शनिवार, दिसंबर 18, 2021

क़रीब क़रीब सिंगल

कुछ फ़िल्मों में हम क्लाइमैक्स का इंतज़ार करते है। कुछ इतनी सपाट होती है की क्लाइमैक्स में जान डालते डालते डायरेक्टर बाकी के तीन घंटे भरने के लिए कुछ भी भर देता/देती है।

पर क्या ज़िंदगी ऐसी होती है? बिलकुल नही। एक दिन भी सपाट नही होता। जैसे कल का मेरा दिन। सुबह रात के टूटे हुए ख़्वाब से खिन्न मन से विटामिन-डी लेते हुए टेरेस में कविता लिखी। नीचे आई तो लगा इतना सिंगल तो पहले कभी फील हुआ! तो क्यों लोहे से लोहे को काटा जाए। पांच मिनट में तैयार हुए, “क़रीब क़रीब सिंगल” के पहले शो का समय देखा और देखने निकल लिए! कबीर को सोता छोड़! भूख लगेगी तो मैगी ख़रीद कर बना लेगा या दूध कॉर्नफ्लेक्स खा लेगा(अब बच्चों को लिए खाना न बनाने की कोई गिल्ट नहीं बचा)! बिना नाश्ता खाए निकले थे तो रास्ते में कुरला के फ़ेमस रामेश्वर बडा पाव ठुसाया और पहुँच गए पाँच मिनट लेट। अंदर पहुँचे तो देखा इतने बडे हाल में सिर्फ एक और जंतु और हम। निराशा हुई कि कही गलत मूवी में तो नही गए। खैर बडे बेमन से राष्ट्रीय गान के लिए खड़े हुए और इंतज़ार किया मूवी के शुरु होने का। फिर कब शुरु हुई कब ख़त्म पता ही नही चला। पूरे दो घंटे हम उसमें खो गए। एक हिस्सा हो गए उसका। निकले तो भूख लगी थी तो चायोस के अकेले ग्राहक के रूप में गुड वाली चाय और मटर कुलचा खाया। बाहर निकले तो माल की चकाचौंध में कुछ देर खो गए। दो ड्रेस ख़रीदी और वापसी करने लगी। घर पहुँचने से पहले पास के पार्लर पर रुकी। पूरे दो साल बाद ख़ुद को पैम्पर करने के लिए बढ़िया फेशीयल करवाया, और उस एक घंटे का काम करने वाली लड़की से पूरा unstructured इंटरव्यू भी हो गया। (यही आम लोगों के साथ गुफ़्तगू मेरी सबसे ख़ूबसूरत जमा पूँजी है।)

घर पहुँच कर फ़ेसबुक देखा तो असद भाई की मौत की खबर पता चली। तीन साल पहले के अवसाद से पहले और बाद के दिन जब सब साथ छोड़ चुके थे, असद भाई जैसों ने हमदर्दी ही नही मुझे परेशान करने वालों को मुझसे ज्यादा जानते हुए भी मेरा साथ दिया। उनकी चैट पढ़ते हुए उनसे फ़ोन पर की हुई बात याद गई। खूब रोई, कुछ उनकी भी इनायत है की हम ज़िंदा है!

फिर कबीर के साथ कुछ समय बिताया, शाम का खाना, कुछ काम और एक २५ साल के बालक के इश्क वाली गुफ़्तगू। बोल रहे है जनाब, "आपके पास हर बात का लॉजिक है। हमारी बात आपसे जम सकती है आपकी बेटी से!" सोचने लग गई की कितना कुछ घटता है एक दिन में अच्छा बुरा, दिल को छूने वाला पर हम इंतज़ार में रहते है की एक क्लाईमेक्स आएगा। जैसे एक सपनों का राजकुमार सोने के रथ पर आएगा- बचपन से सुनते रहे है ये कहानी! और कोई मिल जाए उस जैसा तो आँखें बंद कर चिपक कर बैठ जाते है!!

यही सार है फ़िल्म का भी था। इरफ़ान और पार्वती (शायद उसकी पहली हिंदी फ़िल्म है) दोनों ने वो छोटे छोटे पलों में जान डाल दी जो हमें याद रह जाते है। बहुत कुछ ऐसा जो अकसर लोग आम सोच कर टाल जाते है। मेरे तो ढेरों तार जुड़ गए। वो ऑनलाइन मैरिज और डेटिंग पोर्टल पर रजिस्टर करने के समय वाला कोताहुल, वो हर क़िस्म के लोगों के मेसेज पढ़ना, वो किसी को चूज करने का क्राइटेरिया, फिर वो चंद कुछ मुलाक़ातें, वो चैटिंग में दूसरे के मेसेज आने की बेसब्री, वो एक दूसरे को पुराने बॉयफ़्रेंड गर्लफ़्रेंड गिनाना, वो सैकड़ों बार फ़ोन पर बात करते करते संजय के खर्राटे सुनना(इस पर तो मैं पूरी नॉवेल लिख सकती हूँ), वो जो चला गया उसे ज़िंदा लाश की तरह लेते हुए घूमना जब तक सड़ाँद   जाए, वो बग़ल बग़ल के रूम बुक करना और रात में इधर से उधर जाना, वो प्राइवेट टैक्सी बुक कर घूमना और ड्राइवर से जुड़ जाना, वो पुराने पार्टनर को चुपके चुपके देखने की चाह, उनको खुश देख अजीब सी फीलिंग होना, उनको नोट छोड़ देना, उनकी दी हुई ख़ास चीज़ों की तिलांजलि देना, उन सब को खरी खरी सुना देना जिन्होंने तुम्हें दो कौड़ी की तरह ट्रीट किया, और वो किसी पुराने से मिलने के लिए ख़ास तैयार होना...

एक बार लगा इन सब के अलावा भी कितना कुछ है मेरी ज़िंदगी में जिसे अभी कभी कहा नही गया है। हमारे अपने पल हमेशा बिलकुल अलग होते है। पर हर कोई कोई कोई तार जोड़ ही लेता है। यही पल पल जीना, बिना किसी चमत्कार के इंतज़ार के, असल मायने में ज़िंदगी है!

बिलकुल वैसे जैसे प्रेम चोपड़ा ने शम्मी कपूर के लिए कहा था, "हर किसी के ज़िंदगी में बहुत लम्हे होते हैं, शम्मी कपूर के हर लम्हे में ज़िंदगी थी!"

खरी सीन जिसे क्लाइमैक्स कह सकते है, नही होना था। असल ज़िंदगी में नही होता है। फ़िल्म में भी नही होता तो फ़िल्म कम नही कह जाती। बस दर्शक हॉल से बाहर मुस्कुराने की जगह उदास हो कर जाते। तो क्या हुआ क्या वो मुस्कुराने का कोई और कारण नही खोज पाते

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