मेरी तुम्हारे लिए चाहत दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं। हर वक्त सिर्फ तुम्हारे इंतज़ार का हैं। एक शब्द, एक झलक, एक छुअन, एक चुम्बन…
क्यों? सही गलत इसकी किसको परवाह हैं। सिर्फ आकर्षण नहीं हैं। न ही कोई कामुकता। फिर क्या हैं यह?? शायद एक आश्वाशन, एक स्वस्त्ययन, एक ठंडी हवा का झोंका जो जी को हल्का कर देता हैं। हमने पिछले हफ्ते में सिर्फ दो बार बात की हैं। तुम्हारी ज़िम्मेदारियों का अहसास हैं मुझे। पर क्या तुम्हारे पास किसी से भी बात करने का समय नहीं हैं? मुझे नहीं लगता। शायद हर पल सिर्फ तुम्हारे ख़याल रहते हैं। वो ख्याल जो इतना खुश कर देते हैं कि मैं उन्हें दूर रखना भी नहीं चाहती। तुम मुझे हिम्मत देते हो जीने की। तुम्हारा सामने होना, न होना शायद इतना माने नहीं रखता। सोचती हूँ, क्या हैं जो हमें बांधे हैं। तुम पहले हो ज़िन्दगी में जिससे मिल कर ऐसा लगा कि बरसों का इंतज़ार पूरा हुआ। मुझे तृप्त कर दिया हैं इस रिश्ते ने। आज कल जब हम बात नहीं कर पा रहे हैं, तब भी एक अजीब सा चैन हैं। एक अहसास कि तुम मेरे लिए हो। एक विश्वास जो मुझे जीने कि राह दिखा रहा हैं। तुमसे मिलने का मन हमेशा कि तरह बरकरार हैं। तुम क्या सोचते हो उससे ज्यादा तुम्हारी ख़ुशी माने रखती हैं। तुम्हारी मज़बूरी, प्यार, गुस्सा, ज़िम्मेदारी सब अपनी लगती हैं।
प्यार। एक प्यारा सा शब्द। तुम अक्सर इस शब्द के आस पास मंडराते रहते हो। पर मुझे वो दिन याद हैं जब तुमने उघोषणा की थी। "शायद हम प्यार में हैं!
प्यार नहीं तो क्या हैं यह। कल रात तो तुमने मुझे चौंका ही दिया। हर बार जब कुछ होता हैं, तो इतना अचानक क्यों होता हैं। I am always caught unaware!पता नहीं क्यों मुझे विश्वास नहीं होता कि में तुमसे इस रिश्ते में हूँ, जब कि हमारा रिश्ता शायद सभी रिश्तों से परे हैं। तुम कहते भी हो, हमारा यह रिश्ता इस ज़माने को समझ आने वाला नहीं हैं। हम अपनी ज़िम्मेदारियाँ भी निभाएंगे पर इस रिश्ते को भी जियेंगे। कुछ हैं जो हमें जोड़े हैं। कहीं अंदर हमारे ऐसे तार जुड़े हैं कि समझ पाना मुश्किल हैं कि क्या हैं। आँखों से तो नहीं दिखता। न ही शायद दिल महसूस कर पाया हैं।
प्यार नहीं तो क्या हैं यह। कल रात तो तुमने मुझे चौंका ही दिया। हर बार जब कुछ होता हैं, तो इतना अचानक क्यों होता हैं। I am always caught unaware!पता नहीं क्यों मुझे विश्वास नहीं होता कि में तुमसे इस रिश्ते में हूँ, जब कि हमारा रिश्ता शायद सभी रिश्तों से परे हैं। तुम कहते भी हो, हमारा यह रिश्ता इस ज़माने को समझ आने वाला नहीं हैं। हम अपनी ज़िम्मेदारियाँ भी निभाएंगे पर इस रिश्ते को भी जियेंगे। कुछ हैं जो हमें जोड़े हैं। कहीं अंदर हमारे ऐसे तार जुड़े हैं कि समझ पाना मुश्किल हैं कि क्या हैं। आँखों से तो नहीं दिखता। न ही शायद दिल महसूस कर पाया हैं।
