गुरुवार, जनवरी 26, 2017

अपराधी कवि

एक लोधा आदिवासी कवि को जेल हो जाती हैं।  उसका अपराध, आपराधिक जनजाति का होना।
वो कविता लिखता हैं जो अब लोक गीत हैं..  एक सुन्दर कविता, संघर्ष एक सरल समाज का सभ्य समाज से!!
वो सभ्य समाज जो बड़े दंभ से कहता हैं, "तुम असभ्य, तुम अशिक्षित, तुम भाग्यहीन, मैं तय करता हूँ तुम्हारा भाग्य।"

(असल गीत आदिवासी बंगला में हैं, मैंने अंग्रेजी वाले से हिंदी में लिखने की छोटी कोशिश की हैं। )


'नहीं जानता! भाग्य का क्या भगवान, खेल निर्दयी जो उसने खेला था! उन्होंने मुझे एक बदमाश सोचा, एक साधारण लोक -
और अदालत में भेजा है, बंधे हाथ
कौन भाग्य के खेल से बच सकता हैं? कोई भी आदमी, महान हो या छोटा! काश! मेरा भाग्य!
मैं एक बतख के रूप में पकड़ा गया था - और एक सेल में डाल दिया गया जमानत के बिना।
और मैं बहुत अकेला हूँ - और अपनी किस्मत को अकेले कोसता हूँ! अब से मुझे मिलेगा - सिर्फ एक आधा थाली,
और मैं भूख से हड्डी बन-
हो जाऊंगा एक कीड़े (बीटल ड्रोन) की तरह। हर एक संभावना से धूमिल - यह सब जेल की चाल है!
मैं प्रार्थना करता हूं! अच्छे और दयालु गार्ड ! ,कृपया मुझे आज़ाद कर दो। मैं हमेशा घर के लिए विलाप करता हूँ। सेल में अधिकारी ने, 
मेरे याचिका को असफल किया और उन्होंने लंबे समय तक सजा का समर्थन किया - उसके साहब ने उसपर ठप्पा लगाया; मुझे मिला एक जेल का किट - दोषी के ढीला पतलून और अन्य छूटपुट। और मेरे वार्डन को जब मैंने कारण पूछा उन्होंने मुझे बिना राहत या थमने के, काम पर काम देते गए;
बकवास! उन्होंने कहा, जेल इतनी कमीनी है! कठिन परिश्रम से परिश्रम करना होगा, पर थोड़ी देर भी आराम नहीं। इंसान जिस दिन हर दूसरे को इंसान समझेगा, उस दिन ही 'सबके' दुखों का अंत होगा।

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