५ साल
पुरानी बात हैं, पर आज अपनी सहेली से बात करते हुए अचानक याद आ गयी.. कबीर
पेट में था, छठा महिना था. पांचवे महीने तक कही भी जाने की मनाही थी, इस
लिए इस नयी स्वछंदता का पूरी तरह आनंद लेना चाहती थी. पहले कुछ दिन
हैदराबाद अपनी प्यारी सहेली मधु के पास बिताये थे, पर मन नहीं भरा. लगा
बनारस जाना जरुरी हैं. आने वाला वहीँ का हैं! आगे पता नहीं क्या हो, उसे
अपनी पितृ-भूमि पे कदम रखने की ही मनाही न हो जाए
शाम को गंगा आरती देखने के बाद, मैं और शिवी सीधे गाडी तक न जा कर बनारस की गलियों में घुमने लगे.. खाने की चीज़े, गरम दूध, छोटी छोटी दूकाने, बड़ा मज़ा आता हैं एसे बेपरवाह और बेफिक्र घूमने में...
एक बड़ी सी हवेली और उसके सामने पक्का झज्जा. झज्जे पे एक ५०-६० साल की औरत छोटे से गैस के चूल्हे पे गरमा-गर्म टिक्की तल रही थी. मैंने पूछा, “माई, कितने की हैं?” वो बोली, “एक रूपया प्लेट”. मुँख से निकला, “क्या??”. पास एक-दो लोग और बैठे खा रहे थे, बोले, “ऐसी कहीं खाने को नहीं मिलेगी. खा के जाईये..”
साफ़ सुथरी साड़ी. साफ़ स्टील के बर्तन, कढ़ाई. साफ़ कपडे से ढका आलू और पीठी.
मुझसे रहा नहीं गया, मैंने पूछ ही लिया, “माई, क्यों बेचती हैं आप टिक्की?”
बोली, “बच्चे विदेश में हैं, पैसे की कोई कमी नहीं हैं, पर इससे थोडा मन लग जाता हैं, दो बातें हो जाती हैं, और कुछ जेब खर्च भी...”
कहते हैं खाना और प्यार धीरे धीरे ही बने तो उसका स्वाद आता हैं!
बड़े धीरे धीरे उन्होंने २ प्लेट टिक्की तैयार की, फिर पत्तल की कटोरी में हरी धनिया की चटनी, जो एक स्टील के टिफ़िन में थी, के साथ परोसी.
टिक्की ऐसी की मुंह में डालते ही घुल गयी.. और वो सिल-बट्टे की हरी धनिया और मिर्च की चटनी! क्या कहूं! इतना ताजा, स्वच्छ खा कर मन खुश हो गया..
प्रेम के बाद विरह स्वाभाविक हैं, पर इस तरह “दो बातें” कर के ज़िन्दगी कितनी आसान बन जाती हैं... ऐसी सीख और कहाँ मिल सकती थी...
शाम को गंगा आरती देखने के बाद, मैं और शिवी सीधे गाडी तक न जा कर बनारस की गलियों में घुमने लगे.. खाने की चीज़े, गरम दूध, छोटी छोटी दूकाने, बड़ा मज़ा आता हैं एसे बेपरवाह और बेफिक्र घूमने में...
एक बड़ी सी हवेली और उसके सामने पक्का झज्जा. झज्जे पे एक ५०-६० साल की औरत छोटे से गैस के चूल्हे पे गरमा-गर्म टिक्की तल रही थी. मैंने पूछा, “माई, कितने की हैं?” वो बोली, “एक रूपया प्लेट”. मुँख से निकला, “क्या??”. पास एक-दो लोग और बैठे खा रहे थे, बोले, “ऐसी कहीं खाने को नहीं मिलेगी. खा के जाईये..”
साफ़ सुथरी साड़ी. साफ़ स्टील के बर्तन, कढ़ाई. साफ़ कपडे से ढका आलू और पीठी.
मुझसे रहा नहीं गया, मैंने पूछ ही लिया, “माई, क्यों बेचती हैं आप टिक्की?”
बोली, “बच्चे विदेश में हैं, पैसे की कोई कमी नहीं हैं, पर इससे थोडा मन लग जाता हैं, दो बातें हो जाती हैं, और कुछ जेब खर्च भी...”
कहते हैं खाना और प्यार धीरे धीरे ही बने तो उसका स्वाद आता हैं!
बड़े धीरे धीरे उन्होंने २ प्लेट टिक्की तैयार की, फिर पत्तल की कटोरी में हरी धनिया की चटनी, जो एक स्टील के टिफ़िन में थी, के साथ परोसी.
टिक्की ऐसी की मुंह में डालते ही घुल गयी.. और वो सिल-बट्टे की हरी धनिया और मिर्च की चटनी! क्या कहूं! इतना ताजा, स्वच्छ खा कर मन खुश हो गया..
प्रेम के बाद विरह स्वाभाविक हैं, पर इस तरह “दो बातें” कर के ज़िन्दगी कितनी आसान बन जाती हैं... ऐसी सीख और कहाँ मिल सकती थी...

7 टिप्पणियां:
so beautiful!! loved reading it...thank you for sharing apni do batein..
thanks sonali :)
sundar
thanks anurag :)
एकदम टिक्की की तरह सीधे घुल कर दिल में उतर गई. बनारस की गलियों में एक से एक चाट, पान, रबड़ी, दूध वाले हैं जिन से थोड़ी देर बतिया लो तो मन तर हो जाता है.
नचिकेता जी आपकी टिप्पड़ी पढ़ कर जल्दी बनारस जाने को मन कर रहा हैं!
मन को भिगो गई है आपकी हर पोस्ट
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