कैसे समय बीत जाता है पता ही नही चलता। ४५ साल हो गए है। में १८ की थी। ८
बहनों मे तीसरा नम्बर था मेरा। पिताजी पुलिस में अफ़सर थे, घर नौकर चाकरों
से भरा रहता। कभी कोई घर का काम करने की ज़रूरत नही १८ में शादी हो गई एक
गाँव मे। सबसे बडी बहू। कड़क सास। रात में ही ४ बजे उठ पर पाँच किलो गेंहू
चक्की में पीसना, फिर चौका करना, खाना पकाना, घर बुहारना, दिन भर अनाज,
दालें तैयार करना... जब समझ आया तो समझ नही आता था की कैसे करूँगी। दूसरे
सुबह गेहूँ देख कर टकटकी लगाए देख रही थी की सास आई और एक चपत लगा दी। मै
वही बेहोश हो गई।
कुछ दिन बाद पति भी चले गए काम पर। एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे। पिताजी को शायद इतने पसंद आए की ससुर जी को झूठ पर झूठ बोल गए। हमारी सप्पो घर का सारा काम करती है! बस वही झेल रही थी।
किसी तरह कुछ महिने कटे तो पता चला मैं पेट से हूँ। दिक़्क़त बढ़ती जा रही थी। काम करना मुश्किल होता जा रहा था। सिर्फ एक रास्ता दिखता था। खुद को ख़त्म करना। २ बार चूहे मारने की दवाई खाई पर फिर उलटियों में सब निकल गई।
काफी सर्दी हो गई थी। दिसम्बर का महिना था। उस रात तय कर लिया था कि कुएँ में आज कूद कर जान देनी थी। रात मे सबके सोने के बाद चुपके से बाहर निकल कर कुएँ पर गई। कूदने की हिम्मत नही हुई। पेट मे बच्चा घूँसे मारने लगा था। बस घर छोड़ कर निकल पड़ी। चौराहा एक किमी दूर था। पहुँची तो पता चला अब गाड़ी सुबह ही मिलेगी। कुछ लफ़ंगों ने ज़बरदस्ती छेड़छाड़ शुरु की पर मेरा पेट देख कर एक के कहने पर छोड़ दिया।
३-४ घंटे बहुत डर मे किसी तरह बीते। फिर एक अलीगड़ की बस आई। बैठ कर याद आया मेरे पास न पैसा है न कुछ और। कंडक्टर को बताया कानपुर जाना है, सिर्फ एक सोने की अँगूठी है। वो अच्छा था। कहानी सुनी और अलीगड़ से कानपुर की बस में भी बिठा गया। मुझे पता नही मै कानपुर वाली मौसी के यहा क्यो जा रही थी। पर शायद वो ही एक जगह थी जहा जाने की हिम्मत थी।
मौसी मौसा बहुत अच्छे थे। २ दिन वही रुकी। फिर मौसाजी ने मुझे मनाया की मै उनके पास चलू। मुझे डर लग रहा था पर वो मुझे छोड़ने गए। पति को पहले से ही पता था, उन्हे तार आ गया था और वो घर के लिए निकलने ही वाले थे। १-२ महिने में सब ठीक हो गया। पहला बच्चा था पर मै खुद बच्ची थी। ९ महिने से कुछ ऊपर हो गए पर दर्द नही थे। पति ने मेरी बहन, भाई; अपनी बहन को बुलाया पर सास भी आ गई। पर यहा इतनी दिक़्क़त नही थी। खाना पकाने के लिए महारिन लगी हुई थी।
उस दिन चैत्र की अष्टमी थी। मौहल्ले मे कन्या खिलाई जा रही थी। घर पर भी पूरी हलवा बना था। खा कर सब सोने चले गए। बार बार पेशाब जाने का मन हो रहा था। ननंद बोली की आँगन की नाली मे कर ले, अंदर रोशनी नही है।
रात १०:३० पर मै नाली पर बैठी तो लगा कुछ निकल रहा है। मै चिल्लाने लगी। तब तक बच्चा नाली मे निकल चुका था। घर के पास से ही दाईं आई, तो नाल काटा।
एक प्यारी सी बेटी हुई थी!