तुम्हारे साथ बीता हर लम्हा एक सदी जैसा लगता हैं। तुम्हारा सब कुछ अपना लगता हैं। तुम्हारा पागलपन, तुम्हारे शौक़ , तुम्हारे सपने, तुम्हारी ज़िम्मेदारियाँ।
और फिर जब मैं तुम्हे कोसते हुए सोने जा रही थी, उन सब कारणो के बारे में सोचते हुए कि किसलिए तुम मुझसे नहीं बात कर पा रहे हो। कभी कभी यह निर्णय भी करते हुए कि बस अब और नहीं। यह विरह की आग मुझे तबाह कर देगी। अब मैं तुम्हारे बनाये किसी जाल में नहीं फसने वाली, तभी तुम फ़ोन करते हो।
तुम्हे पता था मैं बरसने वाली हूँ। तुर्रंत बोल पड़े जैसे बहुत जल्दी में हो, "क्या कर रही हो? तैयार हो जाओ। हम अमान अली खान को सुनाने जा रहे हैं। १५ मिनट में गेट के बाहर मिलूंगा।" मैं कुछ कह पाती उससे पहले फ़ोन कट। मैंने एक फैब इंडिया का काला कुरता और रैप अराउंड पहना। एक ऊनी शाल डाल ली, बाहर ठण्ड थी। उतर रही थी फिर कॉल आ गया।
"छोटे गेट पर कार ले कर आ जाओ।"
एक मिनट और तुम ऐसे इंतज़ार कर रहे थे जैसे बरसों से वही खड़े हो। मैं तुमसे नज़र नहीं मिला पा रही थी।
पता नहीं ऐसा क्यों होता हैं कि हम २ दिन बाद भी मिलते हैं और मैं मिलन कि घड़ियों में गोते खाने लगती हूँ। अजीब हैं यह विरह और मिलन का चक्र। तुम मुझे ड्राईवर सीट से खिसका कर खुद कार चलाने लगे। इससे पहले मैं कभी किसी पब मैं नहीं गयी थी। मन का बोल दिया, "सुनो ऐसा नहीं हो सकता की हम वहा नहीं जाए?"
"मैं हूँ न"
तुमने किसी रणजीत को कॉल कर के बताया कि हम आ रहे हैं। गाडी जैसे ही पोर्च पर पहुंची रणजीत ने मेरे लिए दरवाज़ा खोला। लगा किसी सल्तनत की मल्लिका हूँ। पर ऐसी औपचारिकता से मुझे बहुत घुटन होती हैं। तुम कुछ लोगों से मिलने लगे तो रणजीत बोला, "चलिए मैडम, आपको ऊपर ले चलता हूँ।" रणजीत और तीन बाउंसर और मैं, और एक छोटी सी लिफ्ट। अपने आप को इतने लम्बे चौड़े पुरुषों से घिरा हुआ देख कर मैं कुछ और अंदर समा गयी। सुरक्षित नहीं, सहम गयी थी। ऊपर पहुंचे तो कुछ और बाउंसर को देख कर मन किया कही दुबक जाऊ। इतना अटपटा तो मुझे किसी कॉर्पोरेट पार्टी में नहीं लगता जहाँ मैं जाना नहीं चाहती हूँ। रणजीत का मेरे साथ खड़ा होना ही मुझे गला दबाने जैसा अहसास दे रहा था। तुम आये तो मेरा हाथ पकड़ के बोले, "घबराओ नहीं, तुम पत्नी हो मेरी!"
हम हॉल में घुसे तो मैंने तुम्हारा जैकेट कस के पकड़ लिया। सिगरेट और शराब का धूआं। इतनी घुटन की एक पल को लगा जैसे मेरी सांस रुक जायेगी। संवृतिभीत!
