कल जब फेसबुक की एक मित्र प्रिया ने पूछा "क्या तुम्हारे पिताजी आयुर्वेद जानते हैं?" तो जैसे उसने मुझे मेरी जड़े याद दिला दी.
मेरे परदादा जाने-माने हाकिम थे। दादा वैसे तो एक पक्के आर्य-समाजी और समाज सुधारक थे पर सबसे ज्यादा एक प्राकृतिक प्रेमी. हमेशा फल, फूल और पौधों के बीच रहना पसंद करते.. और शायद इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा में उनका गहरा विश्वास था.
हमारे वेद-शास्त्रों ने इस बाह्य प्रकृति को पांच तत्वों से बना हुआ बताया है। ये पांच तत्व हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। हमें हमारे आसपास जो कुछ भी दिखता है, वह सभी कुछ इन्ही पांच तत्वों के मेल से बना हुआ है। हमारा शरीर भी प्रकृति के इन्ही पांच तत्वों से बना हुआ हैं।
इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मनुष्य के मूल स्वभाव को भी प्रकृति कहा गया है और बाहर सृष्टि में, तत्वों के संसार के नियमों को भी। वास्तव में बाहर की प्रकृति और आतंरिक संसार अलग नहीं है - बिलकुल जुड़ी हुयी है और बाहर जो भी असंतुलन पैदा होता है, उसकी शुरुआत हमारे अंदर से ही होती है। बिलकुल वैसे ही जैसे अन्दर जो भी असंतुलन हैं वो प्रकृति में भी नज़र आता हैं। अंग्रेजी में भी दोनों को "nature" ही कहा गया हैं.
मुझे बचपन से ही प्रकृति के साथ एक ख़ास लगाव था. बचपन सारा पहाड़, नदी, झरने, पेड़, जीव जन्तुयों के बीच गुजरा.. वही मेरी प्रकृति बन गयी. इंसानी ढाचों और संस्थाए बड़ी बनावटी लगती हैं. अजीब सी उलझन होती हैं अगर ज्यादा देर उनमे रहना पड़े तो..
अजीब बात हैं जहाँ इंसान आ गए वहाँ इर्षा, द्वेष, लालच, अहम् और न जाने कितने और विकार आ जाते हैं. दूसरी तरफ प्रकृति हमे बहुत कुछ सिखाती हैं.. प्रथ्वी से स्थिरता, निस्वार्थता और नम्रता. जल से प्रेम, समानता और स्पष्टता. अग्नि से उत्कंठा, उत्साह और उर्जा. वायु से साहस, शक्ति और शीतलता. आकाश से उदारता, निष्कपटता और निर्मलता. हर पल प्रकृति हमें कुछ दे रही होती हैं.
प्राकृतिक इलाज भी शायद इन पांच तत्वों को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया हैं. मैं कोई चिकित्सक नहीं हूँ इसलिए मेरे कहे पर बिलकुल मत जाईये। पर जितना देखा हैं उतना बता देती हूँ।
मिटटी, खासकर मुल्तानी मिटटी बहुत की अच्छी मानी जाती हैं। जले पे, बाल धोने के लिए और पेट दर्द हो तो भी। शायद उससे शीतलता मिलती हैं।
जल के बारे में सिर्फ इतना बता सकती हूँ की आज मैं अगर ये लिख पा रही हूँ तो शायद मेरे दादाजी की जल-चिकित्सा की वजह से। १९ साल में जब मेरे साथ एक भयावर हादसा हुआ तो उसके बाद मुझे नर्वस ब्रेकडाउन के साथ सीधी तरफ काफी हद तक लाचार हो गया था। दादाजी २-३ महीने लगातार ठंडा-गर्म पानी का सेक करते रहे। इतना असर हो गया था की लगता था की मर्ज सीधी तरफ से दूसरी तरफ चला गया हैं। जल-नेति करते मैंने अक्सर अपने पिताजी को देखा हैं। उनकी माने तो स्वस्थ रहने के लिए एक आसन तरीका।
आग और धुआ भी बहुत असरदार होते हैं। अजवैन का धुआ से प्रसूता बड़ी जल्दी स्वस्थ हो जाती हैं।
वायु का अगर महत्व मैंने जाना तो प्राणायाम से।
खुले आकाश में तारे गिनते हुए सोना आपको स्रजनात्मक और जिज्ञासु बनता हैं।
ये तो मेरे खुद के छोटे-मोटे अनुभव हैं। पर मुझे खुद इस विषय पर थोडा और गहन अध्ययन करना हैं, खुद के लिए, औरों के लिए...
वातानुकूलित क्लासरूमों और घरो की बजाय उन्मुक्त विशाल आकाश के तले गहन वृक्षों की छांव में ज्यादा सुकून मिलता हैं। अपने बच्चों को हम जितना बाहरी प्रकृति के नजदीक रखेंगे उनकी खुद की प्रकृति उतनी कोमल और जिज्ञासु होगी। तभी हमारे बच्चे आनेवाले समय में सहज ही प्रकृति के प्रति एक सहानुभूति रख सकेंगे और इस धरती व प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण संभव हो सकेगा।
मेरे परदादा जाने-माने हाकिम थे। दादा वैसे तो एक पक्के आर्य-समाजी और समाज सुधारक थे पर सबसे ज्यादा एक प्राकृतिक प्रेमी. हमेशा फल, फूल और पौधों के बीच रहना पसंद करते.. और शायद इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा में उनका गहरा विश्वास था.
