मंगलवार, जून 19, 2018

टूटती रूढ़िवादिता...

हर नकारात्मक समझे जाने वाले शब्द को ध्वस्त होते देखा है। 
दसवीं में थी तो एक कविता लिखी थी नारी पर, पूरी याद नही पर अबला, त्याग की देवी, अनुरागी, पैर की जूती, जौहर, बेसहारा शब्दों को जोड़ कर कुछ ज़बरदस्त बना था..
तुझको जौहर सिखला कर
इतना कायर बना दिया
नर तूने इसका क्या किया भला
अपने पैरों की जूती बना...
ये शायद इसलिए क्योंकि मुझे बचपन से ये अहसास था की लड़की हूँ पर हर तरह से बराबर हूँ। गणित लड़कों का तो वो मेरा फ़ेवरिट, क्रिकेट लड़कों का तो लड़कों के साथ लेदर बॉल से खेल कर बच्चों की नाक तोड़ना, छह साल में बच्चों की टोली बना कर जंगल पहाड़ों में घूमना, पेड़ों पर घर बनाना और घंटों उछल कूद करना। स्कूल में कबड्डी हो रेस हो क्लास से बाहर खिड़की से कूदना या कॉलेज के गर्ल्स हॉस्टल में कर्फ़्यू टाइम के बाद गेट फाँदना सब किया है और बहुत जोश में!
नारीवाद शब्द किसी को तब शायद नही पता था। शरीर के दुबली पतली थी पर इरादों से मज़बूत थी सच्चाई के लिए लड़ना भिड़ना पीटना कूटना सब किया है।
फिर कुछ ऐसे क़िस्से हुए की मैं अंदर से टूट गई। बहुत ही नाज़ुक और भावुक हो गई। इतनी की ये वाक्य लिखने तक में आज भी मेरी आँख छलक जाती है। खैर कुछ बड़ों का साथ और शिक्षा की चाभी जो बचपन में पापा ने दी थी उसने बचाए रखा। पढ़ी, गोल्ड मेडलिस्ट हुई, क्लास वन अफ़सर बनी, बड़ी टेलिकॉम कंपनी में ज़िम्मेदार ओहदे पर रही.. बहुत सम्मान और धन-सम्पति मिली - सब बहुत आसान था।
पर भावुकता ने मारा, रिश्ते नही तय कर पाई। जिसने प्रपोज़ किया उससे प्यार नही किया, जिससे प्यार किया उससे शादी नही हुई और जिससे शादी हुई उससे निभी नही, जिससे निभी उसकी शादी हो चुकी थी... सब बहुत उलझ गया। निकलना आसान नही था बिना पूरी तरह टूटे। टूटी फूटी और बिखर गई। पर ख़त्म नही हुई क्योंकि कही वो बचपन का जोश वो उमंग ज़िंदा था। मैं भी जी गई। लिखने लगी, पेंट करने लगी, फ़ोटो खींचने लगी, गाड़ी दौड़ाने लगी, नाचने लगी... फिर सब मुझे छद्म नारीवादियों कहने लगे, लोध फेमिनाजी, लेडी केसानोवा और वो सब जो मैंने सर आँखों पर रखा। 
फिर टिस आया। जवानों के साथ पढ़ कर एक और जवानी जी ली। शोध करते करते बेहतर जाना खुद को, अपने समाज को, और प्यार हो गया मुझे अपने समाज से और उसके वो इतिहास से जो जानते सब है पर बहुत कम लोग क़बूल करते है। उस आत्म सम्मान के सामने ख़ानाबदोश, घुमंतू, ठग, असुर, जरामय जैसे शब्द ठिगने पड़ गए। समाज में महिलाओं की वो पारंपरिक संस्कृति जानी जिसे जान पर ख़ुद को मॉडर्न समझने वाली नारीवादी शर्मा जाए। 
और अब मैं जल्द ही नारी सतत कार्य में स्नातकोत्तर करने वाली हूँ। बाकि मुझमें जो भी बचा है वो संघर्षरत बच्चियों और महिलाओं के नाम...!
अब हर नकारात्मक शब्द में मुझे सोने की परत देखने का हुनर आ गया है। पारस बनना चाहती हूँ, ताकि जिसे छू वो बदल जाए। मेरे लिए बदलना धन समाप्ति और एशवर्य नही बल्कि वो हिम्मत और मज़बूती का होना है जिसमें ख़ुद को बदलने की ताकत है!

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