मंगलवार, सितंबर 10, 2013

बदबू...

तेरह साल की हो गयी थी पर दुनियादारी बिलकुल नहीं जानी थी. इतिहास को बीती कहानी की तरह पढ़ती थी. समाज में क्या हो रहा हैं उससे बिलकुल अनभिज्ञ.
पहली बार गाँव में ऐसा देखा था. सुबह सुबह घर के बाहर मट्ठा लेने वाले लाइन से बैठ जाते थे. बचपन में काम करने की बहुत लालसा थी. उस दिन सबको बाटने की मेरी बारी थी. मट्ठा छलके नहीं इसलिए घड़े को उनके बर्तन से टेक कर डाल रही थी. उन्ही में से किसी ने टोका.
"लली, ज़रा दूर से डालो. घड़ा गन्दा हो जायेगा"
मुझे कुछ समझ नहीं आया. कुछ बचा हुआ मट्ठा ले के जब घर में गयी तो किसी ने दादी से मेरी पहले ही शिकायत कर रक्खी थी.
"सारा सान लिया. जा फोड़ दे घेर में."
"पर इसमें अभी मट्ठा बाकी हैं"
मुझसे बेमन वो मट्ठे का घड़ा तुडवाया गया. नन्हे के दिल में कई सवाल थे. पर जवाब कोई नहीं.
हैदराबाद के किचन के सिल पे अलग रखे वो टूटे कप याद आते थे, जो कुछ ख़ास लोगों के लिए होते थे. अक्सर माँ से आँख चुरा के उनमे पानी पी लेंती थी.
"गंदे रहते हैं वो. नहाते नहीं हैं. गन्दी बदबू आती हैं उनके घर में"
"क्यों?"
"मीट खाते हैं"
मीट मुझे भी गन्दा लगता था, पर मैं अक्सर सहेलियों के टिफ़िन से चीज़े खा लेती थी अगर उसमे मीट न हो.
"क्या मीट खाने वाले सब गंदे होते हैं?"
"हाँ."
नहीं समझ पाती थी माँ की दलीलें!!
दसवी कक्षा में थी. शहर का बड़ा कान्वेंट स्कूल. पापा ने कभी बेटी होते हुए भी अंतर नहीं रखा. बाकि घरों में देखती बेटी सरकारी स्कूल में, और बेटे कान्वेंट में.
नए स्कूल का पहला दिन था. सुबह की असेंबली में सब लाइन में खड़े हुए थे. मैंने जैसे ही खड़ा होना चाहा, प्रीति जो मेरे साथ ही थी, नाक-मुहँ सिकोड़ने लगी.
"छी छी, तुम लोगों से बदबू आती हैं. तुम लाइन में नहीं खड़ीं हो सकती"
अजीब लगा. ऐसा तो कभी नहीं हुआ पहले. माँ ने तो हमेशा उल्टा बताया था. शायद उस कप से पानी पीते पीते मुझमे भी बदबू आने लगी थी.
आज प्रीति दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में डेंटिस्ट हैं. ना जाने कितनो की मुहं की बदबू दूर कर रही हैं...
क्यों हम बच्चों के नाजुक फूल जैसे दिल में ये दीवारे बना देते हैं. कब हम एक दुसरे की बदबू को स्वीकारेंगे और  कब ये हमारी बगिया महकेगी... आखिर भेदभाव की यह भावना लिए कब तक समाज इन्ही खोखले विचारो पर खड़ा रह पायेगा...!!

कोई टिप्पणी नहीं: