हॉस्टल में आखरी दिन था. मेरी पोस्टिंग दिल्ली हुयी थी, इसलिए सोचा अगले दिन आराम से चली जाउंगी. भैया के घर ही तो जाना था. जिनको बाहर जाना था, वो रात में ही चले गए थे. बचे सिर्फ वो जिनकी ट्रेनिंग पूरी नहीं हुयी थी या हम जैसे फुरसतिया.
सुबह हुई तो पेट में बहुत तेज दर्द था. इतना की बिस्तर से उठाना ही मुस्किल हो रहा था. मन किया, नीचे जा कर किसी को बता दूं, फिर ये सोच के रुक गयी की ऐसा-वैसा ही दर्द होगा, कुछ देर मैं ठीक हो जायेगा. कभी डर सा भी लगा, कल रात राजेश के घर खाने पे गए थे तो वापिस आते वक्त सीड़ी पे चक्कर आ गए थे, कुछ तो जरुर परेशानी हैं. वैसे जब मैंने सीमा की मदद की और १०-१२ लोगों के लिए रोटी बनायीं थी, तब तो सब ठीक ठाक था.
प्रेम को मैं पिछले एक साल से ही जानती थी. पर हमारे बीच एक अजीब सा रिश्ता था. शायद प्यार था. मैं अक्सर कमरे में उनके लिए खाना बनाती. मेस में मुझसे डब्बा छीन लेते और मुम्बैया टपोरी की तरह कहते,
"उइच मेरा हैं, और किसी को देखने का भी नहीं..."
अक्सर हम पुलाव बनाते तो मेस में नहीं खाते. सदर जा कर ताज़ी सब्जियां लाती. पर जाती उनके सह-पाठी के साथ, वो तो नवाब साहब थे. शायर थे. थोड़े अख्हड़ थे. छोटी छोटी बात में लोग को सुना देते थे.
अचानक रूम की घंटी बजी. लगा एसे में तो सिर्फ भगवान् आ सकते हैं. लड़कियां सब जा चुकी हैं. लड़के भी ज्यादातर जा चुके हैं, या सुबह वाली बस में जाने की तय्यारी कर रहे होंगे. हिम्मत कर के दरवाज़ा खोला. श्री था.
"क्या हुआ तुमको. मैं विक्स लेने आया था. कहाँ रक्खी हैं?"
"कुछ नहीं पेट मैं दर्द हैं. बहुत तेज!"
मैंने अलमारी के तरफ इशारा किया. कुछ दिन पहले जब मुझे बहुत तेज जुखाम हुआ था तो श्री से विक्स मांगने गयी थी, तो सबको बताता फिर रहा था, "मेढ़की को जुखाम हुआ हैं..."
अभी एक पल ही बीता होगा और प्रेम मेरे कमरे में आ चुके थे. नाराज़ थे.
"क्यों नहीं बताया."
दर्द में करहाते हुए सोचा, कैसे बताती...
तुरंत गोद में उठा कर चल दिए.. इतना कम वजन भी नहीं था..मुस्कुराते हुए सीडियों से उतारने लगे..
"भारी हो.. पर उठा सकता हूँ"
नीचे सोफे पे बैठा कर तुरंत केयर-टेकर के पीछे पड़ गए..
"फ़ौरन जीप मंगवाओ!"
जब तब जीप आ नहीं गयी पूरा इंस्टिट्यूट सर पर उठा लिया...
हॉस्पिटल में डॉक्टर ने देखते ही शक किया की ये अपेंडिक्स का दर्द हैं. दर्द की दवाई दी और कहा की इसका जल्द की ऑपरेशन करवाना होगा.
शाम तक हॉस्टल वापिस आ गयी थी. बाकि दोस्तों ने प्रेम को मेरे साथ नीचे के एक कमरे में सोने को कहा. दर्द था पर उनका साथ दर्द को कम कर रहा था.. हम हाथ पकड़ कर एक साथ कब सो गए पता हि नहीं चला.
