मंगलवार, जनवरी 24, 2017

हमारा बजाज

आज बुआजी से मिलने गई तो फूफाजी ने बताया की उन्होने दो हफ़्ते पहले हमारा बजाज दो हजार मे बेच दिया। २३ साल पहले जब राजाजीपुरम, लखनऊ में मेरी पहली फ़िल्ड पोस्टिंग हुई थी तो पहली बार थ्री बेडरूम का सरकारी फ़्लैट मिला था। इधर उधर जाने के लिए गाड़ी बहुत जरूरी थी। फूफाजी ने सलाह दी की नया क्या लोगी, ये बजाज चेतक ले जाओ, यहा खड़े भी जंग ही लगनी है। पूरे चालिस किलो की मै और उस समय का सबसे भारी स्कूटर!! सुबह ऑफ़िस के लिए किक मारते हुए सर्दी मे तो १०-१५ मिनट लग जाते थे। पड़ोसी भी मेरी परेशानी देख कर अपने सुझाव देते नही थकते। एक बार बढिया सर्विस करवाने के बाद भी खास अंतर नही आया। बहुत बार जब शुरु नही कर पाती तो पड़ोस के गुड्डू से दोस्ती काम आती। पर मुझे जैसे पहली बार पंख लग गए थे। दोस्तो के यहा जाना या पूरे लखनऊ में घूमना, या ऑफ़िस की दौड़भाग सब आसान हो गई थी। एक बार चारबाग़ के पास भीड़ मे स्कूटर स्किड कर गया। इतना भारी था कि मुझसे तो उठने से रहा। जाम बढ़ने लगा तो लोगो ने मदद की। मदद क्या की सुनाया ज्यादा की जब उठा नही सकती तो चला क्यूँ रही हो! ख़ैर अपनी स्वच्छंदता की कुछ क़ीमत तो देनी पड़ती है।
छ: महिने बाद वापस ग़ाज़ियाबाद टेलीकॉम ट्रेनिंग सेंटर जॉइन करना था तो घर के सामन के साथ स्कूटर भी ट्रेन से भिजवा दिया। पर १० दिन बाद बाकी सामान तो मिल गया पर स्कूटर ग़ायब था। पता चला गलती से अमृतसर पहुँच गया है और वहा से वापस भेजा जाएगा। पूरे एक महिने बाद मै और एक दोस्त स्कूटर माल गोदाम से ले कर लाए। काफी हालत ख़राब थी। किसी तरह ग़ाज़ियाबाद तक लाया गया। फिर सर्विस करवाया और मेरे पहले जैसे दिन आ गए। हम कुछ दोस्त जिनके पास बाइक स्कूटर था, सब लाइन से रोज़ शाम को तफ़री के लिए निकलते। मेन गेट बंद होता था और मेरा सबकी तरह स्कूटर साइड गेट से बिना उतरे निकालने की ज़िद्द होती। सबसे भारी स्कूटर होने के बावजूद एक दो बार मे अच्छी प्रेकटिस हो गई थी। वैसे मुझे उन दिनों बाइक चलाने का इतना भूत सवार था की अपने बॉयफ़्रेंड की बाइक की चाभी छीन कर अपने स्कूटर की चाभी उसे पकड़ा देती थी! वैसे हॉस्टल मे एक गाड़ी होने का मतलब हमेशा चाभी घूमती रहती थी। किसी को ड्रोप करना है, कोई जरूरी काम सब मे हमारा बजाज बहुत काम आता था। मेरी रूममेट नीलम को ले कर लगभग हर रोज़ राजनगर जाना होता था। और एक बार तो उसे बिना बैठाए ही एक किलोमीटर चला ली फिर पता लगा की नीलम मेरी बात का जवाब क्यो नही दे रही थी :)
आने लगी तो भैया ने बताया की वो इसे हज़रतगंज के एक शोरूम से ६०० डॉलर दे कर ऑफ़ थ शेल्फ़ ले कर आ गए थे। उनके भी टेलीकॉम ट्रेनिंग का ये मज़बूत साथी था! आज उसकी कोई फ़ोटो नही है पर वो जहा भी है उसे सौ सलाम ठोकने का मन है! (फोटो इन्टरनेट से ली हैं, इसी 
कलर का था हमारा बजाज) 
ये ज़मीन ये आसमाँ, हमारा कल हमारा आज, हमारा बजाज.. बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर, हमारा बजाज।।

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