शुक्रवार, जुलाई 26, 2013

पुनर्मिलन

सुबह उठी तो अजीब सी थकान और निराशा. ये दिन भी औरों जैसा ही होगा. एक पुराना सफ़ेद चिकन का कुरता पहना और ऑफिस चल दी...
लंच तक कोई कॉल नहीं आया. फिर एकाएक वो कॉल जिसका इंतज़ार जैसे मैं सदियों से कर रही थी.  
"शाम को फ्री हो?"
"हाँ"
"बताता हूँ. ऑफिस से देर से निकलना"
फ़ोन काट दिया. मैं कुछ पल के लिए फ़ोन कान पे लगाये रही, जैसे कुछ और बोल पड़ेंगे..
शायद ५ बजे होंगे, बड़े बेमन फ़ोन उठाया. 
"चलो आ जाओ. सेक्टर-१८"
"अभी?"
"हाँ अभी!"
अनूप को बुलाया ड्राईवर रूम से.
"चलो मुझे अट्टा छोड़ दो." 
"अभी मैडम?". 
"हाँ अभी".
गाडी से बच्चों को कॉल किया, "बेटा देर हो जाएगी. खाना खा कर सो जाना."
उनको कॉल किया तो मार्किट का नाम बता कर फिर फ़ोन काट दिया. २० मिनट में हम अट्टा पहुँच गए. 
"मैं घर आ जाउंगी, तुम घर गाडी पार्क करने चले जाना"
 गाड़ी से उतर कर रेस्टोरेंट तक पहुंची. वो बाहर आये. बोले, "१० मिनट का समय दो, कुछ दोस्त हैं, फारिग करके तुम्हे बुलाता हूँ." अजीब लगा, जैसे डॉक्टर की दूकान में नंबर लगा दिया हो!
नया मार्किट था, सिर्फ कुछ खाने-पीने की जगह और कोने में "ferns and petals" की एक फूलों की बढ़िया दूकान.
समय बिताने के लिए मैं टहलने लगी, फिर सोचा एक गुलदस्ता ले लेती हूँ. पीले गुलाब मुझे बहुत पसंद हैं. वो भी जब कोई मुझे भेंट दे! और आज बहुत दिनों बाद जैसे मुझे खुद के लिए कुछ करने का मन हुआ. २५ पीले गुलाब का एक सुन्दर का गुलदस्ता बनवाया. जैसे ही तैयार हुआ, उनका कॉल आ गया, "आ जाओ"
मैं हाज़िर हुयी. एक बढ़िया "fine dining" रेस्टोरेंट, प्यारा अंग्रेजी संगीत और कम रौशनी.. हम अकेले थे. शायद रात में जोड़े आते होंगे. अभी तो सिर्फ ६ बजे हैं!
बैठने के लिए बोला, मैंने अपने पुराने चिकन के कुरते को देखा और  फिर उनके कपड़ों को. लज्जाते हुए बोली, "अगर पता होता आप बुलाओगे, तो सुबह कुछ ठीक ठाक पहनती!". बोले, "बहुत सुन्दर लग रही हो..."
ये दो शब्द मेरी चुप्पी तोड़ने के लिए काफी थे. कुछ प्यारी प्यारी बातें हुयी. मैं उनकी मुस्कराहट और तीखे नैन सहन नहीं कर पा रही थी. उनकी नज़र मुझसे हट नहीं रही थी, और मेरी इधर उधर देखने की कोशिश. 
एक लड़के को बुलाया. बोले "ले आओ, चिल्लड हैं न?" 
लड़का एक शैम्पेन की बोतल लाया. उनके लिए परोसी, फिर वो बोले, "थोडा इस गिलास में भी कर दो." 
"मैंने कभी नहीं पी"
"हर चीज़ का पहली बार होता हैं!"
लड़के को जाने को कहा. फिर बहुत देर तक जीब रोल कर के कैसे पीनी हैं, बताते रहे.. मैंने एक दो सिप पी. बस.
फिर कुछ इतालियन खाने को मंगाया. स्वादिष्ट था. क्या था ये याद नहीं, मन कहीं और था..
बाहर निकले तो हलकी फुहार हो रही थी.
"भीग जायेंगे". 
"चलो"
हाथ पकड़ के वो चलने लगे. बारिश की बूंदे तन-मन में आग लगा रहीं थी.
"आँखें मूंद लो और बूंदों को चेहरे पे महसूस करो.."
"गिर जाउंगी"
मुस्करा के बोले, "नहीं गिरोगी, मैं हूँ न, मेरा हाथ पकड़ के चलो.."
मैं उनका हाथ पकडे चलती गयी... लगा मैं स्वर्ग में हूँ. बारिश की बूंदे मानो प्यार झलका रही थी. इस अहसास का नाम ही प्यार हैं. इस विश्वास का नाम ही प्यार हैं. वो ३ महीनो का विरह जब मैं समाज के दायरों की वजह से अलग हुयी थी, हर बूँद के साथ घुल रहा था..
बारिश बहुत तेज हो गयी. इतनी तेज की आस-पास कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. हम गाडी में बैठ गए. युही कुछ देर गाडी घुमा के, सेक्टर-३३ आ कर उन्होंने गाडी रोक दी. उनका मेरी उँगलियों में उंगलियाँ फसा कर घंटों बातें करना, मुझे पूरी तरह पूर्ण कर रहा था.. उनकी प्यारी सी कार में बैठ कर घंटो बतियाते रहे.. ऐसी पूर्णता का एहसास जीवन को तृप्त कर देता हैं...
शाम ६ से रात के १२ बज गए... न उनको मुझे छोड़ने का मन, और न मुझे उनको. 
"आपका जन्म दिन हैं, घर पर मम्मी और भैया इंतज़ार कर रहे होंगे"
वो कुछ  नहीं बोले. वो घंटों आलिंगन, वो बाहर का तूफ़ान मानो तन-मन के तूफ़ान की तरह थमने का नाम ही नहीं ले रहा था...
आज २६ जुलाई, उनका जन्म दिन हैं. और मेरा उनकी दी हुयी विरासत से पुनर्मिलन. इस हिंदी ब्लॉग के माध्यम से. उनको एक सच्ची भेंट.
पुनर्मिलन, अपने आप से, आप सब से, उन जीवन के रस से जो हम सबको तर जाते हैं...

5 टिप्‍पणियां:

Suresh Ranva ने कहा…

बहुत अच्छा लिखा है ।यथा जान पडता है..

Vishakha ने कहा…

Khubsurat

अमिता आर्या ने कहा…

धन्यवाद दोस्तों...

gagz ने कहा…

hindi keyboard kaise use karun pata nahin...apni dil ki khushi zaahir karne ke liye itni jaldi hai ki hindi mein kaise likhun seekhne ki patience nahin hai!! khubsurat! keep writing

Unknown ने कहा…

खूबसूरत अनुभूतियों को हूबहू लेखनी में उतारने का हुनर अद्भुत है आपने अमिता जी