मंगलवार, जुलाई 16, 2019

गुड़िया खो गई

मेरा बचपन हैदराबाद के पास एक छोटे से क़सबे राजेन्द्रनगर के एक प्यारे से कैम्पस में बीता। जब मै पाँच साल की थी तब पापा को ६ महिने के लिए ऑस्ट्रेलिया जाना पड़ा, सो मेरा स्कूल जाना पोस्टपॉन हो गया। वैसे भी पापा ने मुझे पहली से ही पढ़ाने का तय कर रखा था।
वो ज़माना था जब अच्छे प्राइवेट स्कूल शहर मे होते थे। ज्यादातर लड़कियाँ पास के सरकारी स्कूल और लड़के शहर के प्राइवेट मे जाते थे। पापा ने मम्मी के मना करने के बावजूद १६ किमी दूर स्कूल ने दाख़िल करवाया। पड़ोस के एक खान अंकल की बेटी तय्यबा नर्सरी से उसी स्कूल में पढ़ती थी। हम एक ही क्लास मे थे तो मम्मी ने उसे समझा कर भेजा की गुड़िया का ध्यान रखना।
हम  बस से आराम से स्कूल पहुँच गए। वहा सभी क्लास के साथ एसेंम्बली शुरु हुई। इतनी भीड़ मैने पहली बार देखी थी। डरी सहमी मे तय्यबा का हाथ पकड़े खडी रही। ख़त्म होते ही बच्चो की भगदड़ में मेरा हाथ छूट गया। मै वही बैठ कर रोने लगी।
उधर जब काफी देर बाद तय्यबा को याद आया तो वो टीचर के पास गई और रोने लगी, 
"टीचर गुड़िया खो गई"!
टीचर ने भी सोचा वो किसी डॉल की बात कर रही है तो ये कह कर चुप करा देती की किसी को मिलेगी तो रख देगी। उसे समझ आ रहा था की टीचर को समझ नही आ रहा। फिर उसने अच्छे से समझाया!
"गुड़िया मेरे घर के पास रहती है और आज उसका पहला दिन है।"
फिर मेरी खोज शुरु हुई और मुझे ऐसेम्ब्ली में जहा छोड़ गई थी वही पाया गया। रो रो कर थक कर वही सो गई थी!

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