आज ऑफिस जाते वक्त, गगन से बात करते-करते
मेरे चार मन की बात निकल पड़ी. उसने पिछले दो हफ्ते का मेरा पागलपन की कोठारी से आसमान
के फेलाव तक का सफर, काफी नजदीक से देखा हैं.
ये मन भी बड़ा अजीब हैं, न जाने कितनी
आँखों से देखता हैं. आज ही देखो न जाने कितने मन साथ-साथ काम कर रहे थे. एक मन हैं
जो पुराने पल में गोते खा रहा हैं, एक मन जो नए खालीपन में नए रंग भर रहा हैं. एक
जो सोच रहा हैं की पुराना पल अच्छा था जब मैं उनके लिए पागल हो गयी थी, या अब जब मैं
उनकी तिलांजलि दे कर आज़ाद हूँ. और एक मन जो ७० की रफ़्तार में सड़क पर ध्यान देते
हुए गाडी आगे बढ़ा रहा हैं...
मैंने इस मन से अपने आप को रोते देखा
हैं, हँसते देखा हैं, दर्द में देखा हैं और पागल होते भी देखा हैं. कभी मन के घोड़े
रोके नहीं रुकते तो कभी एसे थम जाते हैं जैसे समय ही रुक गया हो.
अच्छा- बुरा सब देखा हैं इस मन ने. सच्चे
जीवन-साथी की तरह. कभी भागना चाहा खुद से, तो मेरी चोरी पकड़ी.. हाथ पकड़ के रोक के
बोला भी वो, “कहाँ जाओगी? जहाँ जाओगी हमें पाओगी!”... “कुछ देर और पागल हो लो, बाद
में मैं संभाल लूँगा.”
इस मन का क्या हैं. कभी सिर्फ एक हो
जाता हैं, तो कभी बिखर-बिखर कर सब जगह रायता फेला देता हैं... और जब एक हो जाता
हैं तो परम-आनंद हो जाता हैं. और जब बिखर जाता हैं, तब बटोरना मुस्किल हो जाता
हैं...
और प्रेम!! इस में तो सिर्फ एक मन रह
जाता हैं... दो बदन एक मन!
मन ही इस चित्त का सही दर्पण हैं. पर
कितने पढ़ पाते हैं किसी और का मन? मैंने पढ़ा क्या उनका मन?
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