शनिवार, दिसंबर 18, 2021

ट्रोल को स्ट्रोल

टेक योर ट्रोल फ़ोर स्ट्रोल....

हम जिन लोगों ने ऑरकुट के रूप में शोशल मीडिया को देखा है, फ़ेसबुक के शुरुआती दिन बहुत ही कौतुक भरे थे। मैं एक शादी शुदा आदमी के साथ रिश्ते में थी जिसमें कम कौतुकता नही होती, वो रिश्ता भी हमारे बेटे कबीर के आने के बाद स्वरूप बदल चुका था। लिवइन हो या शादी मर्द की मर्दानगी इस में है की वो कैसे अपने पार्टनर को कंट्रोल मे रखे। फ़ेसबुक ने कंट्रोल के नए मायने दिए। पासवर्ड मर्द के पास होना ज़रूरी है। फ़ेसबुक की एक्टिविटी लॉग पढ़ कर, "मेरी पोस्ट लाइक करने से पहले तुमने राजीव की कैसे कर ली।" चैट हिस्ट्री पढ़ कर, "सुनील को क्यो कहा बनारस ले जाने के लिए, मै मर गया हूँ क्या!" या "जब से फ़ेसबुक पर आई हो तुम बदल गई हो!"

फिर मै एक साल फ़ेसबुक से बाहर चली गई। दोबारा तब आई जब रिश्ता बिखर गया और फ़ेसबुक एक डायरी की तरह सारे शोक सोक ले रहा था।

ऐसे मालिकाना हक जताने वाले रिश्ते टूटते है तो इनका बड़ा ही विभत्स स्वरूप हो जाता है। 

फ़ोन करो तो गालियाँ दी जाती है या दारू पी कर यार गिनाए जाते है। और ट्रोलों की तो चाँदी हो जाती है। जल्द में एक मीडिया के प्रोफ़ेसर ने ये प्रतिक्रिया बहुत ही बखूबी समझाई। जब भी किसी और का चरित्र हनन होता है तो जो करता है उसके लिए ये 'फ़ील गुड' फ़ीलिंग, हैपिनस हार्मोन बढ़ा देते है। जब ज़िंदगी में जान बची हो तो यही बच जाता है, तो कुछ समय ज़िंदा होने के लिए ऐसी ओछी हरकतें पर्फेक्ट होती है। इन सब में कॉनमैन अपनी वाल क्लीन रख इमेज चमका रहा होता है।

पहली बार जब हमारे नाम की बेनाम पोस्ट किसी ज़हरीले तपन ने छापी तो थोड़ी घबराहट हुई। जिस दोस्त ने बताया यही कहा की इगनोर करों, ऐसे लोगो के लिए तुम्हारी प्रतिक्रिया ही इनकी जीत है। 

कोई एक प्यादा पोस्ट छापता और चिल्ल पौ करने वाले जुट जाते। और जनाब आईडी बदल बदल अपनी भी ख्वाइश पूरी कर रहे थे, इमेज का मामला था। एक दो बार मैं भी उस भँवर में घुस गई। ज़रूरी है। डर के आगे ही जीत है। कमेंट्स की गिनती ऐसे बढ़ती थी जैसे डिमोनेटाइजैशन के वक्त भीड़। 

उस समय मैने ध्यान की ताक़त नही जानी थी। हमारे एक दोस्त से बुद्ध की ज़रूरी बातें जानी। ध्यान में फिर ख़ुद भी अनुभव किया। किसी भी स्थिति, भाव, भावना, अनुभव से निकलने की अचूक दवा है: उस स्तिथि, भाव, भावना, अनुभव को पूरी चेतना से जीना। डर को पार करना तो फिर छोटी बात है, बड़े बड़े घावों से मुक्ती मिल जाती है। डर से आँखें लड़ाना ही डर से मुक्ति है!

फिर आप ट्रोलों को दुश्मन नही बल्कि विक्टिम के तरह देख पाते है और उनके लिए मन दया से भर जाता है। 

आई लव ऑल माय ट्रोल्स। उनकी वजह से मुझे एक ऐसे डर से मुक्ति मिल गई जिसके डर से हज़ारों लड़कियाँ फ़ेसबुक पर चंद फ़ैमली फोटो और कोटेशन के अलावा कुछ नही डाल पाती। ट्रोलिंग एक तरह का वायलेंस है जो औरतों और लडकियों को लाइन में रहने के लिए पित्तसतातमक समाज की नई खोज है। डरो नही। टेक योर ट्रोल्स हेड ऑन गर्ल्स!!

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