमज़ोर और पिली लग रही थी. मैं उसका दर्द समझ रही थी... कुछ दिन पहले रवि ने ही मुझे उसके लिए खोज निकाला था.
उसके ज़िन्दगी में मैं १५ साल बाद आई थी. फिर भी इतना समझ आ गया था की वो क्यों पथ-भ्रस्त हैं. वो धरातल में रहती थी और वो अपने सपनो की दुनिया में. वो अपने मूल्यों में रहते थे और वो अपने संसारिकता में रहती थी. प्रिया उतनी ही स्वार्थी थी जितना की उनका निस्वार्थ भाव !
वो काफी भूखे थे जब वो हमे शाम की फ्लाइट के लिए छोड़ने आये. प्रिया फटाफट उनके लिए दोसे बना रही थी. सुबह का बासी खाना के एवज में कुछ अच्छा तो बनता हैं. रात इतने देर से सोये थे, की सुबह समय से उठे ही नहीं. रवि को रात का खाना दे कर ही भेज दिया. मैं उनके सामने बैठी शिवी के बाल कर रही थी. और वो अपने हमेशा की तरह दरियादिल व्यव्हार में हम चारों को अपने हाथ से डोसा खिला रहे थे. मुझे नन्ही मिन्नी वो मेरे बगल में बैठी थी, से भी कौर मिल रहे थे. मेरी तो चांदी ही चांदी थी...
वो चाहते थे की मैं रोमेश गुनासेकारा की "The Sandglass" की समीक्षा लिखूं. पर में तो एक अपनी ही कहानी लिख गयी...
अकेले होते ही मैंने उनको कॉल किया. झूठ बोला था की मैंने कोशिश की. मेरी दो मिनट की रसम पूरी हो गयी थी. और वो नीचे चले गए थे. वैसे भी उस छोटे पलंग में नहीं सो सकती थी, इस रस्म के अलवा और कुछ हमारे बीच था भी तो नहीं. मुझे मेरा हिस्से का मिल गया था.
सोचती हूँ क्या मजबूरी होती हैं की हम उन रस्मों को जीते चले जाते हैं जिसमे हमारी आत्मा मरती चली जाती हैं... क्यों नहीं आज़ाद हो पाते हम इन रस्मों के चंगुल से? प्रिया आज इन रस्मों से आज़ाद हैं, मुझे कब आजादी मिलेगी?
वो चाहते थे की हर किताब जो मैं पढ़ रही हूँ, उसपे अपनी समीक्षा लिखूं. "The SandGlass" लगभग ख़त्म होने वाली हैं. एक पतली सी किताब को रवि ने मुझे ये कह कर दी थी की हैदराबाद से पुणे के सफ़र में ख़त्म हो जाएगी... कहानी ऐसी की सोचा, किताब ख़त्म होते ही उन्हें तहे दिल से धन्यवाद् कहूँगी.
हैदराबाद के तीन दिन बड़ी जल्दी फुर्र हो गए.. प्रिया के साथ ने मेरी आत्मा और मन को तृप्त कर दिया था. प्रिया मेरी सहेली. सबसे प्यारी, सबसे न्यारी..
लगा सदियों बाद आज़ाद हुयी हूँ.. बहुतों ने मुझे मेरी बंदिशों से आज़ादी के सपने दिखाए, पर शायद अपने शिकंजे में कस के.. मुझे ऐसी आज़ादी और कहाँ मिलती. ज़िन्दगी का पूर्ण अहसास अपनी सहेली और उसके परिवार के साथ.
अगले दिन सुबह रवि मेरे लिए कुछ अच्छी किताबो को ढूँढने में लग गए. "The Legends of Kasaks" ढूँढ रहे थे. बड़ा अनूठा तरीका था उनका अपने जीवन के अनछुए भाग को परोसने का, पूरी शाम हम सिर्फ एक शब्द "आज़ादी", "स्वतंत्रता", "Freedom" को पलट-पलट के सेक रहे थे... मैं शायद अपने ही ख्यालों में थी की उन्होंने मेरी तरफ एक पत्ता फेक दिया, "क्या तुम सच में आज़ाद हो?" मैं मुस्कुरा दी...
वो आगे बात करते रहे, जैसे मेरी मुस्कराहट में उनको जवाब मिल गया हो.."आज़ादी - विशवास में और त्याग में हैं.."
विश्वास क्या हैं हम घंटों डिबेट करते रहे..