काट कर रखा ही था की एक जंगली बिल्ला मुँह मे दबा कर चल दिया। सास मे शोर मचा कर उसे भगाया! आज ४४ की हो गई है मेरी गुड़िया।
ये एक माँ की कहानी जिसने तूफ़ान में एक किश्ती को बचा लिया...
कुछ दिन बाद पति भी चले गए काम पर। एक कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे। पिताजी को शायद इतने पसंद आए की ससुर जी को झूठ पर झूठ बोल गए। हमारी सप्पो घर का सारा काम करती है! बस वही झेल रही थी।
किसी तरह कुछ महिने कटे तो पता चला मैं पेट से हूँ। दिक़्क़त बढ़ती जा रही थी। काम करना मुश्किल होता जा रहा था। सिर्फ एक रास्ता दिखता था। खुद को ख़त्म करना। २ बार चूहे मारने की दवाई खाई पर फिर उलटियों में सब निकल गई।
काफी सर्दी हो गई थी। दिसम्बर का महिना था। उस रात तय कर लिया था कि कुएँ में आज कूद कर जान देनी थी। रात मे सबके सोने के बाद चुपके से बाहर निकल कर कुएँ पर गई। कूदने की हिम्मत नही हुई। पेट मे बच्चा घूँसे मारने लगा था। बस घर छोड़ कर निकल पड़ी। चौराहा एक किमी दूर था। पहुँची तो पता चला अब गाड़ी सुबह ही मिलेगी। कुछ लफ़ंगों ने ज़बरदस्ती छेड़छाड़ शुरु की पर मेरा पेट देख कर एक के कहने पर छोड़ दिया।
३-४ घंटे बहुत डर मे किसी तरह बीते। फिर एक अलीगड़ की बस आई। बैठ कर याद आया मेरे पास न पैसा है न कुछ और। कंडक्टर को बताया कानपुर जाना है, सिर्फ एक सोने की अँगूठी है। वो अच्छा था। कहानी सुनी और अलीगड़ से कानपुर की बस में भी बिठा गया। मुझे पता नही मै कानपुर वाली मौसी के यहा क्यो जा रही थी। पर शायद वो ही एक जगह थी जहा जाने की हिम्मत थी।
मौसी मौसा बहुत अच्छे थे। २ दिन वही रुकी। फिर मौसाजी ने मुझे मनाया की मै उनके पास चलू। मुझे डर लग रहा था पर वो मुझे छोड़ने गए। पति को पहले से ही पता था, उन्हे तार आ गया था और वो घर के लिए निकलने ही वाले थे। १-२ महिने में सब ठीक हो गया। पहला बच्चा था पर मै खुद बच्ची थी। ९ महिने से कुछ ऊपर हो गए पर दर्द नही थे। पति ने मेरी बहन, भाई; अपनी बहन को बुलाया पर सास भी आ गई। पर यहा इतनी दिक़्क़त नही थी। खाना पकाने के लिए महारिन लगी हुई थी।
उस दिन चैत्र की अष्टमी थी। मौहल्ले मे कन्या खिलाई जा रही थी। घर पर भी पूरी हलवा बना था। खा कर सब सोने चले गए। बार बार पेशाब जाने का मन हो रहा था। ननंद बोली की आँगन की नाली मे कर ले, अंदर रोशनी नही है।
रात १०:३० पर मै नाली पर बैठी तो लगा कुछ निकल रहा है। मै चिल्लाने लगी। तब तक बच्चा नाली मे निकल चुका था। घर के पास से ही दाईं आई, तो नाल काटा।
एक प्यारी सी बेटी हुई थी!
काट कर रखा ही था की एक जंगली बिल्ला मुँह मे दबा कर चल दिया। सास मे शोर मचा कर उसे भगाया! आज ४४ की हो गई है मेरी गुड़िया।
ये एक माँ की कहानी जिसने तूफ़ान में एक किश्ती को बचा लिया...
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