हम छोड़ आए जिन गलियों को
तुम वहा की अकसर सैर करती हो।
हम तोड़ आए जिन रिश्तों को
तुम उनकी अकसर बात करती हो।
हम अतीत के तहखानों से डरते है
तुम उन्ही में ताज़ा हवा का इंतज़ाम करती हो।
हमारे आँखें चुराने से क्या वो मंज़र छूट जाते है
तुम उन्ही का सामना कर दो चार करती हो।
क्या सोचती हो प्रिय? क्या हम तुम कही मिल सकते है!
हम भागना चाहते है वहा से जहा ज़मीन ख़ुद खिसकती है
तुम उस सुर्ख़ ज़मीन को जोत कर फिर नई पौध करती हो।
उस क्षितिज में जहा मैं डूब रहा हूँगा और तुम उग रही होगी।
हम चलते चलते थक कर रुकने को
और तुम सुस्ता कर फिर से चलने को।
कहो प्रिय? क्या हम तुम कभी मिल सकते है!
हम देख कर अपने टुकड़ों को हताश है
तुम उन्ही टुकड़ों को जोड़ हसीन मोजैक बना रही हो।
हम अपने रिस कहे घावों को छिपा रहे है
तुम हवा लगे सुखे खरोंच रह गए घावों की नुमाइश कर इठला रही हो।
हम बंद दरवाज़े गिन रहे है
तुम एक रौशनदान की रोशनी पा कर चहक उठती हो।
बताओ न प्रिय? हम कैसे मिल सकते है!
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