"विश्वास गरीब के लिए रोटी और पापी के लिए धर्म हैं! पैरों को कदम पर और शरीर को दीमाग पर विश्वास होता हैं. विश्वास पितृत्व की तरह हैं जिसको सिर्फ जिसने जीया हैं वो जान सकता हैं, जैसे की माँ!"
मैं उनका दर्द समझ रही थी, वो उस आस्तीन के नीचे के घाव की तरह, जैसे मेरी नज़र पड़ती तुरंत छिपा देते.
प्रिया मेरी प्रिय, मेरी चिकर-चिकर करने वाली दोस्त, जिसके प्यार करने का तरीका ही अनोखा हैं. मुझे हद का परेशान कर देती थी. कहती थी लगता हैं हमें एक दुसरे का स्पर्श अच्छा लगता हैं. शायद हमारे पार्टनर में जो कमी हैं वो पूरी होती हैं. मुझे इधर उधर चुटी काटती रहती, जबतक मैं उससे इतने जोर के काटती की वो कुछ देर तक अलग रहती. सिर्फ कुछ ही देर के लिए :)
जब हम हॉस्टल से बिछड़े तो वो कई दिनों तक सो नहीं पायी थी...
हॉस्टल के दिन भी कितने प्यारे थे. जब सबको क्रिकेट देखना होता तो हमे "Godfather" देखना होता. और वो अपनी बदमाशियों से सबको टीवी रूम से बाहर निकलने में सफल होती. रह जाते सिर्फ हम दोनों.
वो मुझे एअरपोर्ट से रात के एक बजे अपने पति के साथ आई थी. हमारा मिलना, गले मिलना और चुम्बन देख कर उनको कुछ आराम तो मिला होगा. वो एक हाथ से शिवी को पकडे थे और दुसरे से हमारा भारी बैग. प्रिया बहुत कमज़ोर और पिली लग रही थी. मैं उसका दर्द समझ रही थी... कुछ दिन पहले रवि ने ही मुझे उसके लिए खोज निकाला था.
उसके ज़िन्दगी में मैं १५ साल बाद आई थी. फिर भी इतना समझ आ गया था की वो क्यों पथ-भ्रस्त हैं. वो धरातल में रहती थी और वो अपने सपनो की दुनिया में. वो अपने मूल्यों में रहते थे और वो अपने संसारिकता में रहती थी. प्रिया उतनी ही स्वार्थी थी जितना की उनका निस्वार्थ भाव !
वो काफी भूखे थे जब वो हमे शाम की फ्लाइट के लिए छोड़ने आये. प्रिया फटाफट उनके लिए दोसे बना रही थी. सुबह का बासी खाना के एवज में कुछ अच्छा तो बनता हैं. रात इतने देर से सोये थे, की सुबह समय से उठे ही नहीं. रवि को रात का खाना दे कर ही भेज दिया. मैं उनके सामने बैठी शिवी के बाल कर रही थी. और वो अपने हमेशा की तरह दरियादिल व्यव्हार में हम चारों को अपने हाथ से डोसा खिला रहे थे. मुझे नन्ही मिन्नी वो मेरे बगल में बैठी थी, से भी कौर मिल रहे थे. मेरी तो चांदी ही चांदी थी...
वो चाहते थे की मैं रोमेश गुनासेकारा की "The Sandglass" की समीक्षा लिखूं. पर में तो एक अपनी ही कहानी लिख गयी...
अकेले होते ही मैंने उनको कॉल किया. झूठ बोला था की मैंने कोशिश की. मेरी दो मिनट की रसम पूरी हो गयी थी. और वो नीचे चले गए थे. वैसे भी उस छोटे पलंग में नहीं सो सकती थी, इस रस्म के अलवा और कुछ हमारे बीच था भी तो नहीं. मुझे मेरा हिस्से का मिल गया था.
सोचती हूँ क्या मजबूरी होती हैं की हम उन रस्मों को जीते चले जाते हैं जिसमे हमारी आत्मा मरती चली जाती हैं... क्यों नहीं आज़ाद हो पाते हम इन रस्मों के चंगुल से? प्रिया आज इन रस्मों से आज़ाद हैं, मुझे कब आजादी मिलेगी?
1 टिप्पणी:
kaise keh deti ho itne saral andaaz main ... truly a heartfelt piece Amita!!
एक टिप्पणी भेजें