अगले दिन फिर दर्द था. हॉस्पिटल में भरती होना ज्यादा ठीक लगा. तुर्रंत हॉस्पिटल पहुँच गए. मम्मी-पापा कानपूर गए हुए थे. आने में १-२ दिन लगने की उम्मीद थी. उन दिनों मोबाइल भी नहीं थे. बड़े मुस्किल से तो बात होती थी.
प्रेम ने हॉस्पिटल में मेरा पूरा ख़याल रखा. खाना मेरे मुह बोले भाई दिनेश के घर से आ जाता था.
अगले दिन प्रेम कुछ लेने बाहर गए थे. अचानक रूम का फ़ोन बजा, रिसेप्शन से था.
"आपसे कोई मिलने आया हैं."
मैंने आने को कहा. दो लोग आ कर बैठ गए. एक लड़का सा था और एक थोड़े बड़े.
"आप?"
"प्रेम जी यहीं हैं न?"
"जी"
कुछ देर में प्रेम आये, तो उनको देख कर थोडा घबरा गए. मैं बिस्तर पे पड़ी हुयी चुपचाप सब देख रही थी.
उनमे से जो बड़े थे अचानक बोलने लगे.
"आपके पिताजी ने कहा की जा के मिल ले. हॉस्टल गए तो पता चला आप यहाँ हैं. तारिख पक्की करनी हैं."
मुझे लगा जैसे मेरे दिल को किसी ने जोर से मसल दिया हो... चुप रही. प्रेम भी चुप थे. फिर बोले.
"आप जाओ घर, मैं पिताजी से बात कर लूँगा"
उनके जाते ही जैसे मुझे सांप सूंघ गया था. समझ नहीं आ रहा था की क्या करूँ. दर्द जैसे बहुत बढ़ गया था. आज मम्मी को आना हैं सिर्फ इतना याद था. प्रेम चले गए.. सदा के लिए!
सुबह हुई तो पेट में बहुत तेज दर्द था. इतना की बिस्तर से उठाना ही मुस्किल हो रहा था. मन किया, नीचे जा कर किसी को बता दूं, फिर ये सोच के रुक गयी की ऐसा-वैसा ही दर्द होगा, कुछ देर मैं ठीक हो जायेगा. कभी डर सा भी लगा, कल रात राजेश के घर खाने पे गए थे तो वापिस आते वक्त सीड़ी पे चक्कर आ गए थे, कुछ तो जरुर परेशानी हैं. वैसे जब मैंने सीमा की मदद की और १०-१२ लोगों के लिए रोटी बनायीं थी, तब तो सब ठीक ठाक था.
प्रेम को मैं पिछले एक साल से ही जानती थी. पर हमारे बीच एक अजीब सा रिश्ता था. शायद प्यार था. मैं अक्सर कमरे में उनके लिए खाना बनाती. मेस में मुझसे डब्बा छीन लेते और मुम्बैया टपोरी की तरह कहते,
"उइच मेरा हैं, और किसी को देखने का भी नहीं..."
अक्सर हम पुलाव बनाते तो मेस में नहीं खाते. सदर जा कर ताज़ी सब्जियां लाती. पर जाती उनके सह-पाठी के साथ, वो तो नवाब साहब थे. शायर थे. थोड़े अख्हड़ थे. छोटी छोटी बात में लोग को सुना देते थे.
अचानक रूम की घंटी बजी. लगा एसे में तो सिर्फ भगवान् आ सकते हैं. लड़कियां सब जा चुकी हैं. लड़के भी ज्यादातर जा चुके हैं, या सुबह वाली बस में जाने की तय्यारी कर रहे होंगे. हिम्मत कर के दरवाज़ा खोला. श्री था.
"क्या हुआ तुमको. मैं विक्स लेने आया था. कहाँ रक्खी हैं?"
"कुछ नहीं पेट मैं दर्द हैं. बहुत तेज!"
मैंने अलमारी के तरफ इशारा किया. कुछ दिन पहले जब मुझे बहुत तेज जुखाम हुआ था तो श्री से विक्स मांगने गयी थी, तो सबको बताता फिर रहा था, "मेढ़की को जुखाम हुआ हैं..."
