सोमवार, जुलाई 29, 2013

घर



एअरपोर्ट के बाहर बेटे को लेके निकली तो कॉल आया...

“टैक्सी लो और आ जाओ”

फिर कुछ देर बाद फिर कॉल आया.

“कैब भेज रहा हूँ, और हाँ एक कश्मीर से भाईजान हैं, उनको भी आना हैं, उनके साथ रुके रहना”

रात के १०:३० बज चुके थे. बेटा घर पर  होता तो अब तक सो चूका होता. पर जैसे यहाँ आना, मेरे खुद के लिए ज्यादा जरुरी था.

भाईजान तो उनके पहनावे की वजह से आसानी से पहचान लिया. कुछ देर तक कैब वाले से बात करने की कोशिश की, उसने नहीं उठाया. ११ बज रहे थे. बेटे को मैंने एक ट्राली पर बैठने को कहा. 

परेशान हो के बोला, “आप गंदे हो..”

लगा जैसे अनजान के सामने बेईज्ज़त हो गयी. वो कुर्सी ढूँढने लगे, पर बेटा बहुत झुंझला चूका था...

कुछ देर में कैब आई तो हम बैठ गए. उन्होंने मेरा परिचय पूछा.

बड़े गर्व से बोली, “माँ हूँ, नौकरी भी करती हूँ और घर भी, कुछ लिख लेती हूँ और कुछ समय देश सेवा..”

छोटी सी कार में बेटे को पैर फैलाने की जगह नहीं मिल रही थी.
“सोना हैं”,
“आप गंदे हो..”

ये सब देख कर भाईजान कुछ ऐसा बोले की मैं सिर्फ उनको सुनती रह गयी.

“ये तो अच्छी बात हैं, पर एक बात जो में साफ़ बोलना चाहता हूँ, ये समय आपके बेटे का सोने का था, घर पर रहते तो अब तक अच्छे से सो गया होता. माँ का रोल बच्चों के जीवन में बहुत अहम् हैं. वो बच्चों के बहुमुखी विकास के लिए ज़िम्मेदार हैं. हमारा भविष्य इन बच्चों से हैं, इनकी ज़िम्मेदारी पहले माँ की हैं. एक ज़िम्मेदार बाप का काम हैं की माँ और बच्चों को उनका हक दें, उन्हें खुश रखें. एक औरत घर बनाती हैं. अगर घर मजबूत होगा तो ही समाज मजबूत होगा. और समाज मजबूत होगा तो देश मजबूत होगा. इसलिए औरत के लिए देश सेवा पहले घर से शुरू होती हैं.”

हॉस्टल पहुंचे, तो मेरे भारी बैग, बाकी सामान और बेटे को देख कर बोले, “हमारी बहनों के नाज़ुक कंधे पर इतना बोझ. सही नहीं हैं.”

रात भर मैं सोचती रही की क्या इसलिए मैं अपने घर को घर नहीं बना पाई...

2 टिप्‍पणियां:

om ने कहा…

maa kaa kandha har bojh uthaa saktaa hai --ye sach hai ki waqt ne aapko kuch jyada bojh diyaa yaa yu kahe ki us ko sajha karne waala kandhaa nahi diyaa -par --
ye akelapan hi bahut saare logo kaa sahara banegaa -isi shubhkaamnaa ke saath

अमिता आर्या ने कहा…

धन्यवाद!