शनिवार, जुलाई 06, 2013

प्यार...

पिछले देढ़ महीने से, मेरा दो जगह अक्सर जाना हो रहा हैं. एक कार की वर्कशॉप और दूसरा मेरा साइकिल मैकेनिक.
कल जब में कबीर की साइकिल की सीट ठीक कराने गयी, तो मुझे वो ही मुस्कुराते चहरे देख कर दिन की सारी थकान जाती रही. एक छोटी सी दूकान हैं घर के बिलकुल पास, मालिक अक्सर दूकान पर नहीं होता हैं. मिलते हैं तो एक १४-१५ साल का लड़का और २ छोटे ८-१० साल के बच्चे. मन भर आता हैं उन बच्चों को अपनी देहाड़ी कमाते हुए देखने में. मुझे सिर्फ सीट ठीक करनी थी, पर बड़े लड़के ने खुद बोला, हैंडल टेड़ा हैं और ठीक करने लगा, फिर देखा पहिये ठीक घूम नहीं रहे हैं, तो गियर ठीक किये, फिर हवा भरी. जब ठीक सी लग रही थी तो एक छोटा बच्चा जो अपने पापा के साथ आया था उसको बिठा कर मुस्कुरा कर बोला "अपने पापा से कहना आपके लिए भी साइकिल ले कर आयेंगे!" फिर साइकिल पर कपडा मार कर छोटे लड़के से बोला, "क्या हुआ?" रात के ९ बज रहे थे, वो बोला, "अब घर जाना हैं."(शायद भूखा था, पर बोला नहीं)
दूसरी तरफ कार वर्कशॉप की बेरुखी. हर काम प्रोफेशनल! हर काम सिर्फ हिशाब से. ऐसा ठंडापन की अगली बार आने का कभी मन न करे.
साइकिल ठीक होने पर मैंने पूछा "कितना हुआ/" लड़का बोला, "२० रुपये". मैंने ३० रुप्रये दिए तो उसने १० रुपये छोटे लड़के को दिए और मुस्कुरा कर बोला, "जा खाले कुछ"...
लगता हैं प्यार सिर्फ गरीबो के दिल में रहता हैं! फिर काहे का रोज का ज़िद्दों-ज़हद, रोज की किट-किट!! किसके लिए??

1 टिप्पणी:

KULDEEP SINGH 'DEEP' ने कहा…

मार्मिक कहानी , आँखे छलछला गयी अमिता जी .