सोमवार, अगस्त 26, 2013

मजबूती..

आज "खबसूरत बहु" देख कर अम्मा बहुत याद आई.. ब्रजभूमि के पित्रसत्तात्मक मौहौल पर बेहतरीन नाटक. पर अजीब विडंबना दिखाई हैं! हर औरत मजबूत, अपना हक और अपनी अस्मिता का पूरा अहसास था उसको. आदमी सब एक से बढ़ कर एक नमूने.
मैंने १२ पास की थी. गाँव में रहना पसंद था. पर घर के काम काज में थोडा जी नहीं लगता था. लड़की हो कर काम-चोर, कैसे चलता आगे! शायाद यही वजह थी की माँ-पापा ने मुझे ३ महीने गाँव में रहने को कहा.
पौ फटने से पहले उठना होता था घर की बहु-बेटियों को... न उठे तो अम्मा लेटे-लेटे दो चार गलियां सुना देती...
बहुऔ को बहुऔं सी, बेटियों को बेटियों सी.
"करमजली रात भर में तेरे चुतर न दुखे... एक सेर चक्की पीसवे में दुःख जात हैं".
"कुतिया लेटी रह, कुत्ते उठ गए तो चाटवे लग जायेगे"
ये तो सुबह का प्रसाद था. अभी तो दिन भर सैकड़ो बार रांड, रंडी, कढ़ी खाऊ तेरी, दीयो जराऊ, तेरो पेट फाड़ दू ... सुनना बाकि था.
काम उतना था नहीं, जितना वो निकाल निकाल के देती थी, हम बहनों को.
सुबह शुरू होती गाय-भैंस के दरबे की सफाई से. कचरा-गोबर ले कर छबरा ऊपर तब भरवा देती.. इतना भारी की मेरी पतली गर्दन टेक नहीं पाती...
"रंडी, देखो तो मुडिया कैसे मटका रही हैं, चुतर में दो पड़ेंगे तो अभी सीधी हो जावेगी..."
५-१० किलो आटा मढ़ता था पुरे २०-२५ के परिवार के लिए. मेरी ड्यूटी लगती तो जान ही निकल जाती. इतनी पतली कलाई थी की आटा माढ़ते-माढ़ते कलाई सूज जाती... पर अम्मा कहा पिघलने वाली थी..
"अरे भरे पुरे ससुराल में चली गयी तो क्या सबको भूखे मारेगी"?
अगर बाल में कोई सुन्दर रबर-बैंड लगा होता, तो उसे खीच के तोड़ डालती.
"नचकनी, रंडी बनेगी क्या..."
एक पल के लिए लड़की ओझल होती तो दुसरे तो भेज के उसको बुला लेती. एक-एक का हिसाब रखती.. कौन कहाँ गया हैं और कब से. खेत जाना हमारे लिए जेल से निकलना था. वहा के काम चाहे दाले बिननी हो या टमाटर तोड़ने हो, पर थी पूरी आज़ादी.. हाँ बीच बीच में वहां भी हाजरी लग जाती थी.
पर रात तो सबको खाना खिला के जब हम खाने बैठते तो तुरंत आ जाती और चूल्हे पे बैठ जाती. गरम-गरम फुल्के उतारती और उसपे इतना घी उड़ेलती की, रोटी चुने लगती थी. हाथ से मरोड़ कर हमारी थाली में रखती जाती... जितनी कठोर दिन में होती, उतना प्यार रात में निकलता.. फिर कुछ अच्छा सा गीत या कविता का बोनस फ्री...
"नर हो न निराश करो मन को..., कुछ काम करो कुछ काम करो..."
एक दिन अम्मा को अजीब भूत सवार हो गया. गेहूं के भरे बोरे इधर से उधर रखवाती जा रही थी.इतने भारी की खिसकने में जान निकल जाए, वो तो कंधे पे रख कर ले जाने को कहती. मैं बहुत मजबूत थी नहीं. ३०-३५ की होंगी. शरीर में बिलकुल ताकत नहीं थी. पर अम्मा कहाँ कुछ समझने वाली थी. पूरी दोपहरी यही चलता रहा. एक कमरा खाली जो करना था! जिद्द थी बस उनकी, करवाना हैं तो सिर्फ मुझ से.
उस कमरे के नीचे गेहूं की एक बड़ा भण्डारण था. ख़तम सा हो गया था. अन्दर जाने वाला रास्ता खुला पड़ा था. इतनी बुरी तरह से थक गयी थी की ठीक से चल भी नहीं पा रही थी. एक बोरी को आगे-पीछे करते एक पैर उस भण्डारण ने चला गया. एक पैर ऊपर रह गया. सब इतने झटके से हुआ की चक्कर आ गए. किसी तरह निकली तो उलटे डांट पड़ी..
"आँख न ये याकि.. बटन हे. गड्ढों न दीख रओ याकु!"
कुछ देर बाद ऊपर छत पर मुतने गयी तो टट्टी की जगह अजीब की सुरसुराहट हो रही थी. हाथ से महसूस किया तो कुछ केचुया सा लगा.. उसे पकड़ कर खीचे लगी तो मुआ खिचता ही चला जाए.. पूरा दो फीट का रहा होगा. जब पूरा निकला तो चैन आया, और कुछ खून भी..
आज अम्मा की दी हुयी मजबूती के सामने दुनिया की हर मुसीबत छोटी हैं.. आज भी शायद वो जो मुझे कमज़ोर बना रहा हैं उसको मुझे उस चाटुकार की तरह निकाल फेकना हैं... नहीं तो वो परजीवी मुझे अन्दर ही अन्दर खोखला कर देगा... हर गड्ढा जो राह में मिलता हैं, शायद उसी के आगे, आगे जाने की सीढ़ी भी हैं!

1 टिप्पणी:

@aryaraju ने कहा…

Language kuch khatak si rahi hai :(