अभी एक पल ही बीता होगा और प्रेम मेरे कमरे में आ चुके थे. नाराज़ थे.
"क्यों नहीं बताया."
दर्द में करहाते हुए सोचा, कैसे बताती...
तुरंत गोद में उठा कर चल दिए.. इतना कम वजन भी नहीं था..मुस्कुराते हुए सीडियों से उतारने लगे..
"भारी हो.. पर उठा सकता हूँ"
नीचे सोफे पे बैठा कर तुरंत केयर-टेकर के पीछे पड़ गए..
"फ़ौरन जीप मंगवाओ!"
जब तब जीप आ नहीं गयी पूरा इंस्टिट्यूट सर पर उठा लिया...
हॉस्पिटल में डॉक्टर ने देखते ही शक किया की ये अपेंडिक्स का दर्द हैं. दर्द की दवाई दी और कहा की इसका जल्द की ऑपरेशन करवाना होगा.
शाम तक हॉस्टल वापिस आ गयी थी. बाकि दोस्तों ने प्रेम को मेरे साथ नीचे के एक कमरे में सोने को कहा. दर्द था पर उनका साथ दर्द को कम कर रहा था.. हम हाथ पकड़ कर एक साथ कब सो गए पता हि नहीं चला.
अगले दिन फिर दर्द था. हॉस्पिटल में भरती होना ज्यादा ठीक लगा. तुर्रंत हॉस्पिटल पहुँच गए. मम्मी-पापा कानपूर गए हुए थे. आने में १-२ दिन लगने की उम्मीद थी. उन दिनों मोबाइल भी नहीं थे. बड़े मुस्किल से तो बात होती थी.
प्रेम ने हॉस्पिटल में मेरा पूरा ख़याल रखा. खाना मेरे मुह बोले भाई दिनेश के घर से आ जाता था.
अगले दिन प्रेम कुछ लेने बाहर गए थे. अचानक रूम का फ़ोन बजा, रिसेप्शन से था.
"आपसे कोई मिलने आया हैं."
मैंने आने को कहा. दो लोग आ कर बैठ गए. एक लड़का सा था और एक थोड़े बड़े.
"आप?"
"प्रेम जी यहीं हैं न?"
"जी"
कुछ देर में प्रेम आये, तो उनको देख कर थोडा घबरा गए. मैं बिस्तर पे पड़ी हुयी चुपचाप सब देख रही थी.
उनमे से जो बड़े थे अचानक बोलने लगे.
"आपके पिताजी ने कहा की जा के मिल ले. हॉस्टल गए तो पता चला आप यहाँ हैं. तारिख पक्की करनी हैं."
मुझे लगा जैसे मेरे दिल को किसी ने जोर से मसल दिया हो... चुप रही. प्रेम भी चुप थे. फिर बोले.
"आप जाओ घर, मैं पिताजी से बात कर लूँगा"
उनके जाते ही जैसे मुझे सांप सूंघ गया था. समझ नहीं आ रहा था की क्या करूँ. दर्द जैसे बहुत बढ़ गया था. आज मम्मी को आना हैं सिर्फ इतना याद था. प्रेम चले गए.. सदा के लिए!
“Have a heart that never hardens, and a temper that never tires, and a touch that never hurts." Charles Dickens
दिल कितना कमज़ोर होता हैं वो शायद उस दिन पता चला. ११ साल उस दर्द को पालती रही.. उस शीशे के टूटे हुए टुकड़े सजोंके रखे रही. वो टूटे हुए टुकड़े जो मुझे रोज़ लहुलुहान करते रहे...

2 टिप्पणियां:
तुम बहुत अच्छा लिखती हो। दर्द का अहसास अन्दर तक महसूस होता है। मुझे ज्यादा रीयलिस्टिक चीजें पसंद नहीं इसी वजह से।
I like to ignore such realities and live in dreams.
अनुराग, सराहना के लिए आपका ह्रदय से आभार. यथार्थ ही जीवन हैं.. इसमें जी के देखो, सपने पीछे छूट जायेंगे!
एक टिप्पणी भेजें