लगा जैसे सब मेरी तरफ देख रहे हैं। भीड़ में सब अनजान लगते हैं। मन हुआ अदृश्य हो जाऊ। उनके पीछे छिप गयी और उनका जैकेट मैंने और कस कर पकड़ लिया।
उन्हें मेरी परेशानी भांप ली थी। "चलो ऊपर छत में चलते हैं"
राहत मिली। लगा जैसे कितनी देर से रुकी हुयी सांस वापिस आ गयी। अच्छा हुआ जो हम बाहर आ गए। ऊपर प्यारे प्यारे झरोखे थे जो हॉल कि तरफ खुलते थे। मेरे लिए वेटर एक मॉकटेल ले कर आया।
"शराब तो नहीं हैं न?"
"नहीं, मैंने बता दिया था!"
मुझे लगा कब!
छोटा सा क्यूबिक्ल और उसमे दो राजगद्दी! अपने लिए वोडका और ऑरेंज जूस, एक वेज और एक नॉनवेज स्नैक मंगवाया। कुछ देर हम नीचे डांस फ्लोर और लॉबी को देखते रहे। दूर से अच्छा लग रहा था। तुम्हारा हाथ पकड़ कर ऐसे झरोके से देखते हुए लगा कि बस समय थम जाए। अभी म्यूजिक शुरू ही हुआ था। मैं बता रही थी कि मुझे नीचे कैसी घुटन हो रही थी। तुम मेरा हाथ और कस के पकड़ के बता रहे थी कि यह एक मॉक पार्टी हैं और अमान अली नहीं बजायेगा। एक विडियो ट्रूथ चला फिर वही भोंदा पंजाबी म्युसिक। तुम बैठ गए, तो मैं तुम्हारे पास ज़मीन पर बैठ गयी। तुम भी सीट से नीचे आ कर मेरे पास बैठ गए। मैं तुम्हारे नजदीक सट कर बैठ गयी जैसे कोई सहमा हुआ बच्चा बैठ जाता हैं।
तुम मुस्कुरा दिए। "तुम मेरी पत्नी हो।"
मुझे बहुत अच्छा लगा। लगा जैसे मुझे कोई पहचान मिल गयी हैं। तुम मुझे बहुत ख़ास समझते हो। मैं जानती हूँ।
तुम्हारी आँखें मुझे अंदर तक पिघला रही थी। क्यूबिक्ल में कोई दरवाज़ा नहीं था। कभी वेटर तो कभी बाउंसर परेशान कर रहे थे। हम बात करते करते अचानक चुप हो जाते। तुमने एक बार टोक भी दिया। फिर एक गिलास ड्रिंक और मंगाया।
"तुम पियोगी?""नहीं"
तुम्हे लगा शायद मैं उक्ता गयी हूँ।
"चलो"
हम नीचे पहुंच कर हमारी कार का इंतज़ार कर रहे थे। अचानक हमारी आँखें मिली। सामने रैडिसन होटल देख कर तुम बोले,
"काश हमारा यहाँ एक कमरा होता। और इस रोज की किट-किट से दूर मैं तुम्हारे साथ कुछ और समय बिता पाता।"
"काश हमारा यहाँ एक कमरा होता। और इस रोज की किट-किट से दूर मैं तुम्हारे साथ कुछ और समय बिता पाता।"
बादल, धुंद, थड़ी हवा, आधी रात और तुम्हारा कसा हुआ आलिंगन। कुछ पल जब समय रुक जाता हैं। और फिर छोड़ने का वक्त।
तुम्हारे शब्द आज भी मुझे सुनायी देते हैं। तुम जैसे इस ब्रह्माण्ड को कह रहे थे। "तुम मुझ पर विश्वास करती हो न? नहीं? तो अब करो!"
"मैं तुम्हे कभी नहीं छोडूंगा"
फिर अब कैसी घुटन? क्यों घबराता हैं मन कि हम मिल नहीं पा रहे हैं। जो हमेशा से तुम्हारा हैं उसको क्या खोने का डर।

4 टिप्पणियां:
i always love your writing..and ability to just pour out in form of words..
thanks dear! miss you :(
gud job amita :)
thank you parul
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