शादी के ११ साल हो गए थे. आधी उम्र बीत गयी थी.
जन्म एक लड़की का हुआ था पर औरत कभी नहीं बन पाई थी. उनके मुंबई के बैंडस्टैंड में मिलने ने शायद मेरे अन्दर की आग को चिंगारी दी थी.
क्या होती हैं ये आग! जब २२ की उम्र में पहली बार किसी मेरे हाथ देखने के बहाने मेरा हाथ छुआ था तो एक अजीब सी सिहरन हुयी थी. वो आग थी. जब दिल्ली से जयपुर की रात की वॉल्वो बस में उसने अपना हाथ मेरी छाती पे रखा था. वो आग थी.
पर वो आग मुझे कभी नहीं भूलती जो उस आधी उम्र के लड़के ने मुझमे जगाई. मुझे मेरे औरत होने का पहली बार पूरा अहसास दिलाया.हम एक सोशल ग्रुप में मिले थे. मेरी ईमेल से काफी प्रभावित था वो. एक दिन अचानक उसने बताया की वो नॉएडा आ रहा हैं अपनी मासी के पास.
"सन्डे हैं! कॉफ़ी पियोगी आप?"
सेक्टर-१८ में नया नया बारिस्ता का प्यारा सा कैफ़े था. पहचाने में कोई परेशानी नहीं हुयी. उसकी फोटो देखी हुयी थी. हमने कॉफ़ी आर्डर की. जनाब पुरे के पुरे आग थे. तीखा नैन नक्श. शरीर कसरत से भरा-पूरा.
मैं बड़ी थी. पहल भी मुझे ही करनी थी. बड़ा स्टाइलिश मोबाइल था उसके पास. उसके हाथ से छीन कर उससे खेलने लगी. भारतीय क्रिकेट टीम की फोटो देख कर मुझसे रहा नहीं गया.
"ये क्या हैं?"
"मेरा कजिन हैं"
"कौन?"
"हाँ उसके की घर पे आया हूँ. उसका छोटा भाई नीचे इंतज़ार कर रहा हैं!"
उसकी नशीली आंखें और डोले-शोले मेरे तन-बदन को ख़ाक कर चुके थे. उसका हमारे बीच में रखा हुआ हाथ मैंने अपनी तरफ खीच लिया. एक छोटी की चोट को सहलाती हुए बोली. "कैसे लगी?"
शायद मौका मिलता तो हम उस दिन ही अपनी आग बुझा पाते...
कुछ दिनों बाद उसने गुडगाँव में जहाँ नए नए माल बने थे एक मूवी देखने के लिए बुलाया.
सुपरमैन की कोई मूवी थी. मूवी तो क्या देखी हाँ पॉपकॉर्न खाते खाते एक दुसरे का पूरा आनंद लिया.. एक हरे रंग की टीशर्ट पहली थी.कसी हुयी बाहें, रोल की हुयी शर्ट. बस इंतज़ार था की वो मुझे अपनी बाहों में कस ले.
आज उस बालक को सलाम करने को मन करता हैं. वो जिसने मुझे औरत होने का पूर्ण अहसास दिलाया. बिना किसी जज़्बाती रिश्ते के. बिना किसी बंधन के. उस दिन पता चला की वो आग जिसके लिए सिर्फ मर्द जाने जाते हैं वो मुझ में भी हैं. मैं भी जिंदा हूँ.
जन्म एक लड़की का हुआ था पर औरत कभी नहीं बन पाई थी. उनके मुंबई के बैंडस्टैंड में मिलने ने शायद मेरे अन्दर की आग को चिंगारी दी थी.
क्या होती हैं ये आग! जब २२ की उम्र में पहली बार किसी मेरे हाथ देखने के बहाने मेरा हाथ छुआ था तो एक अजीब सी सिहरन हुयी थी. वो आग थी. जब दिल्ली से जयपुर की रात की वॉल्वो बस में उसने अपना हाथ मेरी छाती पे रखा था. वो आग थी.
पर वो आग मुझे कभी नहीं भूलती जो उस आधी उम्र के लड़के ने मुझमे जगाई. मुझे मेरे औरत होने का पहली बार पूरा अहसास दिलाया.हम एक सोशल ग्रुप में मिले थे. मेरी ईमेल से काफी प्रभावित था वो. एक दिन अचानक उसने बताया की वो नॉएडा आ रहा हैं अपनी मासी के पास.
"सन्डे हैं! कॉफ़ी पियोगी आप?"
सेक्टर-१८ में नया नया बारिस्ता का प्यारा सा कैफ़े था. पहचाने में कोई परेशानी नहीं हुयी. उसकी फोटो देखी हुयी थी. हमने कॉफ़ी आर्डर की. जनाब पुरे के पुरे आग थे. तीखा नैन नक्श. शरीर कसरत से भरा-पूरा.
मैं बड़ी थी. पहल भी मुझे ही करनी थी. बड़ा स्टाइलिश मोबाइल था उसके पास. उसके हाथ से छीन कर उससे खेलने लगी. भारतीय क्रिकेट टीम की फोटो देख कर मुझसे रहा नहीं गया.
"ये क्या हैं?"
"मेरा कजिन हैं"
"कौन?"
"हाँ उसके की घर पे आया हूँ. उसका छोटा भाई नीचे इंतज़ार कर रहा हैं!"
उसकी नशीली आंखें और डोले-शोले मेरे तन-बदन को ख़ाक कर चुके थे. उसका हमारे बीच में रखा हुआ हाथ मैंने अपनी तरफ खीच लिया. एक छोटी की चोट को सहलाती हुए बोली. "कैसे लगी?"
शायद मौका मिलता तो हम उस दिन ही अपनी आग बुझा पाते...कुछ दिनों बाद उसने गुडगाँव में जहाँ नए नए माल बने थे एक मूवी देखने के लिए बुलाया.
सुपरमैन की कोई मूवी थी. मूवी तो क्या देखी हाँ पॉपकॉर्न खाते खाते एक दुसरे का पूरा आनंद लिया.. एक हरे रंग की टीशर्ट पहली थी.कसी हुयी बाहें, रोल की हुयी शर्ट. बस इंतज़ार था की वो मुझे अपनी बाहों में कस ले.
आज उस बालक को सलाम करने को मन करता हैं. वो जिसने मुझे औरत होने का पूर्ण अहसास दिलाया. बिना किसी जज़्बाती रिश्ते के. बिना किसी बंधन के. उस दिन पता चला की वो आग जिसके लिए सिर्फ मर्द जाने जाते हैं वो मुझ में भी हैं. मैं भी जिंदा हूँ.
1 टिप्पणी:
गंभीर विषय पर इतने सरल शब्द!
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