सोमवार, जनवरी 13, 2014

कितना लोगी?

यह बात १९९० की है। मैं डीटीसी बस से रोड से उतर कर पैदल २ किलोमीटर रोज़ घर के लिए चलती।


उस दिन देर हो गई थी। सोचा औटो ले लूँ। जब तक कमाना नहीं शुरू किया सिर्फ़ ३-४ जोड़े कपड़े थे। रोज़ साफ़ कर लेती थी पर हाल फटीचर ही थे।



औटो तो मिल गया, थोड़ी आगे पहुँच कर बोला,

"कितना लोगी?"

"जितना लगता है, १० रूपये, पाँच और दे दूँगी रात की वजह से"

"तू कितना लेगी?" वो ज़ोर से फिर बोला।

दिल धक्क से रुक गया।

"भैया, औटो रोको।"

"क्यों भाव दिखा रही है, इतनी परी भी नही हो, १०० दूँगा और घर भी छोड़ दूँगा"

"रोको रोको" कह कर में चलते औटो से कूद गई। भागते हुए घर पहुँची।

वही घर जहाँ कुछ दिन बाद फिर वही हुआ, पर एक घर वाले से। और उस बार में बच नहीं पाई। शायद औटो वाला बेहतर था जो माँग तो रहा था।

4 टिप्‍पणियां:

NILAMBUJ ने कहा…

मर्मस्पर्शी कहानी है। बहुत पसंद आई। ऐसे ही लिखते रहें।

अमिता आर्या ने कहा…

thank you nilambuj...

Nachiketa Desai ने कहा…

एक जानवर पुरुष का दो टूक परिचय .... बहुत ही सशक्त

Unknown ने कहा…

दोनो ही आज के समाज के यथार्थवादी चहरे है।