हमारे वेद-शास्त्रों ने इस बाह्य प्रकृति को पांच तत्वों से बना हुआ बताया है। ये पांच तत्व हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। हमें हमारे आसपास जो कुछ भी दिखता है, वह सभी कुछ इन्ही पांच तत्वों के मेल से बना हुआ है। हमारा शरीर भी प्रकृति के इन्ही पांच तत्वों से बना हुआ हैं।इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि मनुष्य के मूल स्वभाव को भी प्रकृति कहा गया है और बाहर सृष्टि में, तत्वों के संसार के नियमों को भी। वास्तव में बाहर की प्रकृति और आतंरिक संसार अलग नहीं है - बिलकुल जुड़ी हुयी है और बाहर जो भी असंतुलन पैदा होता है, उसकी शुरुआत हमारे अंदर से ही होती है। बिलकुल वैसे ही जैसे अन्दर जो भी असंतुलन हैं वो प्रकृति में भी नज़र आता हैं। अंग्रेजी में भी दोनों को "nature" ही कहा गया हैं.
मुझे बचपन से ही प्रकृति के साथ एक ख़ास लगाव था. बचपन सारा पहाड़, नदी, झरने, पेड़, जीव जन्तुयों के बीच गुजरा.. वही मेरी प्रकृति बन गयी. इंसानी ढाचों और संस्थाए बड़ी बनावटी लगती हैं. अजीब सी उलझन होती हैं अगर ज्यादा देर उनमे रहना पड़े तो..
अजीब बात हैं जहाँ इंसान आ गए वहाँ इर्षा, द्वेष, लालच, अहम् और न जाने कितने और विकार आ जाते हैं. दूसरी तरफ प्रकृति हमे बहुत कुछ सिखाती हैं.. प्रथ्वी से स्थिरता, निस्वार्थता और नम्रता. जल से प्रेम, समानता और स्पष्टता. अग्नि से उत्कंठा, उत्साह और उर्जा. वायु से साहस, शक्ति और शीतलता. आकाश से उदारता, निष्कपटता और निर्मलता. हर पल प्रकृति हमें कुछ दे रही होती हैं.
प्राकृतिक इलाज भी शायद इन पांच तत्वों को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया हैं. मैं कोई चिकित्सक नहीं हूँ इसलिए मेरे कहे पर बिलकुल मत जाईये। पर जितना देखा हैं उतना बता देती हूँ।
मिटटी, खासकर मुल्तानी मिटटी बहुत की अच्छी मानी जाती हैं। जले पे, बाल धोने के लिए और पेट दर्द हो तो भी। शायद उससे शीतलता मिलती हैं।
जल के बारे में सिर्फ इतना बता सकती हूँ की आज मैं अगर ये लिख पा रही हूँ तो शायद मेरे दादाजी की जल-चिकित्सा की वजह से। १९ साल में जब मेरे साथ एक भयावर हादसा हुआ तो उसके बाद मुझे नर्वस ब्रेकडाउन के साथ सीधी तरफ काफी हद तक लाचार हो गया था। दादाजी २-३ महीने लगातार ठंडा-गर्म पानी का सेक करते रहे। इतना असर हो गया था की लगता था की मर्ज सीधी तरफ से दूसरी तरफ चला गया हैं। जल-नेति करते मैंने अक्सर अपने पिताजी को देखा हैं। उनकी माने तो स्वस्थ रहने के लिए एक आसन तरीका।
आग और धुआ भी बहुत असरदार होते हैं। अजवैन का धुआ से प्रसूता बड़ी जल्दी स्वस्थ हो जाती हैं।
वायु का अगर महत्व मैंने जाना तो प्राणायाम से।
खुले आकाश में तारे गिनते हुए सोना आपको स्रजनात्मक और जिज्ञासु बनता हैं।
ये तो मेरे खुद के छोटे-मोटे अनुभव हैं। पर मुझे खुद इस विषय पर थोडा और गहन अध्ययन करना हैं, खुद के लिए, औरों के लिए...
वातानुकूलित क्लासरूमों और घरो की बजाय उन्मुक्त विशाल आकाश के तले गहन वृक्षों की छांव में ज्यादा सुकून मिलता हैं। अपने बच्चों को हम जितना बाहरी प्रकृति के नजदीक रखेंगे उनकी खुद की प्रकृति उतनी कोमल और जिज्ञासु होगी। तभी हमारे बच्चे आनेवाले समय में सहज ही प्रकृति के प्रति एक सहानुभूति रख सकेंगे और इस धरती व प्राकृतिक पर्यावरण का संरक्षण संभव हो सकेगा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें